उत्तराखंड की बरसों पुरानी समस्या जो कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनी

आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। सिर्फ घोषणा ही नहीं, पार्टी ने 2022 में होने वाले चुनावों की जोरदार तैयारी भी शुरू कर दी है। केजरीवाल की इस घोषणा के बाद उत्तराखंड एकबार फिर चर्चा में है।

केजरीवाल ने फ्री बिजली-पानी के साथ ही पलायन पर रोक लगाने का वादा अभी से कर दिया है लेकिन पहाड़ की एक बरसों पुरानी परेशानी है जो कभी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं होती।

उत्तराखंड को बने हुए 20 साल हो चुके हैं लेकिन आजतक किसी भी पार्टी ने इस मुद्दे को चुनावी घोषणापत्र में जगह नहीं दी है। यहां तक कि आम आदमी पार्टी ने भी नहीं। लेकिन उत्तराखंड का जनमानस इस दिक्कत से हर दिन रूबरू होता रहता है। और ये दिक्कत है वन्यजीव संघर्ष की।

वन्यजीवों से रोज संघर्ष
उत्तराखंड के स्थानीय अखबारों में आए दिन किसी गुलदार के इंसान पर हमला करने की खबरें छपती रहती हैं। वन्यजीवों का इंसानों पर हमला करने की घटनाएं इतनी आम हो गई हैं कि अखबार भी इन्हें एक छोटे से कॉलम में छापकर खानापूर्ति कर लेते हैं। 70 फीसदी से ज्यादा वन क्षेत्र वाले प्रदेश में ये समस्या किसी को बड़ी नहीं लगती। शायद इसीलिए ये चुनावी मुद्दा भी नहीं बनता। लेकिन उत्तराखंड के जनमानस को इसका समाधान मिलना जरूरी है।

आपदा बनता जा रहा संघर्ष
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक प्राकृतिक आपदा का रूप लेता जा रहा है। साल 2019 की ही बात करें तो यहां पर जंगली जानवरों के हमले में 58 लोगों ने अपनी जान गंवाई और करीब 259 लोग घायल हुए। सबसे ज्यादा पिथौरागढ़ में 8 लोगों की जान गई। राजाजी टाइगर रिजर्व में 6, पश्चिमी सर्कल के पूर्वी हिस्से में 6, गढ़वाल वन क्षेत्र में 6 और हरिद्वार में 6 लोगों की जान जंगली जानवरों ने ली है।

वहीं, कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ रेंज में 3, रामनगर में 1, नंदादेवी में 2 ने अपनी जान गंवाई है। इसके अलावा भी कई क्षेत्र हैं, जहां जंगली जानवरों ने मासूमों की जान ली है।

गुलदार और सांप ने ली सबसे ज्यादा जान
उत्तराखंड में गुलदार सबसे बड़ी चुनौती है। बीते साल इसके हमले में 18 लोगों की मौत हुई है। वहीं, सांप के डंसने से 19 लोगों की मौत हुई।

ये समस्या बड़ी क्यों है?
जिसका भी जीवन उत्तराखंड के गांवों में गुजरा होगा, उसने गुलदार, भालू और अन्य वन्यजीव के खतरे को महसूस किया होगा। कई लोगों ने गुलदार को गांवों में देखा भी होगा। आए दिन हमारी बेटियां और बहुएं जो जंगल में घास और चारा लाने जाती हैं, वो गुलदार, भालू जैसे जीवों का शिकार बन जाती हैं। सिर्फ यही नहीं, कई बार गुलदार गांवों में आकर बच्चों को उठाकर ले जाते हैं।

क्या कर रही हैं सरकारें?
सैकडों सालों से चली आ रही इस समस्या का कोई परमानेंट सॉल्यूशन अभी तक नहीं आया है। शायद इसका परमानेंट सॉल्यूशन संभव भी नहीं है लेकिन जानवरों और इंसानों के बीच फासला रखने के लिए वन विभाग तैनात रहता है। और हमारा वन विभाग स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। हर साल बजट आता है लेकिन वन्य जीवों से संघर्ष को कम करने के लिए कोई अहम घोषणा नहीं होती। एक आम सरकारी विभाग की तरह वन विभाग को तयशुदा बजट बांट दिया जाता है और खानापूर्ती कर दी जाती है।

अभी तक क्या किया गया?
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक संघर्ष को कम करने के लिए इंडो-जर्मन अंतर्राष्ट्रीय कोऑपरेशन के साथ कोशिश की जा रही है। हाथियों और गुलदारों के लिए रेडियो कॉलर, अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं। रैपिड रिस्पॉन्स टीम बनाई जा रही है। लेकिन ये सब नाकाफी साबित हो रहा है। इस संघर्ष को रोकने के लिए राज्य में एक फॉर्मूला नहीं लागू हो सकता। जोकि अब तक की सरकारें करती आई हैं।

पूरे राज्य में एक फॉर्मूला नहीं चल सकता!
डाउन टू अर्थ पत्रिका अपनी रिपोर्ट में लिखती है कि पिथौरागढ़ गुलदार को लेकर संवेदनशील है तो वहां अलग तरह के उपाय करने होंगे। रामनगर-मुहान, हल्द्वानी के तराई सेंट्रल डिवीजन, कोटद्वार, दुगड्डा, पाथरो हाथी के लिहाज से संवेदनशील हॉटस्पॉट हैं। यहां अलग रणनीति अपनानी होगी। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की तरह उत्तराखंड में भी अति संवेदनशील जगहों पर सोलर फेन्सिंग भी लगाई जा सकती है।

खैर, इस समस्या का असली समाधान तब ही निकलेगा, जब सरकारें इस तरफ गंभीरता से देखेंगी। जब सरकारों के बजट में इस समस्या से निजात पाने के लिए और वन विभाग को मजबूत करने के लिए ज्यादा जगह मिलेगी।

अब आम आदमी पार्टी भी उत्तराखंड के चुनावी रण में उतर रही है। क्या वो इस मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल करेगी या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन उम्मीद कम ही है।

चलिए 2022 का इंतजार करते हैं। लेकिन इस बार वोट सोच समझकर दीजिएगा। 20 साल से जो नहीं बदला है, उसे बदलने का वक्त है ये। आपकी सुरक्षा, आपका राज्य आपके हाथ में है, उसके लिए सही कदम उठाएं।

IPL 2020: फील्ड पर पहाड़ का ‘नौना’, स्टू़डियो में पहाड़ की नौनी का धमाल

रुद्रप्रयाग की गलियों से निकलकर, बॉलीवुड का सफर करते हुए, एक चेहरा IPL 2020 तक पहुंच गया है। नाम है तान्या पुरोहित। IPL 2020 का आगाज हो चुका है। हमेशा की तरह इस बार भी IPL में उत्तराखंड के कई खिलाड़ी अपना जलवा बिखेर रहे हैं। इसमें धोनी, रिषभ पंत और पवन नेगी जैसे प्लेयर शामिल हैं।

ये तो हो गई ऑन फील्ड की बात लेकिन अब जरा ऑफ फील्ड भी नजर दौड़ाइए। हर मैच के दिन स्टार स्पोर्ट्स पर आइए क्योंकि यहां पर मैच की अपडेट्स और इंटरव्यूज लेकर आपको नजर आती हैं तान्या पुरोहित।

तान्या पुरोहित IPL 2020 में स्टार स्पोर्ट्स की एंकर हैं और कोरोना काल में मुंबई से आपतक IPL की अपेडट्स पहुंचाने में जुटी हुई हैं। लेकिन तान्या का परिचय सिर्फ इतना भर नहीं है।

 

कौन हैं तान्या पुरोहित?
तान्या का नाता उत्तराखंड के उस परिवार से है, जिसने यहां की विरासत को संभालने में अहम भूमिका निभाई है। तान्या रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के क्वीली गांव की हैं। वर्तमान में वह अपने पति के साथ मुंबई में रहती हैं।

तान्या के पिता डॉ. डीआर पुरोहित गढ़वाल विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं। हालांकि उनकी पहचान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। दाता राम  पुरोहित ने उत्तराखंड की संस्कृति और रंगमंच को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई है। डी आर पुरोहित ही वो शख्स हैं, जिन्होंने जोशीमठ की उर्गम घाटी के मुखौटा नृत्य ‘रम्माण’ को यूनेस्को की नजर में लाया है।

तान्या के पति दीपक डोभाल भी एक न्यूज एंकर हैं। श्रीनगर से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले दीपक राज्यसभा टीवी में बतौर एंकर दिख चुके हैं। फिलहाल वह ज़ी बिज़नेस में एंकर के तौर पर शामिल हैं। तान्या की तरह ही दीपक भी रंगमंच से जुड़े रहे हैं।

बॉलीवुड में तान्या
तान्या वैसे तो बचपन से ही थियेटर करती आ रही हैं लेकिन बॉलीवुड में उनकी मजबूत शुरुआत NH-10 फिल्म से हुई है। फिल्म में तान्या ने अहम भूमिका निभाई है। इस फिल्म में उन्हें एक और उत्तराखंडी अभिनेत्री अनुष्का के साथ काम करने का मौका मिला। NH-10 के अलावा तान्या ने टेरर स्ट्राइक और कमांडो जैसी फिल्मों में काम किया है। सिर्फ यही नही, तान्या ने फ्लिपकार्ट और विजय सेल्स के लिए एडवरटाइजिंग में भी काम किया है।

एंकरिंग से तान्या का पुराना नाता
तान्या  कैरेबियन प्रीमियर लीग में भी एंकरिंग कर चुकी हैं। इसके अलावा द ड्रामा कंपनी यूट्यूब चैनल के लिए भी कुछ वीडियोज उन्होंने किए हैं। यानि कि तान्या रंगमंच से लेकर एंकरिंग के स्टेज तक, हर जगह छाई हुई हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि आगे भी तान्या ऐसे ही तरक्की करती रहें और उत्तराखंड का नाम रोशन होता रहे। क्योंकि जब भी उत्तराखंडी चमकता है तो उत्तराखंड बढ़ता है।

राजेंद्र की गलती ये है कि वो पाकिस्तान के कब्जे में नहीं!

7 जनवरी का दिन था। सेना में हवलदार राजेंद्र सिंह नेगी पैट्रोलिंग के दौरान गुलमर्ग में लापता हो गए। 8 जनवरी की सुबह होतेहोते यह खबर हर तरफ न्यूज चैनलों और टीवी पर थी कि भारतीय सेना का एक जवान लापता हो गया है। कुछ ने ये भी कहा कि राजेंद्र फिसलकर पाकिस्तान की सीमा में जा पहुंचा है। जैसे ही खबर आई। वैसे ही राजेंद्र के देहरादून स्थित घर में आम से खास लोगों का तांता लग गया।

8 जनवरी का दिन था और आज फरवरी चुका है, लेकिन राजेंद्र का अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। राजेंद्र के घर पर भी अब खास यानि नेताओं ने आना बंद कर दिया है। जानते हैं क्यों? क्योंकि अब मीडिया के कैमरे और अखबारों के रिपोर्टरों को राजेंद्र नेगी में कोई रुचि नहीं रह गई है।

राजेंद्र लापता हुआ है, ये उसके परिवार के लिए चिंता है। मीडिया ने हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे को भी छोड़ दिया। उत्तराखंड के लोगों ने सरकार से कहा कि जिस तरह उसने झटपट तरीके से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाया, उसी तरह राजेंद्र को भी लाया जाए। लेकिन सरकार के कानों में जूएं रेंगती नहीं दिख रहीं।

खैर, अभिनंदन टीवी चैनलों के लिए TRP था तो दो दिन तक लगातार हर तरफ अभिनंदन चलता रहा। राजेंद्र नेगी लापता हुआ है। तो क्या हुआ वो देश का सैनिक है। तो क्या हुआ कि वो देश की सेवा करतेकरते लापता हुआ है। टीवी चैनलों को अपनी TRP से मतलब है। राजेंद्र की खबर चलाने से वो नहीं रही तो उसे दिखाएंगे भी नहीं।

उम्मीदों में बंधी हैं आंखें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही सैनिकों के नाम पर जितना वोट बटोर लें, लेकिन जब एक सैनिक को खोजने के लिए युद्धस्तर पर काम करने की बात आती है तो वो कम ही नजर रही है। उस पर मीडिया भी TRP के चक्कर में सरकार से सवाल भी नहीं पूछ रहा। और दूसरी तरफ, राजेंद्र के घरवाले अाज भी फोन की घंटी बजने का इंतजार कर रहे हैं। उम्मीदें लगाए बैठे हैं। शायद खबर आएगी और सबके चेहरे पर खुशी छा जाएगी।

अभी तक क्या हुआ?

राजेंद्र नेगी के लापता होने के बाद कुछ औपचारिकताएं पूरी की गई हैं। पहली, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने राजेंद्र को वापस लाने के लिए खोज अभियान तेज करने की अपील की। मुख्यमंत्री जी भी राजनाथ जी को बोलकर चुपचाप सो गए हैं।

खैर, दूसरा अपडेट सेना की तरफ से आया। 13 जनवरी के दिन सेना ने कहा कि 11वीं गढ़वाल राइफल के हवलदार राजेन्द्र सिंह नेगी पाकिस्तान के कब्जे में नहीं है। सेना ने कहा कि 7 जनवरी को जिस स्थान पर यह हादसा पेश आया है, वहां से फिसलकर पाकिस्तान की तरफ जाने की संभावना नहीं है। 

13 जनवरी वो ही तारीख है, जिस दिन तक सभी न्यूज चैनल और न्यूज पोर्टल ताने पड़े थे कि राजेंद्र पाकिस्तान में फंस गए हैं। कइयों ने ये भी कहा कि वह पाकिस्तान के कब्जे में हैं। जब तक पाकिस्तान था, सबने खूब जोरोंशोरों से राजेंद्र के बारे में खबरें लिखीं। ज्यों ही सेना ने साफ किया कि राजेंद्र पाकिस्तान में नहीं हैं तो मीडिया को तो सिर्फ पाकिस्तान में इंटरेस्ट था। उसने राजेंद्र पर खबरें लिखना और बताना बंद कर दिया। क्योंकि अब TRP यानि पाकिस्तान का नाम हट चुका था।

तीसरा अपडेट यह है कि सेना की तरफ से राजेंद्र नेगी की खोजबीन जारी है। हालांकि इसमें सरकार की तरफ से कोई जल्दबाजी या फिर चिंता कहीं नजर नहीँ आती। दूसरी तरफ, अभिनंदन के लिए दिनरात एक करने वाला इंडियन मीडिया राजेंद्र के लिए एक छोटी सी खबर भी नहीं चला पा रहा है।

और हमारे नेता, ये जब वोट मांगने आएंगे तो सेना के जवानों का गुणगान करेंगे। लेकिन जब उन्हें बचाने और उनके लिए कुछ करने की बारी आती है तो ये फिर आंखकान बंद कर सो जाते हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि राजेंद्र नेगी जल्द से जल्द मिल जाएं। हम ये समझते हैं कि राजेंद्र को खोजने में कई दिक्कतें पेश रही होंगी। लेकिन उनके लापता होने पर मीडिया और सरकार की चुप्पी काफी निराशाजनक है।

काश राजेंद्र पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता। कम से कम तब तो सरकार उसे वापस लाने के लिए प्रयास करती। क्योंकि तब मोदी जी वाहवाही लूट पाते। लेकिन ये भी राजेंद्र की गलती है कि वो पाकिस्तान के कब्जे में नहीं है। क्योंकि होता तो वो दूसरा अभिनंदन होता। और मोदी जी से लेकर मीडिया तक उसका अभिनंदन करती। पर क्या करें? वो अभिनंदन नहीं है ना!

गढ़वई समाचार-2: अफड़ी भाषा, अफड़ा समाचार

नमस्कार भैजीबुलों

मी सौंणु दिदा फिर हाजिर छौं गढ़वई समाचार लीक। गढ़वई समाचार मां हम तुम खुणी बतौला ये हफ्ता की 10 बड़ी खबर। चला भै शुरु करदां आजकु समाचार।

1.
शुरुआत एक दुखद समाचार सी कनू छों. भारतपाकिस्तान सीमा पर पेट्रोलिंग का दौरान चमोली कु हमारु जवान राजेंद सिंह नेगी लापता व्हैगेनी। करीब एक हफ्ता बाद भी तौंकु कुछ पता नी चली। परिवार की टक्क लगीं कि फोन की घंट बजली और क्वी खुशखबरी आली। कुछ मीडिया रिपोर्ट बोलणी छन कि राजेंद्र जी फिसलीक पाकिस्तान की सीमा मां पौंछीगेनी। तलाश अभियान मां जुटी सेना न् बोली की राजेंद्र पाकिस्तान सीमा मां नीन। सोशल मीडिया से लीक सरकार तक नेगी जी तैं खोजणा कु प्रयास जारी च। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत्न रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सी मुलाकात करी और तलाशी अभियान मां तेजी लौणा की अपील करी। हम भी फिलहाल दुआ ही करी सकदां कि जल्द सी जल्द राजेंद्र जी मिल जां और राजी खुशी घोर जां।

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बैजी क्या कभी आपन् देखी कि पुलिस घर सी बुलैबुले तैं लोगुं उणी मोबैल द्याणी च। वी भी मैंगामैंगा। मी जाणदूं छों कि तुम उणी अफड़ा कंडूड़ पर विश्वास नी वलु व्हणू। किलै कि पुलिस त् चुनाव लड़दी और ना ही पुलिस सी हम कुछ मिलणा की उम्मीद करदां बल्कि डर हमेशा अफड़ी जेब सी देणा कु रंदू लग्यूंउत्तराखंड पुलिस कुछ अलग कनी च। देहरादून पुलिस लोगों उणी बुलैबुलै क् मोबैल द्याणी च। यु कमाल चीमोबाइल रिकवरी सेलकु। और जु मोबैल बंट्याणा छिन तौंकि कीमत हजारों रुपये सी लीक करोड़ो तक च्. जब या बात मैंन ग्वाणु दिदा बताई। त् ग्वाणु दिदा रातु का घम अंध्यारा मां देहरादून पैटिगे। अरे बल बड़ी मुश्किल सी थामी और तौं उणी ये की वजह बताई। दरअसल यी फोन वु छन जु ख्वैगे छया या चोरी वैगे छया। लेकिन उत्तराखंड पुलिस कु कमाल कि तौंन सब मौबैल खोजिक लेल्यन। त् बैज्यों यांक ही बोलदन हमारी उत्तराखंड पुलिस हीरा ची हीरा।

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उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय सी पढ़ाई कन वावा छात्रों का खातिर एक खुशखबरी च।अब तुम तैं फाइनल ईयर की मार्कशीट लेणा खुणी ठैट अफड़ा गौं सी विश्वविद्यालय औणां की जरूरत नही। बल्कि अब सीधा तुमारा मोबैल पर मार्कशीट मिल जाली। जी हां सीधा तुम्हारा मोबैल पर। त् तुम उणी क्या लगी कि मोबैल सिर्फ व्हाट्सऐप पर छ्वीं लगाण च् और फेसबुक पर मथी गौं की रामप्यारी तैं मैसेज भेजणा क् . ना जी ना। एक ऐप डिजी लॉकर। सरकारी ऐप ची भाई। यीं ऐप पर तुम खुणी अफड़ी मार्कशीट मिल जाली। ये खातिर आप खुणी जै दिन तुम ईं धरती पर जर्म्यन, तैं दिन की तारीख, परीक्षा कु अनुक्रमांक और नामांकन संख्या डालण पड़ली।

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पिछला हफ्ता एक फिल्म आई छपाक। या फिल्म एसिड अटैक की एक पीड़िता का जीवन पर बणी च। फिल्म कु विरोध भी व्है। किलै कि कुछ लोगुंन दीपिका का JNU मां जाण का विरोध मां फिल्म कु विरोध करी। पर हमारी उत्तराखंड सरकार्न एक बड़्या काम करी। राज्य सरकार् एसिड अटैक सर्वाइवर्स का खातिर पेंशन स्कीम की घोषणा करी। राज्य मंत्री रेखा आर्या न् बताई कि एसिड अटैक सर्वाइवर खुणी हर मैना 5000 सी 6000 की आर्थिक सहायता दिये जाली। ये कदम की तारीफ हुईं चैंदी। चला क्वी जु राजनीति का अलावा भी सौचदू।

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एक और अच्छी खबर सुणा। उत्तराखंड पुलिस एक खास ऐप ल्योंणी च्. जैसी तुम जब पाड़ी रास्ता पर गाड़ी चलाला त् तुम खुणी ब्लाइंड टर्न यानि नी दिख्याण वावा मोड का बारा मां पैली ही पता चली जालु। बैजी ब्लाइंड टर्न सही बताई न् मैन। नी बताई व्हलु सई बतै द्यांक्या कन बैजी गाड़ीघोड़ा छौ नीन्हम त् विश्वानाथ ट्रांसपोर्ट का धक्का खाण वावा छां।

हां हम बात छई कना उत्तराखंड पुलिस की ऐप की। ऐप कु नौं व्हलु मेरी यात्रा। ऐप 31 जनवरी तक लॉन्च व्है जाली। ईं ऐप की मदद सी एक्सिडेंट कम व्हण की उम्मीद च।

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बैजी…. तुम चाहे सुंघुर पाया, बाघ पाया या फिर रीख।.. पर गलती सी भी लैबरा डोग पाया भाई। अरे लबरा छौरी वाई लबरा न् रै…. यु नी उंदु लबरा डोग. भई सु अंग्रेजी कुत्ता। जी हां। त् एक दुखभरी काणी सुणा। उद्धम सिंह नगर जिला मां द्वी परिवारु का पास छई लबरा कुकुर। द्वी का कुकुर दिसंबर का मैना मां ख्वै गैनी। एक दिन एक भला मनखी वुणी एक लबरा कुकुर मिलगे। और वै भला मनखीन् फेसबुक पर पोस्ट लिखी कि भई जैकु भी यू कुकुर सु फुंडु लिगै द्या। अर बल यख पोस्ट वई, तक द्वी परिवार एग्यन और बोलण बैठिग्यन कि यु कुकुर मेरु च। त् भई फैसला जब वई नी। पुलिस का पास मामला गै।

पुलिसन् भी दिमाग लगाई और बोली कि द्वी कुकुर उणी तैका नौं सी बुलालाकुकर जैमा जालू, कुकुर तैकु। लेकिन लबरा कुकुर लबरा छई. द्वी मालिकुन तै अफड़ा धर्यां नौं सी बुलाई और स्वी द्वी मां नैंगे। पुलिस भी अफड़ु कपाउ पकड़ीक बैठी। फिर पुलिसन् रात भर सु कुकुर कस्टडी मां रखी और ये दौरान द्वी मालिक भी वखी रैन।


ये वक्त मां भी कुकुर द्वी मालिकु दगड़ी मस्त करी घुमणु रै। पुलिसन् कपाउ पर चोट मारी कि अब फैसला कन क्वै वलु। तब तैं सुबेर कु एक मालिकन लिखिक दे दिनी कि यू कुकुर तैकु नी। त् भई लबरा कुकर लबरा निकली भै। या खातिर छौं ब्वनु रीख पाया, बाघ पाया, पर लबरा नौं कु कुकुर ना पाया। अफड़ा पाड़ी कुकुर ही बड्या छन। मोटाताजा भी और ईमानदार भी।

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अब उत्तराखंड का जथगा रेलवे स्टेशन छिन.. सबु पर संस्कृत मां स्टेशन कु नों नजर आलू। मतलब यु मौका छैंछी भैजी कि अगर संस्कृत मां तुम पास नी वै सक्यन। पर थ्वाड़ा बौत संस्कृत जांदी स्टेशन खड़ू वै तैं तुम दगड़्यों दगड़ी संस्कृत आणा की धौंस मारी ही सकदां। पैली स्टेशनों कु नौं हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू मां होंदू छै। पर अब संस्कृत मां. तुमखुणी बतैद्यां कि संस्कृत उत्तराखंड और हिमाचल की दूसरी आधिकारिक भाषा च।

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अब सुणा तुम सबसी ब्रेकिंग न्यूज। एश्वर्या राय बच्चन, जिंकी एक बेटी च। तिंन बौत बड़ी बात हमसी छुपाई। जु पिछला हफ्ता बैर आई। बल एक 32 साल आदमी कु दावा ची कि बल सु एश्वर्या कु नौन्याअ ची। तैकु बोलणु ची कि 1988 मां ऐश्वर्यान तै जनम दिनी। और बाद मां ऐश्वर्या का मांबापन् सु द्वी साल तक पाई। बल एश्वर्या इथरु बड़ु पाप लुकायुं रै। अब क्या वलु रै अभिषेक।

जथगा उमरै बिचारी एश्वर्या व्हली। तैंका आसापास की उम्र कु तिंकु नौन्याअ भी लो। भै।क्या व्हैगी ईं दुन्या उणी। कलियुग सचै ऐगे बै। कना कना दावा छिनकना कना लोग।

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तन बल पुलिस का हाथ बड़ा लंबा होंदनक्वी भी अपराधी तौंकि पौंछ सी बची नी पौंदु. पर बैजी यु कैन नी बताई कि तौंका हाथ लंबा होंदा छांपर अपराधी उठोणै की ताकत कभीकभार कम पड़ी जांदी। जी हांमामलु इराक कु च।यख सुरक्षाबलों की एक टीमन आतंकी संगठन ISIS का एक आतंकी वुणी गिरफ्तार करी। लेकिन सु गाड़ी मां नी आई। असल मां आतंकी कु वजन इथगा छई कि कार मां सु घुसी ही नी सकी। रिपोर्ट का मुताबिक मौलवी कु वजह २५० किलोग्राम छई। त् आखिर मां सुरक्षाबल उणी ट्रक बुलौण पड़ी और फिर तै आतंकी उणी पुलिस स्टेशन लिगाई। मी यु स्वाचणु छौं कि कखि पुलिस स्टेशन का दरवाजा छ्वटा पड़ी व्हला पुलिस कु या हैकु खर्चा बड़िगे व्हलू।

१०.

हफ्ता मां सिर्फ 4 दिन नौकरी और दिन आराम। सुणी कति भलु लगणु च। पिछला कुछ दिनु बटी सोशल मीडिया पर मैसेज वायरल व्हणु च। जैका अनुसार फिनलैंड सरकार हफ्ता मां चार दिन सिर्फ नौकरी की व्यवस्था कन वाई च। और छह घंटा काम। कई बड़ाबड़ा न्यूज चैनलुन भी खबर चलाई।

लेकिन अब फिनलैंड सरकारन् बोलीअरे भाई।इथगा ज्यादा सुपिन्या नी द्याखा। हमारु इनु क्वी विचार नी। और यु सिर्फ एक मीटिंग मां यनी बात वई छईइथगा गंभीरता सी ल्याणा की जरुरत क्या भै।

  

गढ़वई भाषा मां देश-विदेशु का समाचार पढ़ा-सुणा

 

नमस्कार बैजीभुलोंगढ़वई समाचार मा तुम खुणी हम बतौला हर हफ्ता की 10 बड़ी खबर। 5 देशविदेशु बटी और 5 अफड़ा पहाड़ की।

1.
पिछला कुछ समय सी देश मां CAA और NRC का खिलाफ विरोध प्रदर्शन व्हणू चा। ये हफ्ता मां ये विरोध का बीच दिल्ली का जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय यानि JNU मां कुछ नकाबपोशोंन् भीतर घुसिक छात्रों पर हमला करी। चेरा पर नकाब पैरी क् हमला कन वावू का नकाब अब पुलिसन् उतारील्यन।पुलिस का मुताबिक हमलावर कन वावू मां खुद JNU छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष समेत 9 लोगों की पछाण कर्याली। आइशी घोष वी , जु हमला का बाद धरना पर बैठीं च। अब बल देखण होलु कि चोर की दाड़ी मां तिनका जु दिखेगे, सु कति सई च। बते द्यों कि पिछला रविवार यानि 5 जनवरी कु JNU में नकाबपोशोंन हमला करी और छात्रों दगड़ी मारपीट करी। और हां, जरूरी बात। यूं विरोध प्रदर्शनु का बीच नगारिकता संशोधन बिल आज यानि 11 जनवरी से लागू व्हैगी।

2.
दूसरी खबर सीधा अमेरिका बटी। अमेरिकान ईरान कु टॉप कमांडर ड्रोन हमला करी उड़े दिनी। हां भई, सीधा ईरान मां घुसिक। अमेरिका का हमला का बाद ईरान भी बौत तच्युं और वैन भी अमेरिका सी बदला लेण का खातिर ईराक मां अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल छोड़ी। पर ईरानै किस्मत रै खराब और मिसाइल यूक्रेन का एक यात्री विमान पर लगी गे।मिसाइल हमला की वजह सी विमान मा सवार सभी 176 लोग मोरी गेनी। अब बल प्वथलु चुगीगे ढ्वखरु, अब पछतै व्हण क्या। ईरान कु राष्ट्रपति च् वु हसन रुहानी। वुन अफड़ी गलती स्वीकार कैली और बोली कि मानवीय गलती का वजह से यु हादसा वै। पर बैजी, क्वी युं राजनेताओं वुणी समझावा कि लड़ैझगड़ा करिक कैकु भलू नी वै और ना ही वंदू। यकीन नी ओंदू पुछाग्वाणु दिदा सी। जुन ब्याई घुटकी लगैक बैसाखु बैजी दड़ी लड़ै करी और आज कपाअ पर पट्टी बांधिक घोर मां बैठ्यां छां

3.
तुम
ट्विटर पर छां कि नी। नी जल्दी जावा किलै कि ट्विटर पर एक खास आदमी उणी फॉलो कन सी तुम जिती सकदां 60 करोड़। जी हां, मी मजाक नी छों कनु। छन युसाकु मइजावा। जापान कु एक बौत अमीर कारोबारी ची। येन घोषणा करीं कि अफड़ा 1000 ट्विटर फॉलोअर उणी ये 60 करोड़ रुप्या द्याणन। शर्त सिर्फ यथगी चीकि पैसा तौं ही मिलण जोन भाईसाब की 1 जनवरी की पोस्ट रिट्वीट करी वली। अब तुम सोचला कि ये उणी बौअ नी लैगी कखी। भई जवाब यु ची कि हां थोड़ा बौत जरूर बौएगी यू। भाईसाब कु बौलणु कि यूं पैसा बांटीक वु देखण चांदू कि क्या लोगों का जीवन मां ये सी खुशी आंदी की नी।त् ब्वाला बलनेकी और पूछपूछ. तदी मात पैसा देखिक कुछ दिन खुशी आली ही।

4.
त्
बैजी अब बात आपकी थाली की। बल उनी त् प्याज खरीदणु अब मुश्किल वैग्याई। और वक्त यनी एग्याई कि जु आज प्याज खरदणु , तै उणी बिना मांगिक अमीर आदमी कु दर्जा मिलणु च। पर अब तुम्हारी थाई सी मटर भी गायब व्है सकदु। जी हां. हमारी सराकर् दिसंबर मां मटर कु आयात कम कर्याली। कम कन की वजह सी अब आशंका कि मटर कु दाम 100 फीसदी तक बढ़ी सकदु। यानि प्याज का बाद कभी कभार जु तुम मटर खांदा छई, सु कभीकभार भी नी वई पौण्या। चल ब्वन भी क्या। तुम CAA और NRC का विरोध और समर्थन मां बिजी छां और सरकार ग्विंडा पिछाड़ी बटी तुम्हारी थाई उणी हल्की कनी चा।

5.
अब
बात जम्मूकश्मीर की। 370 हटणा का बाद घाटी मां जु हालात बण्या छिन। तौं पर सुप्रीम कोर्ट्न फैसला सुण्याली। 370 हटणा का बाद सी ही घाटी मां इंटरनेट सेवा और अन्य कई सेवा बंद छाई। ये पर सुप्रीम कोर्ट्न बोली कि इंटरनेट इस्तेमाल कनु हर नागरिक कु मौलिक अधिकार च। कोर्टन् सरकार उणी घाटी मां लगीं पाबंद्यों की समीक्षा कनुकु आदेश दियाली भाई। ल्यावा त् देखा बल जरा। यख तुम डेटा पैक खत्म व्हण की चिंता मां डुब्यां छनऔर वख लोग इंटरनेट भी इस्तेमाल नी करी सकणा छिन। क्या ब्वन तब। 

अब बात उत्तराखंड की।

6.
भई
पिछला हफ्ता की सबसी बड़ी खबर याच कि पूरा उत्तराखंड मां द्याण खूब पड़ी। द्याण खूब पड़ी लोगुन व्हाट्सऐप पर भी खूब स्टेटस डायन। द्याणन् ये बार सालों कु रिकॉर्ड तौड्याली। जौनसार में जथा द्याण ये बार पड़ी, तथगा 40 साल पैली पड़ी छाई। गौं मां रण वावा द्याण कु आनंद छई ल्याणा और परदेशु मां रैण वावा गौं वावु कु व्हाट्सऐप स्टेटस देखिक रैन जी मसोसणा। त् बैजी बोलियाली छई पलायन करा दों। पलायन नी व्हंदू मोबाइल पर द्याण देखणा कि नौबत ही किलै आण छै।

7.
उत्तराखंड मां उनी घुमणाक कई जगह छिन। पर अब सरकार जु 13 और टूरिस्ट डेस्टिनेश बणाणी छ। ये खातिर शंघाई कु न्यू डिवेलपमेंट बैंक 1200 करोड़ रुप्या देणु छ। 13 डिस्ट्रिक्ट– 13 डेस्टिनेशन योजना का तहत यु काम व्हण। अब देखण पड़लु कि उत्तराखंड्यों का खातिर या योजना कति फायदेमंद होंदी और क्या या योजना पलायन कुछ कम कन मां मदद करी सकदी कि न।

8.
द्याण पैण सी भला ही हम खुश छां होंणा पर ये सी एक खतरा भी पैदा व्हैगी। दरअसल उत्तराखंड का पाड़ी क्षेत्र में लगातार द्याण पैण सी रीख उणी खाणु नी मिलणु। रीख मतलब भालु, अगर तुम नी जाणदा व्हला जु। खाणा की तलाश मां भालु घाटी वाई जगों पर आणु। मुनस्यारी और धारचुला मां रीख दिखे गैनी। रीख दिख्याण की सबसी बड़ी चिंता या कि ये सी इंसानु दगड़ी रीख कु संघर्ष वै सकदू। जैमा ज्यादातर मनखी कु ही नुकसान व्हंदू।

9.
टिहरी का चंबा का रैण वावा बैज्यों खुशखबरी च। स्वच्छ भारत मिशन का तहत टिहरी गढ़वाल कु चंबा ओडीएफ प्लस प्लस शहर घोषित व्हैगे। चंबा सैर पैली निकाय जु खुला मां शौच मां डबल प्लस हासिल करी। ब्वान कु मतलब यू कि चंबा मां अब क्वी ड्वाखरा फंडु और गदरा दारा नी जांदु लुठ्या लीक. वनी लुठ्या की जरूरत भी क्या बै, गदरा मां पाणी रई ही जांदू। ओडीएफ प्लस प्लस घोषित व्हण कु मतलब कि चंबा मां अब हर घर पर शौचालय च। शौचालय का साथ ही सीवरेज सेफ्टी टैंक सिस्टम भी लग्यूं च। भईउत्तराखंड का और गौं तुम भी सिखा और स्वच्छता की मिसाल बणा भै।

10.
और आखिर मां एक गर्व वाई खबर। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो न् एक रिपोर्ट पब्लिश करी। रिपोर्ट का मुताबिक उत्तराखंड बूढ बुढ्यों का खातिर सबसी सुरक्षित राज्य च। यानि हम अफड़ा बुजर्गों की इज्जत करण जाणदा छां. सिर्फ यू नी, डकैती, लूट और चोरी का मामला सामान वापस बरामद कन का मामला मां भी उत्तराखंड नंबर वन स्थान पर ची भै। त् भायों गर्भ करा और मस्त रा। और उत्तराखंड तैं बढ़ोंदी रा।

गढ़वई समाचार मां आज इथगा ही। तुम उणी हमारी या समूण कन लगी। जरूर बतायां और अफड़ु सुझाव भी जरूर दियां। पसंद आली शेयर भी जरूर कर्यां. हम उणी भी हौसला मिललु।

समाचार पढियाली… अब सुणा भी दौं

क्या ऐसे ‘पढ़ेगा इंडिया-बढ़ेगा इंडिया?’

पूरे देश में पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा इंडिया का नारा लगाया जाता है, लेकिन ये सिर्फ नारा ही साबित हो रहा है। पहले पिथौरागढ़ में छात्र पुस्तकों की खातिर सड़कों पर उतरे थे। अब टिहरी गढ़वाल जिले की घनसाली तहसील के भिलंगना ब्लॉक में बच्चे सड़क पर उतर आए हैं। वजह है- शिक्षा और शिक्षा के ठेकेदारों की अनदेखी

उत्तराखंड के टिहरी जिले की भिलंगना ब्लॉक में हलचल मची हुई है। ये हलचल मचाई है कुछ बच्चों ने, जो शिक्षा के अपने अधिकार की खातिर लड़ रहे हैं। घनसाली तहसील के भिलंगना ब्लॉक के धोपड़धार में स्थित राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज के बच्चे सड़क पर उतर आए हैं। 26 नवंबर से कॉलेज के बच्चे कॉलेज अटेंड करने के बाद मुख्य बाजार में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

दरअसल धोपड़धार स्थित राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज में 8 विषयों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है। कुछ विषयों के लिए शिक्षकों का पद 2009 से 2017 के बीच खाली हो गया था। लेकिन अब तक इन पर कोई भर्ती नहीं हुई है। शिक्षकों की कमी का ये सिलसिला खत्म होने की बजाय बढ़ा ही है। सन 2009 में जहां सिर्फ एक शिक्षक पद खाली था। आज 2019 में इनकी संख्या 8 हो गई है।

आंदोलन की एक तस्वीर

आंदोलन की एक तस्वीर

कॉलेज में प्रिंसिपल ही नहीं

सिर्फ शिक्षक ही नहीं, बल्कि स्कूल में प्रिंसिपल भी नहीं हैं। आंदोलन से जुड़े संजय बडोनी ने बताया कि 29 जुलाई, 2019 को इस संबंध में शिक्षा निदेशालय को ज्ञापन सौंपा गया था। लेकिन इस मामले में कोई भी एक्शन नहीं लिया गया। काफी इंतजार करने के बाद छात्रों ने 25 नवंबर को खंड शिक्षा अधिकारी तक बात पहुंचाई। जिलाधिकारी तक भी बात पहुंचा दी गई है।जिलाधिकारी ने आश्वासन तो दिया है लेकिन इस बार बच्चे रुकना नहीं चाहते।

आंदोलन में उतरे लोग

आंदोलन में उतरे लोग

बच्चे सड़क पर उतरते हैं। हाथ में तख्ती लेकर सरकार और प्रशासन से शिक्षकों की नियुक्ति की गुहार लगा रहे हैं। ‘हे सरकार बजट न व्यर्थ करो, शिक्षा पर भी कुछ खर्च करो’, पढ़ लिखकर आगे बढ़ेंगे, बिना शिक्षक कैसे पढ़ेंगे? … जैसे नारों से छात्र अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं.

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे समाजसेवी नित्यनंद कोठियाल ने बताया कि धोपड़धार स्थित इस कॉलेज में वर्तमान में 6 से 12वीं की कक्षाएं चलती हैं। इस कॉलेज में क्षेत्र के 10 से भी ज्यादा गांवों के बच्चे पढ़ते हैं। सिर्फ यही नहीं, इन गांवों के छात्रों के लिए 12वीं की पढ़ाई के लिए यहां ये एकमात्र कॉलेज है। कॉलेज में मौजूदा समय में करीब 520 छात्र पढ़ते हैं। लेकिन शिक्षकों की लगातार घटती संख्या से छात्र रोष में हैं।

पोस्टरों के जरिये विरोध

पोस्टरों के जरिये विरोध

आंदोलन से जुड़े बच्चों का कहना है कि जब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो जाती। तब तक हम रुकेंगे नहीं। छात्रों का कहना है कि इस बार आंदोलन रुका तो शायद फिर से शिक्षकों की नियुक्ति की बात ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी। बच्चे 26 नवंबर से हर दिन धोपड़धार बाजार में जमा होते हैं और पोस्टर, नारों और कविताओं के जरिये अपनी बात रखते हैं।

बच्चों के इस आंदोलन को अब अभिभावकों का भी साथ मिलने लगा है। बड़ी संख्या में अभिभावक भी बच्चों के इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं।

लठ पंचायतः न सरकार-न प्रशासन, एक लाठी जो चलाती थी उत्तराखंड

एक लाठी। लकड़ी की वह लाठी जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा करती थी। वह इंसानों के बीच होने वाले झगड़ों को सुलझाती थी। और हर गांव के अच्छे-बुरे फैसले लेती थी वो लाठी।… इस लाठी से ही तैयार हुई लठ पंचायत। उत्तराखंड के गांवों से आज लठ पंचायत लगभग लुप्त हो चुकी है। कुछ ही जगहों पर इसका प्रारूप देखने को मिलता है। इस वीडियो में हम  आपको इस अद्भुत लाठी की लोक कहानी और इससे बनी लठ पंचायत के बारे में बताने वाले हैं। 

शुरुआत लोक कथा से

लठ पंचायत की शुरुअात होेने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उत्तराखंड में आज भी इस संबंध में वो लोककथा प्रचलित है। लोककथा के मुताबिक पहाड़ के गांव और यहां के पंच अपने स्तर पर सही न्याय और हर किसी की जरूरतों का ख्याल रखते थे। यह देखकर एक गांव में रहने वाले साधु ने उस गांव के पंचों को एक लाठी दी। साधु ने इस लाठी को अद्भुत बनाया। साधु ने पंचों से कहा कि ये दिव्य लाठी है। ये मैं तुम्हें दे रहा हूं। यह तुम्हारी और तुम्हारे गांव की रक्षा करेगी। लेकिन शर्त यह है कि इस लाठी का उपयोग निजी फायदे के लिए नहीं होना चाहिए। इसे समाज कल्याण की खातिर इस्तेमाल करना होगा। और इसी शर्त के साथ वह लाठी पंचों को मिली। अगर शर्त नहीं मानी गई तो लाठी की सारी शक्तियां खत्म हो जाएंगी। 

क्या है लठ पंचायत?

जब पंचों को ये लाठी मिली तो उन्होंने इसका इस्तेमाल पूरे पहाड़ की खातिर करने की ठानी।… बैठक बुलाई गई और हर गांव का जंगल, खेत और अन्य संपदा को बराबर बांटा गया।…इसके साथ ही हर गांव लठ पंचायत का गठन किया गया। लठ पंचायत का काम गांव की भलाई के लिए और अपनी वन संपदा को सुरक्षित रखना था।… गांव में होने वाली पैदावार और उससे होने वाली कमाई को भी बराबर बांटा जाता था। इस तरह उत्तराखंड के हर गांव में लठ पंचायत की शुरुआत हुई। आज लुप्त होने के कगार पर खड़ी लठ पंचायत सैकड़ों साल पहले से उत्तराखंड में थी। जिस गांवों में लठ पंचायत होती थी, उस गांव में न प्रशासन और ना ही सरकार का ज्यादा दखल होता था। गांव के हित के सभी फैसले लठ पंचायत लेती थी। 

उस लाठी का क्या हुआ?

जब लठ पंचायत बनी और वन से लेकर जगह-जमीन की सीमा तय की गई, तो उनकी सुरक्षा करने की जरूरत भी खड़ी हुई। ऐसे में दिव्य लाठी को इसका सूत्रधार बनाया गया। वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी हर दिन गांव के किसी एक परिवार को दी जाती।…जिस दिन जिस परिवार की बारी होती है, उस दिन दिव्य लाठी उसके घर पर रखी जाती थी। लाठी का घर पर होने का मतलब होता थी कि वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी उस परिवार की होती थी।… आज भी कई जगहों पर ये प्रथा है लेकिन अलग-अलग स्वरूपों में।

लठ पंचायत के सदस्य और काम

लठ पंचायत के सदस्यों में गांव के पुरुष शामिल होते थे। महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया जाता था। जिस तरह आप आज कई गांवों पंचों की भूमिका देखते हैं। उसी तरह ही लठ पंचायत पंच शामिल होते थे। ये पंच गांव में कोई झगड़ा-फसाद या फिर कोई भी मामला उठता तो उसकी निष्पक्ष सुनवाई करते थे। इस दौरान वो अद्भुत लाठी भी साथ रहती। लठ पंचायत के नियम न कहीं लिखे रहते और न ही कोई इनका रिकॉर्ड रखता। ये सिर्फ आपसी समझ-बूझ और पंचों के फैसले का सम्मान करने के रूप में होता था।

कई जगह आज भी मौजूद ये प्रथा

उत्तराखंड के कई गांवों में आज भी ये प्रथा मौजूद है। बस इसका स्वरूप बदल चुका है। ज्यादातर गांवों में लठ पंचायत की जगह अब वन पंचायत ने ले ली है। जिसका लिखित रिकॉर्ड है और जो सरकार की तरफ से संचालित होती है। लठ पंचायत कहां और कितनी है, इसका कोई सीधा-सीधा रिकॉर्ड नहीं है। क्योंकि हमारी सरकारों ने कभी इनका रिकॉर्ड रखने की कोई जहमत नहीं उठाई। लेकिन आज भी कुछ गांवों में लठ पंचायत का स्वरूप है। टिहरी गढ़वाल और चमोली के कई गांवों में गांव वाले अपने जंगल, अपने घास की रक्षा के लिए इस दिव्य लाठी का सहारा लेते हैं। 

इन गांवों में कुछ महीनों में खासकर भादों के महीने में हर परिवार को घास और जंगल की रक्षा के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। जिस दिन जिस परिवार की बारी, उस दिन उसके घर पर लाठी जाती है। कई गांवों में खेतों से बंदरों और सूअरों को भगाने के लिए ये स्वरूप अपनाया जाता है। कई गांवों में अब ये काम चौकीदारों को दिया जाता है। एक चौकीदार नियुक्त कर के उसे पूरे गांव पैसे जमा कर के देते हैं। इस तरह उसकी तनख्वाह दी जाती है। 

अब कहां है वो दिव्य लाठी?

वो दिव्य लाठी, जो उस साधु ने दी थी। वह आज भी उत्तराखंड के किसी न किसी गांव में मौजूद है और किसी न किसी के घर में दरवाजे के पीछे रखी होगी। उस परिवार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए। दिव्य लाठी की ये लोककथा न जाने कितनी सच है? लेकिन इसकी वजह से शुरू हई ये लठ पंचायत की प्रथा उत्तराखंड को शुद्ध और सुरक्षित रखने में कारगर रही है। शायद उस लाठी की यही दिव्यता थी कि उसने उत्तराखंड के सारे गांवों को एकजुट रखा और वन संपदा की रक्षा के लिए प्रेरित किया। 

हमारी सरकार को चाहिए कि अगर कहीं भी लठ पंचायत आज भी जीवित है तो उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए। सहेजा जाए। क्योंकि ये हमारी धरोहर है। जिसने उत्तराखंड को हरा-भरा और खुशहाल बनाने में अहम भूमिका निभाई है।