कमली 2 हो रही तैयार, जानें-क्या दिखेगा इस बार?

‘कमली’ को उत्तराखंड की सबसे कामयाब फिल्मों में गिना जाता है। यही वजह है कि लोग लंबे समय से इसके दूसरे पार्ट की मांग कर रहे थे। आखिरकार हिमालयन फिल्म्स ने इसकी औपचारिक घोषणा कर दी है।

हिमालयन फिल्म्स ने यूट्यूब पर एक कम्युनिटी पोस्ट डालकर फिल्म को लेकर कुछ जानकारी दी है। यहां हम आपको न सिर्फ वो जानकारी देंगे बल्कि बताएंगे अंदर की कुछ बातें। जैसे इस बार फिल्म की स्टोरी क्या होगी? और कौन-से वो कलाकार हैं जो शायद आपको कमली पार्ट 2 में नजर नहीं आएंगे।

कमली पार्ट 2 का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। हमारे चैनल पर भी हमने दो वीडियोज इस फिल्म को लेकर बनाए और कमेंट्स में अधिकतर लोगों ने कमली पार्ट टू के बारे में ही पूछा है। तो अच्छी खबर ये है कि कमली पार्ट 2 जल्द ही सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

हिमालयन फिल्म्स ने एक कम्युनिटी पोस्ट डालकर बताया कि कमली फिल्म की शूटिंग शुरू है। पोस्ट में देरी का कारण भी बताया गया। पोस्ट के मुताबिक कमली की 10वीं, 12वीं और मेडिकल की पढ़ाई को दिखाने की वजह से शूटिंग में काफी टाइम लग गया। खैर आप उम्मीद कर सकते हैं कि अगले साल मार्च या अप्रैल से पहले ये फिल्म सिनेमाघरों में हो सकती है। क्योंकि फिल्म की शूटिंग काफी वक्त से चल रही है।

इस बार क्या है स्टोरी?
पहले पार्ट में आपने देखा कि कमली डॉक्टर बनने का सपना पाले आगे बढ़ रही है। पार्ट 2 में आपको कमली का ये सपना पूरा होता दिखेगा। फिल्म का प्लॉट इसी के आसपास घूमता है। पार्ट 2 में आप कमली की 10वीं, 12वीं और मेडिकल पढ़ाई देखेंगे। और इस पढ़ाई को करने के लिए उसे किन आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, वो इस फिल्म का अहम हिस्सा होगा।

कौन-कौन कलाकार दिखेंगे?
पार्ट 2 में आपको कमली की भूमिका में प्राची पंवार नजर आएंगी। जिन्होंने पहले भाग में भी कमली का किरदार निभाया था। प्राची के साथ ही सवाली मैडम भी आपको नजर आएंगी। सवाली मैडम का किरदार इस बार भी तुलिका चौहान ही निभाती नजर आएंगी। फिल्म का निर्देशन अनुज जोशी और गीत प्राची पंवार के पिता जितेंद्र पंवार के ही लिखे होंगे।

अब बात करते हैं उन दो कलाकारों की जो शायद आपको इस बार फिल्म में नजर नहीं आएंगे। हम बात कर रहे हैं जीतू और शिब्बू की। जीतू यानि अभिषेक जग्गी अभी पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, शिब्बू यानि सचिन पंवार थाइलैंड में होटल में नौकरी कर रहे हैं। ऐसे में पूरी संभावना है कि पार्ट 2 में आपको जीतू और शिब्बू की जोड़ी नजर नहीं आए।

हालांकि संभावना ये भी है कि जीतू और शिब्बू का रोल इसबार कोई और कलाकार निभाएं। क्योंकि फिल्म निर्माता नहीं चाहेंगे कि इतने फेमस कैरेक्टर्स को खत्म किया जाए।

तो दोस्तों ये थी कुछ जानकारी और कयास। फिलहाल हम फिल्म का इंतजार करते हैं और उम्मीद करते हैं कि जैसे पार्ट वन ने सबके दिल में जगह बनाई, वैसे ही पार्ट 2 भी सबसे दिल में जगह बनाए।

आप उत्तराखंड के हैं, क्या ये 5 चीजें पता हैं आपको?

गुजरते वक्त के साथ पुरानी चीजें छूटती चली जाती हैं और नई चीजें अपनी जगह बना लेती हैं। आज हम आपको 5 ऐसी चीजों के बारे में बताने वाले हैं जो न सिर्फ पहाड़ की परंपराओं का अभिन्ना हिस्सा रही हैं बल्कि इन चीजों की बदौलत पहाड़ की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा का जीवन चलता था। ये 5 चीजें जो अब पहाड़ में बहुत ही कम सुनाई या दिखाई पड़ती हैं। और नई पीढ़ी को शायद इनके बारे में पता भी नहीं है।

1. ढाकर

ढाकर पैटी रे माडू थैर्वाअ
अस्सी बरस कु बुढया रे माडू थैर्वाअ

पहाड़ का जीवन हमेशा से संघर्षों से भरा रहा है। उसी की बानगी है ढाकर। पुराने वक्त में लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर ढाकर जाते थे और जरूरत की चीजें लाया करते थे। इस दौरान कोटद्वार समेत कई जगहों पर ढाकर मंडिया लगा करती थीं। जहां लोग अपने खेतों और सग्वाड़ों पर उगी मिर्च या दूसरे धान लाया करते थे। मंडियों में इन चीजों के बदले नमक, सब्जियां और जरूरत की दूसरी चीजें ले जाया करते थे।

ढाकर यानि ढोकर ले जाना। जो ढाकर आते थे, उन्हें ढाकरी कहा जाता था। आज लुप्त हो चुकी इस परंपरा से सैकड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई थी। जब लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर ढाकर जाते थे तो रास्ते में कई ढाकरी पड़ाव होते थे। बांघाट और दुग्गड्डा भी कभी ढाकरी पड़ाव थे।

जहां-जहां ढाकरी रुकते तो वहां मनोरंजन का पूरा साधन होता। नाच-गाना करने वाले, जादू खेल दिखाने वाले, मैणा यानि कहावतें, लोकगीतों को गाना जैसे कई तरीके वक्त काटने के लिए अपनाए जाते थे। बदले में मनोरंजन करने वालों को दिया जाता था- इनामी राशि। और इसी से होता था इनका जीवनयापन। ढाकर की परंपरा पर आधे पहाड़ की आजीविका जुड़ी हुई थी।

2. डड्वार
ये एक ऐसी चीज है जो थोड़ी बहुत आज भी बची हुई है। डड्वार पहाड़ में दिया जाने वाला एक प्रकार का पारितोषिक है। ये फसल का एक हिस्सा होता है। बदलते वक्त के साथ फसल के बदले कई जगहों पर पैसे भी दिए जाते हैं। इसे ब्राह्मण, लोहार और औजी को दिया जाता था। सालभर में होने वाली दो फसलों गेंहू-जौ और दूसरी धान के वक्त डड्वार दिया जाता था।

फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को चढ़ाया जाता है, इसे पूज या न्यूज कहा जाता है। दूसरा हिस्सा पंडित को दिया जाता था। सालभर पंडित ने घर में जो पूजा-पाठ किए और उसमें कभी कम दक्षिणा गई हो तो ये डड्वार एक तरह से उस कमी को पूरा करने के लिए दिया जाता था।

तीसरा हिस्सा लोहार का था। फसल काटने से पहले दाथुड़ी और अन्य हथियारों को पैना करने के बदले डड्वार दिया जाता था। वहीं, संग्राद- मक्रैणी और अन्य अहम त्योहारों पर घर आकर ढोल-दमो बजाने वाले औजियों को भी डड्वार दिया जाता था। औजियों को ही डड्वार देने की परंपरा कई जगहों पर आज भी है।

3. बोरू
बोरू डड्वार की तरह ही श्रम के बदले पारितोषिक देने की परंपरा है। जहां पंडित, औजी, लोहार को डड्वार दिया जाता है। वहीं, खेतों में काम करने और किसी अन्य के काम में हाथ बटाने आए ग्रामीणों को बोरु दिया जाता था। यह एक तरह की दैनिक मजदूरी होती थी जो काम करने वाले व्यक्ति को दी जाती थी। हालांकि बदलते वक्त के साथ बौरु की जगह दिहाड़ी ने ले ली है।

4. धिनाली
आज भले ही हालात बदल रहे है। पहाड़ के लोग भैंस, गाय रखने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन एक वक्त था, जब ये सब शान माने जाते थे। जब किसी दुधारु पशु का दूध निकालकर लाया जाता है तो उसे हमेशा छुपाकर लाया जाता है. स्थानीय भाषा में दूध, दही, घी आदि को धिनाली कहा जाता है. धिनाली को छुपाने की एक वजह ये भी थी कि किसी की नजर ना लगे और गाय या भैंस कम दूध ना देने लगे। एक वक्त ऐसा भी था, जब धिनाली को परिवार की संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। बिना दूध की चाय पीना, एक गाली मानी जाती थी।

5. कोटी बनाल
कोटी बनाल कोई परंपरा तो नहीं है लेकिन यह वो शैली है, जिससे उत्तराखंड के घर हजारों सालों तक सीना तने खड़े रहते हैं। सीमेंट और शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी बनाल वास्तुकला खत्म सी हो गई है। लेकिन इसके अवशेष आज भी उत्तरकाशी, जौनसार और हिमाचल में देखने को मिलती है। कोटी बनाल से बनाए गए मकान भूकंप रोधी होते थे। और इसमें कई मंजिलों के घर बनाए जाते थे। शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी-बनाल वास्तुकला खोती जा रही है और हम कॉन्क्रीट जंगल अपने पहाड़ में खड़ा करने लग गए हैं।

उत्तराखंड की डॉक्टर का डांस वायरल, लोग बोले- इसकी ज़रूरत थी

सोशल मीडिया पर एक डॉक्टर का वीडियो काफ़ी तेज़ी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में ये डॉक्टर PPE किट पहनकर डांस कर रही है। मुंबई के एक अस्पताल में काम करने वाली डॉ. रिचा नेगी गर्मी सॉन्ग पर डांस कर रही हैं। और उनके इस वीडियो को अभी तक 6 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं।


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We Won’t Let The Negativity Of The Situation Get To Us Even While Serving The Patients In This GARMI-ful But Oh So Graceful Outfit🤯💯 . HAPPY DOCTOR’s DAY To All My Colleagues & The FrontLine Workers Out There Putting Up A Brave Smile In The Face Of This Adversity & Doing Their Best To Help The Nation🙏🏻 . If We Can Stay Positive Through Risking Our Lives, Y’all Can Be A Lil Positive Too About This Extended Lockdown.! Stay Home Peepz🏡 . Always Loved The Vibe Of This Song But Now That It Clearly Matches The Feeling of Every Doctor Wearing The PPE KIT, (haaye garmi).! I Couldn’t Stop From Making A Video On It💃🏻💕 . @norafatehi @varundvn @badboyshah You Guys Were So Amazing In This😻 If Only I Could Match Up To Half Of What These Guys Do Everyday👉🏻 @dharmesh0011 @raghavjuyal @remodsouza @rahuldid @sushi1983 @suresh_kingsunited @shraddhakapoor @moonlight_chandni @iamkrutimahesh @punitjpathakofficial @perysheetal17 💙 . . PS: I Feel Like A TellyTubbie On A Mission.! . Also Thankyouuu @adityabhansali_ for editing this & @rajkeralia97 for helping me with this.!💛 . . #dance #dancer #choreography #love #norafatehi #doctorsday #instagood #instagram #bollywood

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अगर आप इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक पर एक्टिव होंगे तो अब तक आपने भी ये वीडियो देख लिया होगा।

उत्तराखंड से ताल्लुक़ रखने वाली रिचा नेगी अस्पताल में मरीज़ों का इलाज कर रही हैं। इलाज के बीच PPE किट पहने हुए उन्होंने यह वीडियो रिकॉर्ड किया।

कोरोना काल में सारी नकारात्मकताओं के बीच रिचा के इस वीडियो ने पॉजिटिविटी ला दी है। हर तरफ़ इस वीडियो के चर्चे हो रहे हैं। लेकिन रिचा नेगी के बारे में कितना जानते हैं आप? रिचा नेगी एक डॉक्टर ही नहीं, बल्कि उसके अलावा भी काफ़ी कुछ हैं।

रिचा नेगी उत्तराखंड से ताल्लुक़ रखती हैं। अपुष्ट सोर्सेज की मानें तो रिचा हल्द्वानी से हैं। हालाँकि रिचा का पूरा जीवन मुंबई में ही बीता है। उनका जन्म भी यहीं हुआ है। एक डॉक्टर होने के अलावा रिचा इंस्टाग्राम स्टार हैं। इसके साथ ही वह एलबमों में भी डांस करती हैं. हाल ही में उन्होंने एक तेलुगु गाने में अभिनय किया है। 

रिचा सोशल मीडिया स्टार हैं और डांस में उनकी काफ़ी रुचि है। इंस्टाग्राम पर डॉ. रिचा नेगी और यूट्यूब पर बॉली सफल नाम से उनका चैनल है। 

खैर, रिचा नेगी के इस वीडियो में जो खास बात है, वो ये है कि काम का काफ़ी ज़्यादा दबाव होने के बावजूद, वह खुश और पॉज़िटिव रहने का संदेश दे रही हैं।

तो आप भी पॉज़िटिव रहिए। कोरोना से बचिए और जीवन को रिचा की तरह ही एन्जॉय कीजिए। 

वीडियो देखें

प्रवासियों के लिए उत्तराखंड सरकार की ये योजना वरदान है?

20 साल जेल की सजा काटने के बाद ये जब उत्तराखंड स्थित अपने गांव वापस लौटा तो उसने आजादी के बदले फिर जेल जाना सही समझा। पुष्कर ने अधिकारियों को पत्र लिखे और चेतावनी दी कि अगर उसे जेल में नहीं डाला गया तो वो आत्महत्या कर लेगा। जानते हैं क्यों उसने ऐसा किया? पलायन की वजह से। 

2016 में आई आपदा ने पुष्कर के गांव में काफी तबाही मचाई थी। तब से यहां के लोग पलायन कर गए। पुष्कर का गांव खाली हो चुका था। एक भी इंसान गांव में नहीं था। घर खंडहर बन चुके थे और गांव पर जंगली जानवरों का कब्जा हो चुका था। इसीलिए पुष्कर जेल जाना चाहता था। उत्तराखंड की पलायन की पीड़ा कोई नई नहीं है। लेकिन शायद कोरोना वायरस का ये बुरा दौर, पलायन रोकने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा और इसके संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं।

लॉकडाउन से पलायन लॉक होने की उम्मीद

लॉकडाउन से पलायन लॉक होने की उम्मीद

प्रवासी भाइयों सुनना जरा
इस बार जब आप अपने घरदेश जा रहे होंगे, तब बस या ट्रेन से सफर के दौरान एक प्लान तैयार कीजिए। प्लान कभी भी परदेश वापस ना आने का। अब आप सोचेंगे कि ये कैसे होगा? आखिर गांव में रहकर हम क्या खाएंगे-क्या कमाएंगे? तो जवाब ये है कि अब आप अपने घर-गांव रहकर खा भी सकते हैं और कमा भी सकते हैं। इसके लिए जरूरत है तो बस एक प्लान की और सरकार इसमें आपकी मदद करेगी।

आप चाहें तो गांव जाकर एक दुकान खोल लें। छोटा सा ढाबा शुरू कर लें। उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा के बूते कोई कारोबार शुरू करना है तो वो करें। आप जो भी करना चाहते हैं. बेहिचक उसकी तैयारी शुरू करें और सरकार इसमें आपका साथ देगी।

स्वरोजगार पहाड़ में

स्वरोजगार पहाड़ में

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार का नया प्लान
त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना शुरू की है। इसके तहत आप राज्य में दुकान, डेरी, मछली पालन, व्यूटी पार्लर, पशुपालन, मुर्गी पालन समेत कई काम शुरू कर सकते हैं।

इस योजना के तहत सरकार आपको 35 फीसदी तक सब्सिडी देगी। अगर आप दूरस्थ जिलो में कोई यूनिट लगा रहे है या कारोबार शुरू कर रहे हैं तो आपको 25 फीसदी सब्सिडी मिलेगी। अगर आपके प्रोजेक्ट की लागत 25 लाख है तो 6 लाख की रियायत सरकार देगी। बी श्रेणी के जिलों में 20 फीसदी और मैदानी क्षेत्रों में प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए 15 फीसदी सब्सिडी मिलेगी।

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना

कैसे मिलेगा फायदा?
फायदा उठाने के लिए आपको सिर्फ एक प्लान तैयार करना है। प्लान को लेकर सरकार के पास जाना है। सरकार की तरफ से स्वीकृति मिलते ही बैंक के पास आवेदन जाएगा। बैंक जैसे ही फाइनेंस करने को तैयार होगा, वैसे ही आपको सब्सिडी मिल जाएगी। यानि कारोबार शुरू करने से पहले ही आपको रियायत मिल जाएगी। इस तरह आप बिना तंगी के अपने कारोबार को बढ़ा सकते हैं।

इस योजना की खासियत ही यही है कि आपको शुरुआत में ही मदद मिल जाएगी। आपको सालों तक सब्सिडी मिलने का इंतजार नहीं करना होगा। 

भले ही चीजें थोड़ी मुश्किल हों। आपकी जेब में पैसे ना हों। लेकिन अगर आपको पास एक पुख्ता प्लान है तो आपको जरूर कोशिश करनी चाहिए। ताकि आप अपनी माटी और घर में न सिर्फ रह सको बल्कि उसे बढ़ावा देने में भी योगदान दे सको। 

उत्तराखंड का ये हीरो इन बॉलीवुड फिल्मों में दिखा… और आपको नजर भी नहीं आया

आपने बॉलीवुड फिल्मदम लगा के हईसा’ देखी होगी। आपनेमिलन टॉकीज’ देखी होगी। ये फिल्में आपको पसंद आई हों चाहे हों लेकिन एक चीज जो आप देख नहीं पाए, वो था इन फिल्मों में एक उत्तराखंडी कलाकार का होना। वो भी ऐसावैसा कलाकार नहीं। ये वो कलाकार है, जिसे आपने कई उत्तराखंडी फिल्मों और एलबमों में अभिनय करते देखा है। हम आपको बता रहे हैं इन फिल्मों में काम करने वाले इस कलाकार के बारे में और साथ ही बताएंगे कि आगे वो आपको किस बॉलीवुड फिल्म में दिख सकते हैं।

दमा लगा के हईसा फिल्म अगर आपने देखी होगी तो फिल्म में एक सीन आता है, जब आयुष्मान और उनकी पत्नी बनी भूमि पेडनेकर तलाक के लिए सरकारी कार्यालय में जाते हैं। इस तस्वीर में आयुष्मान के साथ बैठे वकील को ध्यान से देखें। ये वकील हैं मुकेश शर्मा घनसेला।

कौन हैं मुकेश शर्मा घनसेला?
मुकेश शर्मा घनसेला उत्तराखंड से आते हैं। कई उत्तराखंडी एलबमों में इन्होंने अभिनय किया है। नरेंद्र सिंह नेगी केदिल्ली वाला द्योरा’, छन्यू मां कर्यूं डेरो जैसे गीतों में दिखे हैं। आजकल की बात करें तो गुंजन डंगवाल के नंदु मामा की स्याली गीत में भी ये नजर आए हैं। मुकेश ने गाने ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की कई फिल्मों में भी काम किया है। यही नहीं, उन्होंने खुद भी गाना गाने की कोशिश की है। उनका गाना आपको YouTube पर मिल जाएगा।

बॉलीवुड जर्नी
अब बात करें उन बॉलीवुड फिल्मों की जिनमें मुकेश ने काम किया है तो इसमें दम लगा के हईसा, मिलन टॉकीज, राग देश, 72 आवर्स शामिल है। इसके अलावा उन्होंने सावधान इंडिया, CID जैसे सीरियलो में भी काम किया है। हाल ही में उन्होंने उत्तराखंड की अटय आयुष्मान योजना के प्रमोशनल वीडियो को डायरेक्ट भी किया है और इसमें अभिनय भी किया है। मुकेश का रोल बॉलीवुड की इन बड़ीबड़ी फिल्मों में ज्यादा बड़ा नहीं है। वो अक्सर छोटामोटा रोल इन फिल्मों में करते नजर आए हैं।

जल्दी ही मुकेश साजिद नाडियाडवाला की फिल्म तड़प में नजर आने वाले हैं। इस फिल्म में वह सतीश कौशिक जैसे दिग्गज एक्टर्स के साथ काम करते नजर आएंगे।

वीडियो देखें

यहां दुल्हन लेकर आती है बारात, दहेज लड़की नहीं, देता है लड़का

आपने दुनिया की अजीबोगरीब शादियों और चीजों के बारे में सुना होगा लेकिन हम आपको शादी की एक ऐसी परंपरा के बारे में बता रहे हैं जो अपने आप में अनोखी है। ये शादी पूरी दुनिया को बताती है कि आखिर विवाह होने कैसे चाहिए। इस शादी में दुल्हा नहीं दुल्हन बारात लेकर आती है। उसके बाद जो मंजर तैयार होता है, उसके बारे में सुनकर आपको भी अच्छा लगेगा।

जौनसार बावर की परंपरा
उत्तराखंड में आज भी अगर कहीं सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह जीवित है तो वो जौनसार बावर में है। देहरादून से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर बसा जौनसार बावर सिर्फ अपनी संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि अपनी अलग परंपराओं के लिए भी फेमस है। इन्हीं परंपराओं में से एक हैजाजड़ परंपरा।

हिमाचल के सिरमौर और उत्तराखंड के जौनसार बावर में यह परंपरा काफी आम है। जहां आम शादियों में दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है। वहीं,  सिरमौर और जौनसार में दुल्हन बारात लेकर आती है। जी हां. दुल्हन। सिर्फ यही नहीं, कबायली संस्कृति की इन शादियों में महिलाओं की काफी ज्यादा अहमियत होती है। यही वजह है कि यहां पूरे गांव की महिलाओं को अलग से भोज करवाया जाता है। इस परंपरा को रहिंन जिमाना कहा जाता है।

दिखावा किया तो होगा विरोध
दुल्हन जब दूल्हे के घर बारात लेकर आती है तो बारात मेहमानों को लेकर दूसरे दिन लौट जाती है। लेकिन दुल्हन दूल्हे के घऱ पर 5 दिन तक रहती है। आजकल जहां लोग शादियों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, वहीं जौनसार बावर में शादी में दिखावा करना काफी ज्यादा खराब माना जाता है। शादी परंपराओं के हिसाब से करना बेहद जरूरी है। अगर किसी ने शादी में अमीरी दिखाने की कोशिश की और बेजा खर्च किया तो पूरा गांव उसका विरोध करता है। सदियों से चली रही ये परंपरा आज भी यहां कायम है।

क्या इतना दहेज लेंगे आप?
अब बात करते हैं दहेज की। जहां पढे़लिखे लोग लाखों का दहेज और घोड़ागाड़ी लड़कियों से लेते हैं। वहीं, जौनसार और सिरमौर में बिलकुल उल्टा है। यहां कई इलाकों में दूल्हे की तरफ से दुल्हन के परिवार को दहेज देने की प्रथा है। हालांकि ये दहेज पैसों और घोड़ागाड़ी का नहीं होता, बल्कि ये कोई सामान्य चीज जैसे बर्तन और कपड़े हो सकते हैं। और ये दहेज देने का मतलब ये है कि दूल्हे के मांबाप दुल्हन के मांबाप का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी का हाथ उनके लड़के के लिए दिया। कुछ शादियों में दुल्हन दहेज देती है, लेकिन ये सिर्फ 5-7 बर्तन ही होते हैं।

अनोखी विदाई, सिर्फ दुल्हन की नहीं, पूरी बारात की
हर शादी की तरह जौनसार की शादियों में भी नाचगाना होता है। लेकिन इन शादियों में परंपरागत नृत्यों को तवज्जो दी जाती है। हारुल, तांदी, झुमैलो जैसे नृत्य रातभर चलते हैं। जाजड़ परंपरा की शादी की एक और खास बात है, वो है विदाई। यहां जब विदाई का वक्त आता है तो दुल्हादुल्हन के परिवार वाले छत पर खड़े हो जाते हैं और गाना गाने लगते हैं। गाने के जरिये लड़के वाले लड़की पक्ष से कहते हैं कि सेवा में कुछ भूलचूक हुई हो तो हमें माफ कर देना। वहीं, लड़की के पक्ष वाले कहते हैंआपने हमारी काफी सेवा की। हमारी लड़की जब आपके घऱ में रहना शुरू करेगी तो आप उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें।

बता दें कि जौनसार बावर कभी हिमाचल की सिरमौर रियासत का ही हिस्सा था और जब अंग्रेजों ने जौनसार बावर को उत्तराखंड में शामिल किया तो लोग जरूर बंटे लेकिन यहां की संस्कृति नहीं। आज भी सिरमौर और जौनसार बावर के बीच रिश्ते लगते हैं।

WhatsApp का ये इस्तेमाल नहीं किया तो क्या किया?

आज लगभग सभी लोगों के पास स्मार्टफोन है। स्मार्टफोन है तो उसमें व्हाट्सऐप भी है ही। लेकिन अक्सर आपने व्हाट्सऐप का इस्तेमाल सिर्फ मैसेज, फोटो और वीडियो भेजने के लिए किया होगा लेकिन इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल जो आप कर सकते हैं। वो आपने अभी तक नहीं किया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में बताया है। दूसरी बात जो हम आपको बताने वाले हैं, वो ये है कि अगर आप उत्तराखंड घूमने की योजना बना रहे हैं और गांवों की सैर करना चाहते हैं तो मोबाइल आपकी काफी मदद कर सकता है। आप अगर उत्तराखंड से हैं और अपने घरगांव से दूर रहते हैं तो मोबाइल आपको आपके बचपन से मिलाएगा।

पीएम मोदी से जानिए WhatsApp का सही इस्तेमाल

 नरेंद्र मोदी ने नवंबर के आखिर रविवार को जब मन की बात की, तो इसमें उन्होंने धारचुला का एक उदाहरण पेश किया। इस उदाहरण में उन्होंने बताया कि किस तरह उत्तराखंड में रहने वाला एक समुदाय, जिसकी जनसंख्या अब 10 हजार से भी कम है। वो व्हाट्सऐप के जरिये अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने में जुटा हुआ है। रंग समुदाय की भाषा रंगलो कहलाती है। इस भाषा की कोई लिपि नहीं है। अपनी भाषा को खत्म होने से बचाने के लिए दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानि जेएनयू की प्रोफेसर संदेशा रायाप गर्ब्याल ने एक अनोखी पहल की। संदेशा ने अपने समुदाय के दूसरे लोगों से जुड़ने की अपील की और व्हाट्सऐप ग्रुप की शुरुआत हुई।

व्हाट्सऐप ग्रुप पर इस समुदाय के लोग सिर्फ अपनी मातृभाषा में ऑडियो मैसेज भेजते हैंबल्कि लिखते भी अपनी ही रंगलो भाषा में हैं। व्हाट्सऐप ग्रुप से शुरू हुई ये कहानी अब सोशल मीडिया पर बढ़ चुकी है। और कई लोग व्हाट्सऐप के साथ ही फेसबुक, ट्विटर पर भी रंगलो भाषा में लिख और बोल रहे हैं।

लुप्त होने की कगार पर खड़ी विरासत
ऐसा नहीं है कि सिर्फ रंगलो भाषा ही लुप्त होने की कगार पर है। उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं कह लीजिए या बोलियां, कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भी लुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। क्योंकि हम अब मिलते हैं तो इन भाषाओं में बात करने के से कतराते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं को बचाने के लिए व्हाट्सऐप का इस्तेमाल रंग समुदाय की तरह हम भी कर सकते हैं। कम से कम व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अपनी भाषा में बात कर सकते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन भाषाओं में बात कर सके।

मोबाइल लौटाएगा बचपन!

अब बात करते हैं उन उत्तराखंडियों की जो अपने घर से दूर शहरों में रह रहे हैं और अपना बचपन मिस कर रहे हैं। आपका मोबाइल आपका बचपन लौटा सकता है। दरअसल आकाश शर्मा नाम के युवक हैं। देहरादून में रहते हैं और सॉफ्टवेयर ऐप डेवलपिंग से जुड़े हुए हैं। आकाश ने उत्तराखंडियों का बचपन उनके मोबाइल पर लाने की कोशिश की है।

गूगल प्ले स्टोर पर आपको दो ऐप मिल जाएंगे। एकबाघबकरी और दूसरी, बट्टी। आम तौर पर उत्तराखंड में ये खेल काफी ज्यादा खेले जाते थे। लेकिन जब से मोबाइल आया है, तब से ये खेल नदारद से हो गए हैं। बाघबकरी और बट्टी, दो ऐसे खेल हैं, जिन्हें अब आप अपने मोबाइल पर खेल सकते हैं। और अपने बचपन की यादों को फिर से ताजा कर सकते हैं।  

घूमने जा रहे हैं उत्तराखंड तो मोबाइल करेगा मदद

अब जो बात हम करने वाले हैं ये सिर्फ उत्तराखंडियों के लिए नहीं, बल्कि देश और विदेश से आने वाले सभी लोगों के लिए है। आप उत्तराखंड घूमने जाना चाहते हैं। उत्तराखंड के गांवों की सैर करना चाहते हैं और यहां के पुराने लोगों से यहां की बातें जानना चाहते हैं तो आपका मोबाइल यहां भी आपकी मदद करेगा।

आप चाहे अंग्रेजी बोलते हों या फिर फ्रेंच भाषा आपको आती है। और चाहे फिर हिंदी ही आपकी प्रमुख भाषा क्यों हो। लेकिन आपको गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषा नहीं आती है। ऐसे में आप अगर उत्तराखंड की इन भाषाओं के शब्दों का अर्थ समझना चाहते हैं या फिर इन भाषाओं को सीखना चाहते हैं तो बहुत आसानी से आप ये काम कर सकेंगे।

गूगल प्लेस्टोर पर जाइए। हैलो उत्तराखंड ऐप डाउनलोड कीजिए। और फिर आप जिस भी भाषा के हैं और उस भाषा में बात कर और लिख कर उनका अर्थ उत्तराखंडी भाषाओं में समझ सकते हैं। आकाश शर्मा और उनकी टीम ने करीब 2 साल तक इन भाषाओं के शब्द जुटाए और फिर ये ऐप तैयार किया।

ये ऐप सिर्फ गैरउत्तराखंडियों के लिए नहीं है। अगर आप उत्तराखंड के हैं और अपनी तीनों भाषाओं पर पकड़ बनाना चाहते हैं तो ये ऐप आपकी मदद कर सकता है। और अपनी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए इन ऐप्स को जरूर डाउनलोड करें। और देखें कि कैसे आप इनके जरिये अपनी भाषाओं को जीवित रख सकते हैं और दूसरों तक पहुंचा सकते हैं।

पलायन रोकना अगर आपके हाथ में नहीं तो कम से कम अपनी भाषाओं और संस्कृति को बचाना तो हमारे हाथ में है। सोचिए, समझिए और करिये।

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कालापानी विवाद: अंग्रेजों की बदौलत हम आज भी झगड़ रहे हैं

नेपाल और भारत के बीच एकबार फिर दीवार खड़ी हो गई है। इस बार की दीवार का नाम ‘कालापानी’ है। दरअसल भारत ने हाल ही में देश का नया नक्शा जारी किया है। इस नक्शे में धारचूला  से करीब 90 किलोमीटर की दूर पर स्थित कालापानी को भारत का हिस्सा बताया गया है। इस पर नेपाल में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। और दोनों ही सरकारें कालापानी को अपनी जगह बता रही हैं… लेकिन साथ में दो भाईयों के झगड़े की तरह जल्द ही इस विवाद का निपटारा करने की बात भी कह रहे हैं। ये जो विवाद आज उठता दिख रहा है, दरअस यह काफी पुराना है और ये अंग्रेजों की देन है। इस वीडियो में हम आपको कालापानी विवाद की हर बात से रूबर करवाएंगे। 

क्या है कालापानी?
कालापानी भारत और नेपाल की सीमा है। कालापानी कई मामलों में अहम है। कालापानी से होकर ही चीन सीमा लीपूलेख को मार्ग जाता है। कालापानी काली नदी का उद्गम क्षेत्र है। ऐसी मान्यता है कि कालापानी में बदरीनाथ से भूमिगतजल निकलता है। ये जल जिस स्थान पर निकलता है। उसके ऊपर ही काली माता का मंदिर है। काली माता के नाम पर ही इस नदी का नाम काली नदी और काली गंगा भी खा गया है। नेपाल में इसे महाकाली के नाम से भी जाना जाता है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा में एक पड़ाव ये भी पड़ता है।

क्या है कालापानी विवाद?
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 35 वर्ग किलोमीटर की जमीन है। नेपाल इसे अपना हिस्सा बताता है। वह इसे अपनी मैप में भी दिखाता है। वहीं, भारत भी हमेशा इसे अपना हिस्सा बताता रहा है। और मैप में भी दिखाता है। 1997 में कालापानी सीमा की शुरुआत की गई। इस दौरान नेपाल के लोगों ने इसका बड़ा विरोध किया। नेपाल काली नदी समेत 35 स्कॉयर फुट की जगह को धार्चुला जिले का हिस्सा बताता है। दोनों देशों के अधिकारी 1998 से इस विवाद को सुलझाने में जुटे हुए है लेकिन अभी तक इसका कोई पुख्ता हल नहीं ढूंढ़ा जा सका है।

कैसे शुरू हुआ ये विवाद ?
इस विवाद को शुरू करने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। दरअसल 1816 में नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सुगौली संधि हुई। तब काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था. आज यही काली नदी दोनों देशों के बीच सीमा तय करने का काम करती है। हालांकि कालापानी का क्षेत्र और काली नदी किसके हिस्से गई? ये संधि से कुछ भी साफ नहीं है। नेपाल भारत के नये मैप को सुगौली संधी का उल्लंघन बताता है। वहीं, भारत का कहना है कि ये पहली बार नहीं है जब हम मैप में कालापानी क्षेत्र को अपने हिस्से में बता रहे हैं। हमने तो हर मैप में इसे शामिल किया है।

अमाले ने दी विवाद को हवा
इस विवाद को हवा देने का काम 2009 से शुरू हुआ। इस दौरान नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी एमाले ने ‘कालापानी हाम्रो हो’ यानि कालापानी हमारा है, जैसे नारे लगाने शुरू कर दिए। कम्युनिस्ट पार्टी भले ही प्रदर्शन करने पर भी उतर आई थी लेकिन सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती थी।

अब प्रतिक्रिया क्यों?
अब इस विवाद को हवा दो वजहों से मिली है। दरअस नेपाल के प्रधानमंत्री ओली चीन के करीबी माने जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल के रिश्तों में तल्खी आई है। दूसरी वजह है सोशल मीडिया। नेपाल के प्रधानमंत्री ने पिछले हफ्ते जब ये कहा कि हम अपनी जमीन का एक इंच भी नहीं देंगे। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सबको संयम से काम लेने की जरूरत है और सुनी-सुनाई बातों पर न जाएं। हम इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लेंगे। लेकिन सोशल मीडिया पर आम लोगों को भड़काने के लिए वीडियोज और पोस्ट डाले जा रहे हैं।

नेपाल और उत्तराखंड के बीचे रोटीबेटी का साथ
भले ही इस विवाद का साया दोनों देशों के सिर पर मंडरा रहा है। लेकिन यहां सीमा पर रहने वाले लोगों पर इस विवाद का असर ना के बराबर ही पड़ा है। काली नदी के इस पार भारत सीमा में गुंजी, नाबी और कुटी आते हैं। इन गांवों के ग्रामीणों की कुछ जमीन नेपाल के कव्वा क्षेत्र में है। ग्रामीणों ने जहां कुछ जमीन यहां बेच दी है। और कुछ भूमि बटाई में दी है। सिर्फ यही नहीं, आज भी नेपाल और भारत के बीच रिश्ते लगते हैं। बेटे-बेटियां.. एक दूसरे के यहां बिवाये जाते हैं।

आज नहीं तो कल, दोनों ही सरकारें इस विवाद का हल ढूंढ निकालेंगी। लेकिन एक जमीन के टुकड़े के विवाद को लेकर आपस में दुश्मनी पैदा कर लेना ठीक नहीं। ये दो भाईयों को झगड़ा है। जिसका कोई न कोई समाधान निकाल लिया जाएगा।

हर तरफ दिखने वाली ये खास पहाड़ी T-shirt जानते हैं कहां से आई?

आपने अक्सर प्रियंका मेहर, करिश्मा शाह और रुहान भारद्वाज समेत आजकल के कई गायकों को एक खास टी-शर्ट पहने हुए देखा होगा। इन टी-शर्ट में I am Pahadi जैसे स्लोगन देखने को मिलते हैं। पिछले कुछ दिनों से ये टी-शर्ट काफी ज्यादा नजर आ रही है। लेकिन इस टी-शर्ट के पीछे की कहानी कम ही लोग जानते हैं। ये टी-शर्ट कहां से आई? किसने बनाई? और कैसे आप इस टी-शर्ट को खरीद सकते हैं? ये सब हम आपको बता रहे हैं।

रमन शैली को श्रेय दीजिए
एक शख्स हैं। नाम है- रमन शैली। चमोली जिले के गौचर के रहने वाले रमन फिलहाल बैंगलोर में रहते हैं। रमन का जो सफर गौचर से शुरू हुआ, वह इंजीनियरिंग के बाद एक बिजनेसमैन बनने पर रुका। रमन वही शख्स हैं, जिनकी बदौलत आज आपको ये पहाड़ी टी-शर्ट दिख रही हैं। 

द अननोन डिजाइनर
रमन शैली ने अपने दो दोस्तों रुद्रपुर के संजय सिंह और देहरादून के विवेक चंद के साथ मिलकर द अननोन डिजाइनयर यानि TUDS लाइफस्टाइल की शुरुआत की। 2017 में शुरू हुआ यह स्टार्टअप आज न सिर्फ पहाड़ी टी-शर्ट बनाता है, बल्कि यह पहाड़ी गुड़िया और ऐपण भी आपतक पहुंचा रहा है। I am Pahadi बैज भी बनाए जा रहे हैं।

रमन शैली और उनके दोस्तों का ये स्टार्टअप बैंगलोर से ही काम करता है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी इस स्टार्टअप की तारीफ की है। लेकिन अब ये स्टार्टअप सिर्फ टी-शर्ट नहीं बना रहा, बल्कि पहाड़ की खातिर एक और कदम आगे बढ़ा है।

हिट म्यार पहाड़ मुहिम
द अननोर डिजाइनर ने एक नई पहल शुरू की है। नाम है- I am Pahadi. इस मुहिम के जरिये पहाड़ में टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। मुहिम के तहत अभी तक देहरादून, दिल्ली एनसीआर समेत कई जगहों पर फ्लैश मॉब का इंतजाम किया गया है। TUDS इसके लिए प्रियंका मेहर, करिश्मा-रुहान और बीके सामंत जैसे गायकों के साथ कॉलैबोरेट कर रहा है और कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। 

TUDS के इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। भले ही रमन शैली और उनके दोस्त पहाड़ से दूर हैं। लेकिन उन्होंने पहाड़ से जुड़े रहने का एक जरिया जरूर ढूंढ लिया है। 

कहां से खरीदें टीशर्ट?
अगर आप भी ये टी-शर्ट खरीदना चाहते हैं, तो आप TUDS की वेबसाइट पर पहुंच सकते हैं। यहां आपको 500 में ये टी-शर्ट मिल जाएंगी। 

वीडियो देखें

‘मोती बाघ’ ने वो दिखाया है जो आजतक किसी ने नहीं देखा

उत्तराखंड के किसान पर बनी डॉक्युमेंट्री मोती बाघ को भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया है। ये उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण है। मोती बाघ पौड़ी गढ़वाल के 83 साल के किसान की कहानी है। जिसने 32 साल पहले सरकारी नौकरी छोड़कर अपने गांव बसने का फैसला किया। वो भी ऐसे वक्त में जब सब शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। विद्यादत्त शर्मा ने खंडहर होते मकानों और बंजर होते खेतों के बीच एक मोती बाघ बनाया है, जिसे वह हमेशा हराभरा रखते हैं। लेकिन इस डॉक्युमेंट्री में सिर्फ इतना भर नहीं है। ये डॉक्युमेंट्री उन लोगों को भी एक कड़ा संदेश देती है, जिनका मानना है कि उत्तराखंड पर नेपालियों का कब्जा हो रहा है। आगे हम बता रहे हैं डॉक्युमेंट्री की वो बातें, जो ये सोचने पर आपको मजबूर करेगी कि अगर नेपाली न होते तो आधे से ज्यादा उत्तराखंड खंडहर और बंजर हो चुका होता।

मोती बाघके बहाने उत्तराखंड का सच
पौड़ी गढ़वाल का एक गांव है। गांव में एक बुजुर्ग महिला का निधन हो जाता है। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होती हैं, लेकिन तभी एक बड़ी समस्या सामने खड़ी हो जाती है। अर्थी को श्मशान घाट कैसे पहुंचाया जाए? क्योंकि गांव में बहुत ही कम लोग हैं… और जो हैं, उनके कंधों में इतनी ताकत नहीं कि अर्थी उठा सकें। आखिर में नेपाली मजदूरों को ढूंढा जाता है और वे अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट पहुंचाते हैं। 

अगर आपने मोती बाघ का ट्रेलर देखा होगा तो उसी में विद्यादत्त शर्मा ये उदाहरण दे रहे होते हैं। और उनके उदाहरण का इशारा साफ है कि उत्तराखंडी अब सिर्फ गांव छोड़ नहीं रहे हैं बल्कि उन्होंने इनका पूरी तरह से त्याग करना शुरू कर दिया है।… कई उत्तराखंडी शहरों के हो चुके हैं और कइयों को शायद अब अपने गांव का रास्ता तक भी याद नहीं। ऐसे में ये नेपाली ही हैं, जो हमारे रोजमर्रा के काम निपटाने में मदद कर रहे हैं। 

विद्यादत्त कहते हैं…

ये नेपालियों की मेहरबानी है कि वो हमें खिला रहे हैं। अगर वो नहीं होते तो उत्तराखंड मुर्दाघर बन जाता।

क्यों कहा विद्यादत्त जी ने ऐसा?

पिछले साल ही पलायन आयोग ने पलायन पर अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से पता चला कि उत्तराखंड के 900 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां अब एक भी इंसान नहीं रहता। रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि उत्तराखंड में जहां उत्तराखंडियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, वहीं नेपालियों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है।… और ये सच भी है। जिन मकानों को आपने खंडहर बना कर छोड़ा है, ये उन्हें घर बना रहे हैं। जिन खेतों को आपने बंजर किया है, ये उन खेतों में सब्जी उगा रहे हैं।… उत्तराखंड में जो थोड़े बहुत लोग रह भी रहे हैं, अब वो अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए नेपाली मजदूरों पर आश्रित हैं।… तो बताइए कि अगर कल नेपालियों को भगा दिया जाता है… या फिर वे यहां से चले जाते हैं। तो कौन आपके खंडहरों को घर बनाएगा… कौन बंजर हो चुके खेतों को हरा भरा रखेगा… और किसकी बदौलत आप अपने हर छोटे-बड़े काम को कर पाएंगे।

नेपाली मजदूरों की भी सुन लें

मोती बाघ को हरा रखने में न सिर्फ विद्यादत्त के बेटे लगे हुए हैं, बल्कि उनके साथ एक नेपाली मजदूर भी हैं। ट्रेलर में आप मजदूर को कहते हुए सुन सकते हैं कि ऐसी नौबत भी आ सकती है, जब उन्हें यहां से भगाया जा सकता है। लेकिन हमें नेपालियों से नफरत नहीं, बल्कि उनका धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने हमारे उत्तराखंड को जितना संभव है, उतना जिंदा रखा है।… और अगली बार किसी नेपाली मजदूर को गाली देने से पहले ये जरूर सोचिएगा कि पलायन नेपालियों की वजह से नहीं, आपकी वजह से है। पलायन रोकना है तो पहले आपको लौटना होगा… और जब आप लौटेंगे तो न सिर्फ आपके लिए बल्कि उन नेपाली मजदूरों के लिए भी जगह हो जाएगी… याद रखिये हम देवताओं की भूमि में रहते हैं…वहां सबके लिए जगह है।… और हां… पहाड़ की तस्वीर बदलना अब आपके हाथ में है।