‘आप’ की उम्मीदों का पहाड़ चढ़ेगा पहाड़ी?

भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ की अब उत्तराखंड पर नजर है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में घोषणा की कि उनकी पार्टी 2022 में उत्तराखंड की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनका दावा है कि उन्होंने उत्तराखंड में सर्वे करवाया। सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि ‘आप’ को उत्तराखंड में चुनाव लड़ना चाहिए। 

कई मोर्चों पर दिल्ली की सूरत बदल कर रख देने वाले केजरीवाल के सामने पहाड़ की कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे अभी तक उनका सामना नहीं हुआ है। और जो चुनौतियां 20 सालों से कमोबेश जस की तस हैं।

उम्मीद की किरण ‘आप’
9 नवंबर, 2000 वो तारीख है, जिस दिन उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। अलग राज्य से उम्मीदें थीं कि सालों से चली आ रही दिक्कतों से निजात मिलेगा। पहाड़ में रोजगार पैदा किए जाएंगे तो पलायन रुकेगा। पहाड़ों में अस्पताल बनेंगे तो जानें बचेंगी। अच्छे स्कूल होंगे तो पहाड़ से ही डॉक्टर-इंजीनियर निकलेंगे। उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, पहाड़ में ही (गैरसैण) राजधानी बनेगी। 

20 साल में क्या बदला?
उत्तराखंड 20 साल का हो चुका है लेकिन जो मांगें 20 साल पहले थीं वो आज भी जस की तस हैं। इन 20 सालों में उत्तराखंड पर सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही कुर्सी बदलती रही है। उत्तराखंड आंदोलन से निकली पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल यानि उक्रांद आपसी झगड़ों और फूट के चलते कहीं नजर भी नहीं आई। लेकिन अब ‘आप’ से उम्मीद कर सकते हैं। 

उत्तराखंड ने बीजेपी और कांग्रेस को आजमाकर देख लिया है। यूकेडी अपना कोई मजबूत आधार यहां खड़ा करने में अभी तक विफल ही रही है। उक्रांद ना मजबूत विपक्ष साबित हो पाई है, ना ही वो कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प बन पाई है। लेकिन ‘आप’ इन दोनों मजबूत पार्टियों का विकल्प बनने की ताकत रखती है। 

दिल्ली का सुधार उत्तराखंड में होगा?
दिल्ली में केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी अचीवमेंट शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए बदलाव माने जाते हैं। उत्तराखंड के परिपेक्ष में देखें तो यहां की भी सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव की है। ‘आप’ के उत्तराखंड में आने से इस उम्मीद को पंख जरूर लगेंगे। और कई ऐसे लोग होंगे जो इस बिना पर ‘आप’ को वोट दे सकते हैं।

गैरसैंण स्थायी राजधानी?
दूसरी मांग, जिसके आधार पर केजरीवाल उत्तराखंड में वोट मांग सकते हैं, वो है- गैरसैंण। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भले ही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया हो लेकिन आम पहाड़ी अभी भी इससे ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। केजरीवाल आम जन की नब्ज पकड़ना काफी अच्छी तरह से जानते हैं। और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा उनके घोषणापत्र में सबसे ऊपर हो सकता है।

फ़्री बिजली ने कांग्रेस के इरादों पर फेरा पानी!
मार्च 2020 में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि 2022 में सत्ता में आने पर फ्री बिजली और पानी देंगे। जब उन्होंने यह घोषणा की थी, तब ‘आप’ के मैदान में आने की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। हरीश ने जिस केजरीवाल मॉडल पर चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई थी, वो कांग्रेस के लिए ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि केजरीवाल फ्री बिजली और पानी के वादे के साथ मैदान में उतरेंगे।

कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी दिल्ली की तरह लोकल मुद्दों पर लड़ती दिखेगी। लोकल मुद्दे यानि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और राजधानी। दिल्ली का रिपोर्ट कार्ड और प्रवासी उत्तराखंडियों के बूते उत्तराखंड में ‘आप’ मजबूत जनमत हासिल करती दिखेगी। 

20 साल से पहाड़ का जनमानस कांग्रेस और बीजेपी का जो विकल्प ढूंढ़ता दिख रहा था,  वो आखिर उसे मिलता दिख रहा है। कांग्रेस और न बीजेपी के लिए एक पहाड़ सी चुनौती बनती दिख रहे हैं- केजरीवाल।

कोरोना काल की एक घटना, जिस पर विश्वास करना मुश्किल पर है सच

एक बुजुर्ग हैं सूरत सिंह। ये घटना 78 साल के सूरत सिंह के 60 सालों की कहानी है। इस बुजुर्ग ने जो किया और अब इसका परिवार जो इसके साथ कर रहा है, वो कितना सही है या कितना गलत? इसका हिसाब आप पूरी कहानी जानने के बाद खुद लगा लें। लेकिन कोरोना काल में जो इस बुजुर्ग ने किया है, उससे तो एक बात साबित हो जाती है कि आप दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाएं। आखिर में आपको अपनी मिट्टी और अपने घर आना ही पड़ता है। 

Surat Singh

सूरत सिंह

इस तस्वीर को जरा ध्यान से देखिये। इस तस्वीर में दिख रहा ये बुजुर्ग सूरत सिंह है। सूरत सिंह के चेहरे पर उम्मीद है, पछतावा है और माफी पाने के लिए बिलख रही आंखें हैं। दरअसल 78 साल के सूरत सिंह तकरीबन 60 साल बाद अपने घर लौटे हैं।

सूरत सिंह 18 साल की उम्र में घर छोड़कर चले गए थे। अब कोरोना काल में उन्होंने घर वापसी की है। उत्तरकाशी के जेस्तवाड़ी के रहने वाले सूरत सिंह अभी तक हिमाचल में थे। वह हिमाचल में सेब के बगानों में काम किया करते थे। कोरोना की वजह से कामकाज ठप हुआ तो सूरत सिंह ने भी अपने गांव वापस आने की अर्जी दे दी। लेकिन सूरत सिंह जब घर लौटे तो उनके परिवार ने उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए। और ऐसा करने के लिए परिवार के पास भी काफी बड़ी वजह है। 

आखिर क्यों किए दरवाजे बंद?
हुआ कुछ यूं था कि जब सूरत सिंह घर छोड़कर चले गए थे। तब वह महज 18 साल के थे और उनकी पत्नी 16 साल की। इस दौरान उनके बच्चे भी हो चुके थे। इन 60 सालों के दौरान परिवार ने उन्हें काफी खोजने की कोशिश की। पता चला कि वो हिमाचल में हैं। परिवार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई।  सूरत सिंह से अपील की कि वो वापस घर आ जाएं। परिवार की इन मिन्नतों का उन पर कोई असर नहीं हुआ।

अब जब सूरत अपने गांव वापस लौटे हैं तो उनकी पत्नी का कहना है कि अब उनका सूरत सिंह से कोई वास्ता नहीं है। उनका ये गुस्सा जायज भी है  क्योंकि इतने सालों तक उस महिला ने अपने बच्चों को अकेले पाला बिना किसी सहारे के।

सूरत सिंह को उम्मीद है कि उन्हें अपने घर में आसरा मिलेगा। क्वारंटीन सेंटर में रहने के दौरान वो सिर्फ दीवारों को निहारते रहे। उनकी आंखें जैसी अपनी पत्नी से कहना चाहती हों कि गलती हो गई। मुझे माफ कर दे। वो किसी से ज्यादा बात नहीं करते। शायद जो गलतियां उन्होंने की हैं, उनका अब उन्हें पछतावा हो रहा है। 

इस आर्टिकल को लिखने तक हमारे पास उनके अपने घरवालों के साथ होने की जानकारी नहीं है। लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि उनकी पत्नी, जिनका गुस्सा जायज है। जिनकी नाराजगी भी मायने रखती है। उन्हें सहारा दे दें। उन्हें माफ कर दें। 

एक चीज सूरत सिंह ने जरूर महसूस की होगी कि उन्होंने जिंदगी के इतने अहम साल अपने परिवार, अपने बच्चों के बिना गुजारकर बरबाद कर दिए हैं।

प्रवासियों के लिए उत्तराखंड सरकार की ये योजना वरदान है?

20 साल जेल की सजा काटने के बाद ये जब उत्तराखंड स्थित अपने गांव वापस लौटा तो उसने आजादी के बदले फिर जेल जाना सही समझा। पुष्कर ने अधिकारियों को पत्र लिखे और चेतावनी दी कि अगर उसे जेल में नहीं डाला गया तो वो आत्महत्या कर लेगा। जानते हैं क्यों उसने ऐसा किया? पलायन की वजह से। 

2016 में आई आपदा ने पुष्कर के गांव में काफी तबाही मचाई थी। तब से यहां के लोग पलायन कर गए। पुष्कर का गांव खाली हो चुका था। एक भी इंसान गांव में नहीं था। घर खंडहर बन चुके थे और गांव पर जंगली जानवरों का कब्जा हो चुका था। इसीलिए पुष्कर जेल जाना चाहता था। उत्तराखंड की पलायन की पीड़ा कोई नई नहीं है। लेकिन शायद कोरोना वायरस का ये बुरा दौर, पलायन रोकने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा और इसके संकेत भी मिलने शुरू हो गए हैं।

लॉकडाउन से पलायन लॉक होने की उम्मीद

लॉकडाउन से पलायन लॉक होने की उम्मीद

प्रवासी भाइयों सुनना जरा
इस बार जब आप अपने घरदेश जा रहे होंगे, तब बस या ट्रेन से सफर के दौरान एक प्लान तैयार कीजिए। प्लान कभी भी परदेश वापस ना आने का। अब आप सोचेंगे कि ये कैसे होगा? आखिर गांव में रहकर हम क्या खाएंगे-क्या कमाएंगे? तो जवाब ये है कि अब आप अपने घर-गांव रहकर खा भी सकते हैं और कमा भी सकते हैं। इसके लिए जरूरत है तो बस एक प्लान की और सरकार इसमें आपकी मदद करेगी।

आप चाहें तो गांव जाकर एक दुकान खोल लें। छोटा सा ढाबा शुरू कर लें। उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा के बूते कोई कारोबार शुरू करना है तो वो करें। आप जो भी करना चाहते हैं. बेहिचक उसकी तैयारी शुरू करें और सरकार इसमें आपका साथ देगी।

स्वरोजगार पहाड़ में

स्वरोजगार पहाड़ में

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार का नया प्लान
त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना शुरू की है। इसके तहत आप राज्य में दुकान, डेरी, मछली पालन, व्यूटी पार्लर, पशुपालन, मुर्गी पालन समेत कई काम शुरू कर सकते हैं।

इस योजना के तहत सरकार आपको 35 फीसदी तक सब्सिडी देगी। अगर आप दूरस्थ जिलो में कोई यूनिट लगा रहे है या कारोबार शुरू कर रहे हैं तो आपको 25 फीसदी सब्सिडी मिलेगी। अगर आपके प्रोजेक्ट की लागत 25 लाख है तो 6 लाख की रियायत सरकार देगी। बी श्रेणी के जिलों में 20 फीसदी और मैदानी क्षेत्रों में प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए 15 फीसदी सब्सिडी मिलेगी।

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना

मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना

कैसे मिलेगा फायदा?
फायदा उठाने के लिए आपको सिर्फ एक प्लान तैयार करना है। प्लान को लेकर सरकार के पास जाना है। सरकार की तरफ से स्वीकृति मिलते ही बैंक के पास आवेदन जाएगा। बैंक जैसे ही फाइनेंस करने को तैयार होगा, वैसे ही आपको सब्सिडी मिल जाएगी। यानि कारोबार शुरू करने से पहले ही आपको रियायत मिल जाएगी। इस तरह आप बिना तंगी के अपने कारोबार को बढ़ा सकते हैं।

इस योजना की खासियत ही यही है कि आपको शुरुआत में ही मदद मिल जाएगी। आपको सालों तक सब्सिडी मिलने का इंतजार नहीं करना होगा। 

भले ही चीजें थोड़ी मुश्किल हों। आपकी जेब में पैसे ना हों। लेकिन अगर आपको पास एक पुख्ता प्लान है तो आपको जरूर कोशिश करनी चाहिए। ताकि आप अपनी माटी और घर में न सिर्फ रह सको बल्कि उसे बढ़ावा देने में भी योगदान दे सको। 

उत्तराखंड की इस महिला ने जो किया, वो हम शायद सपने में भी नहीं करते

ये खबर देवकी भंडारी के बारे में है। पति का स्वर्गवास हो चुका है। पेंशन से गुजर बसर चल रही है। देश की लाखों वृद्ध महिलाओं की तरह ही देवकी भंडारी का जीवन है लेकिन कुछ दिन पहले देवकी ने एक ऐसा काम किया कि आज पूरा देश उसके सामने नतमस्तक हुआ है।

महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत या देश की आम जनता हो, कोई भी इनकी तारीफ करते थक नहीं रहा है। इस तारीफ की जो वजह है, वो हम और आप जैसे आम लोग शायद सपने में भी नहीं सोचते। और कम से कम इस उम्र में तो कतई नहीं। 

जी हां, 60 साल से ज्यादा उम्र की देवकी भंडारी ने वो कर के दिखाया है, जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया है। एक दिन देवकी सुबह उठती हैं और सीधे बैंक जाती हैं। बैंक में कहती हैं कि मुझे अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वानी है। जीवनभर की जमा पूंजी जो उन्होंने इस FD में रखी थी। 10 लाख की FD उन्होंने तुड़वा दी। सिर्फ इसलिए ताकि वो इस राशि को प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर सके। जी हां, उन्होंने अपने जीवन भर की जमा पूंजी कोरोना से लड़ाई के लिए PM Cares Fund में दान कर दी। 

इस उम्र में 99 फीसदी लोग ये सोचते हैं कि उनकी FD उनके बुढ़ापे का खर्च उठाएगी। लेकिन देवकी ने अपने बुढापे और इसके खर्च के बदले अपने देश की सेवा को प्राथमिकता दी। वो देवकी जो खुद गोचर में किराये के कमरे में रहती हैं। उन्होंने खुद के लिए एक घर लेने की बजाय देश के लिए दान देना ज्यादा जरूरी समझा।

देवकी भंडारी फिलहाल गौचर में किराये के मकान में रहती हैं। पति हुकुम सिंह का 12 साल पहले देहांत हो चुका है। पति का देहांत होने के बाद उन्होंने अपना जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया। देवकी भंडारी जी ने सिर्फ यही दान नहीं किया। वह तो कई निर्धन बच्चों की पढ़ाई और लिखाई का खर्च भी उठा रही हैं।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ट्वीट कर देवकी भंडारी की तारीफ की।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देवकी भंडारी का नमन किया।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने Thank you Devki हैशटैग ट्रेंड करने की अपील की।

केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने भी देवकी के काम को सराहा और न जाने कितने ही ट्वीट और पोस्ट देवकी भंडारी को नमन करते किए गए।

हम भी देवकी भंडारी को सत-सत नमन करते हैं। देवकी भंडारी ने किया वो एक सच्चा देशभक्त ही कर सकता है और हमें गर्व है कि ऐसा देशभक्त रणबांकुरों की हमारी भूमि उत्तराखंड का है। 

थैंक्यू देवकी जी… कोरोना से लड़ाई अब हम जीत ही लेंगे।

वीडियो देखें:

#Lockdown: मुख्यमंत्री जी… जरा इन युवाओं की भी सुन लें

कोरोना वायरस के कहर के चलते पूरे देश में 21 दिन का लॉकडाउन लगा हुआ है। हर किसी के हित में किया गया ये लॉकडाउन कई लोगों के लिए मुसीबत भी बना है। दिहाड़ी-मजदूरी और होटलों में काम करने वालों के लिए ये मुश्किलों भरा दौर है। कुछ ऐसे ही हालात से गुजर रहे हैं मुंबई में फंसे कई उत्तराखंडी युवा।

मुंबई में होटल इंडस्ट्री में काम करने वाले ये युवा सरकार से मदद की अपील कर रहे हैं। दरअसल लॉकडाउन के चलते मुंबई के ज्यादातर होटल बंद हैं। ऐसे में इन होटलों में काम करने वाले कई युवाओं के पास नौकरी नहीं है। कुछ युवाओं को उन्हें होटल से कोई तनख्वाह भी नहीं मिल रही है। ऐसे में इनके सामने लॉकडाउन के दौरान जीवनयापन करना मुश्किल हो गया है।

इन्हीं युवाओं में से एक चंद्रप्रकाश मैठाणी ने छिबड़ाट से बात करते हुए कहा कि हम लॉकडाउन का समर्थन करते हैं। ये हमारी भलाई के लिए ही है, लेकिन अब हमारे लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। वहीं, रामप्रसाद रतुड़ी कहते हैं कि जितने पैसे थे, वो धीरे-धीरे खत्म होने लगे हैं। अब आगे तनख्वाह नहीं आ रही है तो ऐसे में धीरे-धीरे खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा।

चंद्रप्रकाश कहते हैं कि अभी हम एक कमरे में 8 से 10 लोग रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि कई युवा होटल के ही स्टाफ रूम में रहते थे। लेकिन होटल बंद होने के बावजूद स्टाफ रूम भी उन्हें नहीं मिला है। ऐसे में वे अपने दोस्तों के साथ यहां-वहां एडजस्ट कर रहे हैं

इन लोगों के मुताबिक अभी इनके पास रोज खर्च के लिए पैसे हैं, लेकिन धीरे-धीरे वे पैसे भी खत्म होते जा रहे हैं। आने वाले दिनों में इनके पास कमरे का किराया देने के लिए भी पैसों की कमी हो सकती है।

मुंबई से इन युवाओं ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी से अपील की है कि उन्हें कोई सहयोग पहुंचाया जाए। संभव हो तो उन्हें यहां से अपने गांव जाने में मदद की जाए।

जनता कर्फ्यू: आपके घर में राशन पहुंचाएगी उत्तराखंड पुलिस!

कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को कमरों में कैद होने पर मजबूर कर दिया है। हर किसी को अपने घर पर ही रहने की हिदायत दी गई है। ये हिदायत हम सबके लिए है, लेकिन कुछ लोग हैं जो हमारी खातिर एक बड़ा खतरा उठाकर बाहर निकल रहे हैं। और  हमारी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान किया है। इस दौरान सभी लोगों को अपने घर में रहने के लिए कहा गया है। ऐसे मे जनता कर्फ्यू के दौरान आम आदमी के रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती रहें। इसके लिए उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। 

उत्तराखंड सरकार और राज्य पुलिस मिलकर एक बेहतरीन काम कर रही है। जिसकी आप तारीफ किए बिना नहीं रह सकेंगे। दरअसल जनता कर्फ्यू के दौरान आम लोगों को रोजमर्रा के सामान की कमी ना हो इसके लिए राज्य पुलित सड़कों पर उतरेगी। और लोगों के घर-घर जाकर जरूरी सामान डिलीवर करेगी।

आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक डीआईजी अरुण मोहन जोशी ने बताया कि पुलिस, प्रत्येक मोहल्ले में एक दुकान आइडेंटिफाई कर रही है। ये दुकान आवश्यक चीजों को घर-घर तक होम डिलिवरी कराएगी। सिर्फ यही नहीं, इन दुकानों का नंबर और संबंधित थाना चौकियों के नंबर भी लोगों को दिए जाएंगे।

ताकि कुछ भी जरूरत पड़ने पर लोग इन नंबरों पर कॉल कर सकें और जरूरी सामान पहुंचा सकें।

उत्तराखंड पुलिस ने हमेशा खुद को साबित किया है। और हमें गर्व है कि इतने संवेदनशील माहौल में भी वह अपने नागरिकों के हित के लिए सड़कों पर उतर रही है। इंतजाम कर रही है। 

कोरोना वायरस से बचने का तरीका सिर्फ यही है कि आप सावधानी बरतें। और जनता कर्फ्यू हो चाहे कोई और दिन, जितना संभव हो घर पर ही रहें।

राजेंद्र की गलती ये है कि वो पाकिस्तान के कब्जे में नहीं!

7 जनवरी का दिन था। सेना में हवलदार राजेंद्र सिंह नेगी पैट्रोलिंग के दौरान गुलमर्ग में लापता हो गए। 8 जनवरी की सुबह होतेहोते यह खबर हर तरफ न्यूज चैनलों और टीवी पर थी कि भारतीय सेना का एक जवान लापता हो गया है। कुछ ने ये भी कहा कि राजेंद्र फिसलकर पाकिस्तान की सीमा में जा पहुंचा है। जैसे ही खबर आई। वैसे ही राजेंद्र के देहरादून स्थित घर में आम से खास लोगों का तांता लग गया।

8 जनवरी का दिन था और आज फरवरी चुका है, लेकिन राजेंद्र का अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है। राजेंद्र के घर पर भी अब खास यानि नेताओं ने आना बंद कर दिया है। जानते हैं क्यों? क्योंकि अब मीडिया के कैमरे और अखबारों के रिपोर्टरों को राजेंद्र नेगी में कोई रुचि नहीं रह गई है।

राजेंद्र लापता हुआ है, ये उसके परिवार के लिए चिंता है। मीडिया ने हर मुद्दे की तरह इस मुद्दे को भी छोड़ दिया। उत्तराखंड के लोगों ने सरकार से कहा कि जिस तरह उसने झटपट तरीके से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाया, उसी तरह राजेंद्र को भी लाया जाए। लेकिन सरकार के कानों में जूएं रेंगती नहीं दिख रहीं।

खैर, अभिनंदन टीवी चैनलों के लिए TRP था तो दो दिन तक लगातार हर तरफ अभिनंदन चलता रहा। राजेंद्र नेगी लापता हुआ है। तो क्या हुआ वो देश का सैनिक है। तो क्या हुआ कि वो देश की सेवा करतेकरते लापता हुआ है। टीवी चैनलों को अपनी TRP से मतलब है। राजेंद्र की खबर चलाने से वो नहीं रही तो उसे दिखाएंगे भी नहीं।

उम्मीदों में बंधी हैं आंखें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही सैनिकों के नाम पर जितना वोट बटोर लें, लेकिन जब एक सैनिक को खोजने के लिए युद्धस्तर पर काम करने की बात आती है तो वो कम ही नजर रही है। उस पर मीडिया भी TRP के चक्कर में सरकार से सवाल भी नहीं पूछ रहा। और दूसरी तरफ, राजेंद्र के घरवाले अाज भी फोन की घंटी बजने का इंतजार कर रहे हैं। उम्मीदें लगाए बैठे हैं। शायद खबर आएगी और सबके चेहरे पर खुशी छा जाएगी।

अभी तक क्या हुआ?

राजेंद्र नेगी के लापता होने के बाद कुछ औपचारिकताएं पूरी की गई हैं। पहली, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने राजेंद्र को वापस लाने के लिए खोज अभियान तेज करने की अपील की। मुख्यमंत्री जी भी राजनाथ जी को बोलकर चुपचाप सो गए हैं।

खैर, दूसरा अपडेट सेना की तरफ से आया। 13 जनवरी के दिन सेना ने कहा कि 11वीं गढ़वाल राइफल के हवलदार राजेन्द्र सिंह नेगी पाकिस्तान के कब्जे में नहीं है। सेना ने कहा कि 7 जनवरी को जिस स्थान पर यह हादसा पेश आया है, वहां से फिसलकर पाकिस्तान की तरफ जाने की संभावना नहीं है। 

13 जनवरी वो ही तारीख है, जिस दिन तक सभी न्यूज चैनल और न्यूज पोर्टल ताने पड़े थे कि राजेंद्र पाकिस्तान में फंस गए हैं। कइयों ने ये भी कहा कि वह पाकिस्तान के कब्जे में हैं। जब तक पाकिस्तान था, सबने खूब जोरोंशोरों से राजेंद्र के बारे में खबरें लिखीं। ज्यों ही सेना ने साफ किया कि राजेंद्र पाकिस्तान में नहीं हैं तो मीडिया को तो सिर्फ पाकिस्तान में इंटरेस्ट था। उसने राजेंद्र पर खबरें लिखना और बताना बंद कर दिया। क्योंकि अब TRP यानि पाकिस्तान का नाम हट चुका था।

तीसरा अपडेट यह है कि सेना की तरफ से राजेंद्र नेगी की खोजबीन जारी है। हालांकि इसमें सरकार की तरफ से कोई जल्दबाजी या फिर चिंता कहीं नजर नहीँ आती। दूसरी तरफ, अभिनंदन के लिए दिनरात एक करने वाला इंडियन मीडिया राजेंद्र के लिए एक छोटी सी खबर भी नहीं चला पा रहा है।

और हमारे नेता, ये जब वोट मांगने आएंगे तो सेना के जवानों का गुणगान करेंगे। लेकिन जब उन्हें बचाने और उनके लिए कुछ करने की बारी आती है तो ये फिर आंखकान बंद कर सो जाते हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि राजेंद्र नेगी जल्द से जल्द मिल जाएं। हम ये समझते हैं कि राजेंद्र को खोजने में कई दिक्कतें पेश रही होंगी। लेकिन उनके लापता होने पर मीडिया और सरकार की चुप्पी काफी निराशाजनक है।

काश राजेंद्र पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता। कम से कम तब तो सरकार उसे वापस लाने के लिए प्रयास करती। क्योंकि तब मोदी जी वाहवाही लूट पाते। लेकिन ये भी राजेंद्र की गलती है कि वो पाकिस्तान के कब्जे में नहीं है। क्योंकि होता तो वो दूसरा अभिनंदन होता। और मोदी जी से लेकर मीडिया तक उसका अभिनंदन करती। पर क्या करें? वो अभिनंदन नहीं है ना!

जिस तस्वीर को आप व्हाट्सऐप पर शेयर कर रहे हैं, उसने उत्तराखंड में हलचल मचाई है

आजकल सोशल मीडिया पर एक तस्वीर खूब वायरल हो रही है। एक व्हिस्की की बोतल पर हिल टॉप लिखा हुआ है। फेसबुक से लेकर व्हाट्सऐप तक, हर जगह ये तस्वीर शेयर हो रही है। पहली नजर में ये तस्वीर फोटोशॉप से बनाई हुई लगती है, लेकिन उत्तराखंड में इस तस्वीर के पीछे हलचल मची हुई है।

दरअसल हिल टॉप के लेबल वाली ये व्हिस्की उत्तराखंड में शराब फैक्ट्री के विवाद की जड़ है। देवप्रयाग के हिल टॉप पर शराब फैक्ट्री खोली जा रही है। इसके बाद उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में हलचल मची हुई है।

नेटवर्क 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक देवप्रयाग में शराब फैक्ट्री खोलने को कांग्रेस ने मुद्दा बना दिया है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस संबंध में ट्वीट किया है। उसके बाद आम से लेकर राजनेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।

कांग्रेस का कहना है कि जब उनके कार्यकाल में ये प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। तब बीजेपी ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया था। अब चुपचाप इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है।

हरीश रावत ने एक ट्वीट कर इस मुद्दे को उठाया। उनके ट्वीट के बाद ही इस मुद्दे पर बहस शुरू हुई। अब कांग्रेस के बाद राज्य के साधु-संतों ने भी सरकार को दखल देने के लिए कहा है।

साधु-संतों का कहना है कि देवप्रयाग देवों की धरती है। वहां शराब की फैक्ट्री स्थापित करना कतई सही नहीं है।

हरीश रावत ने कुमाऊंनी और हिंदी में ट्वीट किया। उन्होंने ट्वीट में पूछा कि जब वह अपने कार्यकाल में फलों, साग-सब्जियों की एल्कोहल युक्त फ्रूटी बनाने के लिए बात कर रहे थे तब खूब विरोध हुआ था। अब जब धर्मनगरी देवप्रयाग के हिल टॉप में व्हिस्की परोसने के प्रोजेक्ट पर सरकार काम कर रही है तो अब सब क्यों खामोश हैं?

हर उत्तराखंडी को ये एक नंबर हमेशा याद रखना चाहिए

अगर आप उत्तराखंड में रहते हैं या फिर उत्तराखंड के रहने वाले नागरिक हैं, तो आपको एक नंबर अपने दिमाग में नोट कर लेना चाहिए। ये नंबर आपको उत्तराखंड में होने वाली हर दिक्कत से निकलने में मदद करेगा। 

न सिर्फ मदद करेगा बल्कि अगर आप अपने राज्य की योजनाओं के बारे में भी कोई जानकारी चाहते हैं, तो ये नंबर आपके काम आएगा। ये नंबर है- 1905।

किस काम आएगा ये हेल्पलाइन नंबर?
इस हेल्पलाइन नंबर पर आप किसी भी सरकारी विभाग के खिलाफ शिकायत कर पाएंगे। सरकार का दावा है कि इसके जरिये आपकी शिकायत दर्ज हो जाएगी और उसका समाधान किया जाएगा। 

ये हेल्पलाइन राज्य के १३ जिलों में शुरू कर दी गई है। इसके लिए एक कॉल सेंटर भी बनाया गया है। हर दिन सुबह 8 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक इस नंबर पर संपर्क साध सकेंगे। वो भी निशुल्क।

नहीं मिला समाधान तो….?
अगर इस हेल्पलाइन पर कोई समाधान नहीं मिला, तब आप क्या करेंगे तो इसका भी सरकार ने समाधान निकाला है। आपको इस हेल्पलाइन पर कोई समाधान नहीं मिलता है। या फिर कोई आपकी शिकायत नहीं सुनता है तो आप cmhelpline.uk.gov.in पर भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

ये शिकायतें नहीं होंगी दर्ज

न्यायालय में विचाराधीन मामले, सूचना का अधिकार अधिनियम से संबंधित मामले, शासकीय कर्मचारियों के उनकी सेवा से संबंधित मामले 1905 हेल्प लाइन में दर्ज नहीं किए जाएंगे। लेकिन सेवा निवृत्त कर्मचारियों के पेंशन, मेडिकल से संबंधित शिकायतों को हेल्पलाइन में दर्ज किए जाएंगे।

प्रेरणा: कभी बेचते थे चाऊमीन, अब हैं देहरादून के मेयर

उन्होंने कभी पान बेचा, तो कभी चाऊमीन का ठेला लगाया, लेकिन आज वह देहरादून के मेयर बन चुके हैं. हम बात कर रहे हैं सुनील उनियाल गामा की. भाजपा नेता सुनील उनियाल देहरादून के मेयर बन गए हैं. जनता ने उन्हें भारी वोटों से जीत दिलाई है. यह पहली बार था, जब वह देहरादून के मेयर पद के प्रत्याशी बने थे और उन्होंने पहली बार में ही जीत हासिल कर ली.

मूलत: टिहरी गढ़वाल के ढुंगसिर थापली गांव के निवासी सुनील उनियाल का परिवार कई दशकों पहले देहरादून आ गया था. तब से यह परिवार यहीं रहता है. यहां तक कि गामा का जन्म भी देहरादून में ही हुआ है. उनके पिता स्वर्गीय सत्य प्रकाश उनियाल जाने-माने ज्योतिषी और मां प्रेमा देवी गृहिणी थी.

सुनील उनियाल ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और 1981 में पान की दुकान खोल ली. जब यह दुकान नहीं चली, तो नटराज सिनेमा हॉल के बाहर चाऊमीन बेचने लगे. साल 2000 तक उन्होंने यही काम किया. इसी साल अतिक्रमण हटाओ अभ‍ियान चलाया गया. इसमें गामा की दुकान भी हटा दी गई. दुकान हाथ से जाने के बाद उन्होंने करीब 15 साल तक अलग-अलग काम किए. छोटे-मोटे व्यापार में हाथ आजमाया. ठेकेदारी की. इसी दौरान वह भाजपा से जुड़ गए.

उन्होंने भाजपा में रहकर खुद को मजबूत किया. अपनी राजनीतिक समझ विकसित की और संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी. इसी का इनाम पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें मेयर पद का प्रत्याशी बनाकर दिया.

यह पहली बार नहीं है कि गामा किसी चुनाव में खड़े हुए हों. इससे पहले 1989 में उन्होंने 27 वर्ष की उम्र में फालतू लाइन वार्ड से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी सभासद पद पर ताल ठोकी थी.

लेकिन राजनीति के इस नये ख‍िलाड़ी को यहां हार ही हाथ लगी. हालांकि उन्होंने तब से ही ठान लिया था कि वह राजनीति में श‍िखर पर आकर रहेंगे. अपने दृढ़ निश्चय और प्रतिबद्धता से आख‍िर उन्होंने वो श‍िखर हासिल कर लिया.

हम यही उम्मीद करते हैं कि सुनील उनियाल गामा अब देहरादून की बेहतरी के लिए काम करें. और यहां का व‍िकास करने पर ध्यान दें.