पहाड़ के वो मकान जो 1000 साल से सीना ताने खड़े हैं

नदियां एक बार फिर उफान पर हैं। बादल फिर फटने लगे हैं। भारी बारिश से फिर रास्ते बंद हैं। सड़कों पर सैकड़ों लोग फंसे हुए हैं। कई लोग अपने प्राण खो चुके हैं। ये है उत्तराखंड-हिमाचल से आने वाली आजकल की प्रमुख खबरें। प्रकृति का कहर हमेशा की तरह पहाड़ पर उतर रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि यही पहाड़ 1000 साल पहले ही भूकंप से लड़ने का तरीका ढूंढ चुका है?… क्या आपको पता है कि जो सीमेंट के घर आप बना रहे हैं, वही पहाड़ का काल बन रहे हैं? आप भूकंप से बच सकते हैं। बस ‘कोटी बनाल’ को न भूलें।

कोटी बनाल वास्तु कला
आज जो उत्तरकाशी आपदा की सबसे ज्यादा मार झेल रहा है। उसी उत्तरकाशी का एक इलाका है- राजगढ़ी। इस इलाके का भूकंप बाल भी बांका नहीं कर पाया है।… और इसकी वजह है यहां ‘कोटी बनाल’ वास्तुकला शैली से बने मकान। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र यानि DMMC ने इन घरों पर अध्ययन किया है। अध्ययन से पता चला है कि यह निर्माण शैली 1000 साल पुरानी है। इस वास्तुकला में स्थान चयन से लेकर मकान निर्माण तक की पूरी प्रक्रिया होती है। यह शैली आज की आधुनिक भूकंप रोधी तकनीक से भी कहीं ज्यादा मजबूत है।

कैसे बनाए जाते हैं मकान?
मकान बनाने से पहले एक ऊंचे प्लेटफॉर्म का निर्माण किया जाता है। घर में निश्चित अंतराल पर लकड़ी के बीम डाले जाते हैं। ये बीम भूकंप आने पर मकानों पर पकड़ बनाए रखते हैं और उसे गिरने नहीं देते। इस शैली में दीवारों पर ज्यादा जोर देते हुए खिडकी दरवाजे कम रखे गए हैं। अमूमन चार—पांच मंजिला इन घरों की ऊंचाई 15 मीटर से लेकर 20 मीटर तक होती है। उत्तराखंड में अब कहा जाता है कि बहुमंजिला इमारतें न बनाई जाएं, क्योंकि इससे भूकंप का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन कार्बन डेटिंग से पता चला है कि हमारे पुरखों ने ये मकान 1000 साल पहले बना दिए थे… और आज भी ये सीना ताने खड़े हैं।

पहाड़ी मकान ही समाधान
ऐसा नहीं है कि सिर्फ कोटी बनाल वास्तुकला से बने घर ही भूकंप रोधी हैं।… विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ के पारंपरिक घर भी काफी हद तक भूकंप रोधी हैं। पहाड़ी मकान स्थानीय कारीगर स्थानयी सामग्री जैसे पठाल, लकड़ी, पत्थर और लाल मिट्टी से बनाते थे।.. छत और पहली मंजिल का पूरा सहारा लकड़ी की कड़ियों और फट्टों/पटेलों पर होता है। मिट्टी और पत्थर की मोटी दीवारें होने से ये न सिर्फ कड़ाके की ठंड से बचाते हैं, बल्कि गर्मियों में भी कुछ हद तक ठंडक बनाए रखते हैं। अनोखे आकार और अनोखी शैली से बने ये घर काफी हद तक भूकंप रहित भी हैं।… लेकिन धीरे-धीरे आधुनिकता की चमक में हम शहरों से घर आयात कर रहे हैं।… और सीमेंट व ईंटों से घर बनाने पर आमादा हैं।

पुरखों की सुनते तो न होती केदारनाथ आपदा
हमारे पुरखों ने पहाड़ की प्रकृति के अनुसार ही यहां रोटी-कपड़ा और मकान का इंतजाम किया था। उत्‍तराखंड के पुराने लोगों ने परंपरागत ज्ञान को लोक गीतों और कथाओं के जरिए आगे बढ़ाया। पुराने समय में एक कहावत कही जाती थी कि नदी किनारे जिसने मकान बनाया, उसका परिवार कभी नहीं पनपा। और हम अपने पुरखों की कही हुई बातें नजरअंदाज़ करते हुए नदी किनारे घर-होटल बनाते रहे… और इसी का परिणाम थी केदारनाथ आपदा।

पारंपरिक घर बनाएं…इनाम पाएं
उत्तराखंड में अगर आप पहाड़ों की पारंपरिक शैली से घर बनाते हैं तो आपको फायदा होगा। राज्य की नई भवन निर्माण नीति के अनुसार अब जो भी व्यक्ति राज्य की पारंपरिक शैली से घर या होटल बनाएगा उसको बाकी आधुनिक भवनों की अपेक्षा एक मंजिल और बनाने की छूट दी जाएगी!… हमें पारंपरिक शैली के घर सिर्फ इसलिए नहीं बनाने चाहिए कि इनाम मिल रहा है, बल्कि भूकंप से खुद को बचाने के लिए और अपनी पौराणिक कला के संरक्षण के लिए बनाने चाहिए।… वरना हर साल खबरें वही होगीं… आज आपके करीबी गांव में हुआ है… कल आपके गांव में होगा… और परसों आपके घर में।

लठ पंचायतः न सरकार-न प्रशासन, एक लाठी जो चलाती थी उत्तराखंड

एक लाठी। लकड़ी की वह लाठी जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा करती थी। वह इंसानों के बीच होने वाले झगड़ों को सुलझाती थी। और हर गांव के अच्छे-बुरे फैसले लेती थी वो लाठी।… इस लाठी से ही तैयार हुई लठ पंचायत। उत्तराखंड के गांवों से आज लठ पंचायत लगभग लुप्त हो चुकी है। कुछ ही जगहों पर इसका प्रारूप देखने को मिलता है। इस वीडियो में हम  आपको इस अद्भुत लाठी की लोक कहानी और इससे बनी लठ पंचायत के बारे में बताने वाले हैं। 

शुरुआत लोक कथा से

लठ पंचायत की शुरुअात होेने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उत्तराखंड में आज भी इस संबंध में वो लोककथा प्रचलित है। लोककथा के मुताबिक पहाड़ के गांव और यहां के पंच अपने स्तर पर सही न्याय और हर किसी की जरूरतों का ख्याल रखते थे। यह देखकर एक गांव में रहने वाले साधु ने उस गांव के पंचों को एक लाठी दी। साधु ने इस लाठी को अद्भुत बनाया। साधु ने पंचों से कहा कि ये दिव्य लाठी है। ये मैं तुम्हें दे रहा हूं। यह तुम्हारी और तुम्हारे गांव की रक्षा करेगी। लेकिन शर्त यह है कि इस लाठी का उपयोग निजी फायदे के लिए नहीं होना चाहिए। इसे समाज कल्याण की खातिर इस्तेमाल करना होगा। और इसी शर्त के साथ वह लाठी पंचों को मिली। अगर शर्त नहीं मानी गई तो लाठी की सारी शक्तियां खत्म हो जाएंगी। 

क्या है लठ पंचायत?

जब पंचों को ये लाठी मिली तो उन्होंने इसका इस्तेमाल पूरे पहाड़ की खातिर करने की ठानी।… बैठक बुलाई गई और हर गांव का जंगल, खेत और अन्य संपदा को बराबर बांटा गया।…इसके साथ ही हर गांव लठ पंचायत का गठन किया गया। लठ पंचायत का काम गांव की भलाई के लिए और अपनी वन संपदा को सुरक्षित रखना था।… गांव में होने वाली पैदावार और उससे होने वाली कमाई को भी बराबर बांटा जाता था। इस तरह उत्तराखंड के हर गांव में लठ पंचायत की शुरुआत हुई। आज लुप्त होने के कगार पर खड़ी लठ पंचायत सैकड़ों साल पहले से उत्तराखंड में थी। जिस गांवों में लठ पंचायत होती थी, उस गांव में न प्रशासन और ना ही सरकार का ज्यादा दखल होता था। गांव के हित के सभी फैसले लठ पंचायत लेती थी। 

उस लाठी का क्या हुआ?

जब लठ पंचायत बनी और वन से लेकर जगह-जमीन की सीमा तय की गई, तो उनकी सुरक्षा करने की जरूरत भी खड़ी हुई। ऐसे में दिव्य लाठी को इसका सूत्रधार बनाया गया। वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी हर दिन गांव के किसी एक परिवार को दी जाती।…जिस दिन जिस परिवार की बारी होती है, उस दिन दिव्य लाठी उसके घर पर रखी जाती थी। लाठी का घर पर होने का मतलब होता थी कि वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी उस परिवार की होती थी।… आज भी कई जगहों पर ये प्रथा है लेकिन अलग-अलग स्वरूपों में।

लठ पंचायत के सदस्य और काम

लठ पंचायत के सदस्यों में गांव के पुरुष शामिल होते थे। महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया जाता था। जिस तरह आप आज कई गांवों पंचों की भूमिका देखते हैं। उसी तरह ही लठ पंचायत पंच शामिल होते थे। ये पंच गांव में कोई झगड़ा-फसाद या फिर कोई भी मामला उठता तो उसकी निष्पक्ष सुनवाई करते थे। इस दौरान वो अद्भुत लाठी भी साथ रहती। लठ पंचायत के नियम न कहीं लिखे रहते और न ही कोई इनका रिकॉर्ड रखता। ये सिर्फ आपसी समझ-बूझ और पंचों के फैसले का सम्मान करने के रूप में होता था।

कई जगह आज भी मौजूद ये प्रथा

उत्तराखंड के कई गांवों में आज भी ये प्रथा मौजूद है। बस इसका स्वरूप बदल चुका है। ज्यादातर गांवों में लठ पंचायत की जगह अब वन पंचायत ने ले ली है। जिसका लिखित रिकॉर्ड है और जो सरकार की तरफ से संचालित होती है। लठ पंचायत कहां और कितनी है, इसका कोई सीधा-सीधा रिकॉर्ड नहीं है। क्योंकि हमारी सरकारों ने कभी इनका रिकॉर्ड रखने की कोई जहमत नहीं उठाई। लेकिन आज भी कुछ गांवों में लठ पंचायत का स्वरूप है। टिहरी गढ़वाल और चमोली के कई गांवों में गांव वाले अपने जंगल, अपने घास की रक्षा के लिए इस दिव्य लाठी का सहारा लेते हैं। 

इन गांवों में कुछ महीनों में खासकर भादों के महीने में हर परिवार को घास और जंगल की रक्षा के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। जिस दिन जिस परिवार की बारी, उस दिन उसके घर पर लाठी जाती है। कई गांवों में खेतों से बंदरों और सूअरों को भगाने के लिए ये स्वरूप अपनाया जाता है। कई गांवों में अब ये काम चौकीदारों को दिया जाता है। एक चौकीदार नियुक्त कर के उसे पूरे गांव पैसे जमा कर के देते हैं। इस तरह उसकी तनख्वाह दी जाती है। 

अब कहां है वो दिव्य लाठी?

वो दिव्य लाठी, जो उस साधु ने दी थी। वह आज भी उत्तराखंड के किसी न किसी गांव में मौजूद है और किसी न किसी के घर में दरवाजे के पीछे रखी होगी। उस परिवार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए। दिव्य लाठी की ये लोककथा न जाने कितनी सच है? लेकिन इसकी वजह से शुरू हई ये लठ पंचायत की प्रथा उत्तराखंड को शुद्ध और सुरक्षित रखने में कारगर रही है। शायद उस लाठी की यही दिव्यता थी कि उसने उत्तराखंड के सारे गांवों को एकजुट रखा और वन संपदा की रक्षा के लिए प्रेरित किया। 

हमारी सरकार को चाहिए कि अगर कहीं भी लठ पंचायत आज भी जीवित है तो उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए। सहेजा जाए। क्योंकि ये हमारी धरोहर है। जिसने उत्तराखंड को हरा-भरा और खुशहाल बनाने में अहम भूमिका निभाई है।