नरेंद्र सिंह नेगी का ‘नॉन-सिंगिंग’ इंटरव्यू, हर ज़रूरी मुद्दे पर बात

आप अगर उत्तराखंड के हैं तो आपने नेगी दा के गीतों को ज़रूर सुना होगा। नेगी दा यानि गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी। नेगी दा का जब भी इंटरव्यू लिया जाता है तो हमेशा बातें उनके गीतों को लेकर और उनके सफ़र पर होती है। लेकिन यहाँ जो इंटरव्यू में हम आपको बीच पेश कर् रहे हैं। ये कई मामलों में अलग है।

इस इंटरव्यू में आपको नेगी दा के उस सफ़र के बारे में पता चलेगा जो आपने अभी तक ना कहीं पढ़ा है और शायद देखा भी नहीं होगा। तो चलिए शुरू करते हैं- नेगी दा का NON-SINGING INTERVIEW। यहाँ पेश किया जा रहा ये इंटरव्यू नेगी दा से फ़ोन पर हुई बातचीत का हिस्सा हैं। 

नेगी दा। कोरोना के इस काल में आप कहां रह रहे हैं और क्या कर रहे हैं?
कोरोना काल में मैं अपने पौड़ी गाँव आया हूं। पिछले तीन चार महीने से यही हूं। फ़िलहाल मैंने यूट्यूब पर एक सीरीज़ शुरू की है। ‘गीत भि गीत की बात भि’। इस सीरीज़ में मैं अपने गीतों के पीछे की कहानी बता रहा हूं। वैसे हर गीत के पीछे कहानी तो नहीं होती, लेकिन जिनमें है। वो यहाँ शेयर कर रहा हूं। अभी तक 7 भाग आ गए हैं इसके। श्रृंखला अभी भी जारी है।

नेगी दा का नया गीत कब आ रहा है?
अभी मैंने एक गीत गाया था- जख मेरी माया रौंदी। लेकिन अब गीत निकालना काफ़ी महँगा हो गया है। पहले तो कैसेट कंपनियाँ पैसे खर्च करती थीं। अब तो गायकों को ख़ुद खर्च करना पड़ता है। गाना रिकॉर्ड करने से लेकर उसकी शूटिंग तक, लाख-दो लाख रुपये लग जाते हैं। इतनी व्यवस्था कर पाना आसान नहीं है। 

मुझे गीत गाते-गाते 45 साल से ज़्यादा का वक़्त हो गया है। अब वो उत्साह भी नहीं है। नए बच्चे ला रहे हैं। उन्हें लाना भी चाहिए क्योंकि ये उनके लिए बेहतर है। 

मेरा गीत लिखने और रचनाएँ सुधारने का काम जारी है। चाहता मैं भी हूँ कि कोई गीत लाऊँ लेकिन अब गीत निकालना काफ़ी महँगा हो गया है। लेकिन जल्द ही कोशिश करेंगे कोई नया गीत लाने की। जल्द ही लाएंगे। 

नेगी दा भारत के कई क्षेत्रीय सिनेमा हैं जो तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। आप भोजपुरी सिनेमा ही देख लीजिए, जिसकी पहुँच अब देश-विदेशों तक हो गई है। लेकिन इसके मुक़ाबले में हमारा उत्तराखंडी सिनेमा ठप पड़ा हुआ दिखाई देता है। क्या आपको नहीं लगता कि इस मामले में सरकार को कुछ करना चाहिए?
देखिये। मेरा मानना है कि कला और संस्कृति के मामले में सरकार को बाहर ही रहने दें। फ़िल्में सरकार नहीं बनाती। निर्माता बनाते हैं। ये भाषा, संस्कृति और कला हमारी है। सरकार को इसकी क्या पड़ी है?

सरकार अगर दख़लंदाज़ी करेगी तो अपनी बात भी फ़िल्मों में डालेगी। आजतक ऐसा तो हुआ नहीं है कि सरकार फ़िल्म बना रही हो। फ़िल्म तो वहाँ के लोग बनाते हैं जिन्हें अपनी संस्कृति, भाषा और कला से प्रेम है। जिनके दिमाग़ में उत्तराखंड कि चिंता, यहाँ की तकलीफ़ है। वही लोग फ़िल्म बनाएंगे। सरकार बनाएगी तो अपने प्रचार के लिए बनाएगी। 

बॉलीवुड में उत्तराखंड के कई कलाकार हैं। निर्माता से लेकर एक्टर, गायक तक सब भरे पड़े हैं। तो क्या आपको नहीं लगता कि इन लोगों को उत्तराखंडी सिनेमा बनाना चाहिए। ताकि इनके साथ आने से उत्तराखंडी सिनेमा भी आगे बढ़ सके। क्या ये लोग अपने उत्तराखंडी सिनेमा के लिए पैसे खर्च नहीं कर सकते?
बॉलीवुड में काम करने वालों का काम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाता है। करोड़ों लोगों के बीच जाता है। हमारे उत्तराखंड की जनसंख्या ही कितनी है? उस पर भी राज्य की कुल जनसंख्या में से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी लोग ही फ़िल्मों का शौक़ रखते हैं। इन 50 फ़ीसदी में से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी लोग ही सिनेमा देखने जाते हैं।

इसके अलावा हमारे ग्रामीण अंचल में सिनेमा हॉल नहीं हैं। सिर्फ़ देहरादून और दिल्ली के सिनेमा हॉल के लिए फ़िल्म तो नहीं बन सकती। ऐसा करना बहुत महँगा सौदा साबित होगा. 

जिन लोगों का आपने नाम लिया वे लोग 100-100 करोड़ की फ़िल्मों में काम करते हैं। ऐसे में उनकी उम्मीद भी करोड़ों में कमाने की होगी ना?  हमारे यहाँ 30-40 लाख में फ़िल्म बनती है। इसमें भी आधे से ज़्यादा खर्चा फ़िल्म के टेक्निकल पक्ष पर खर्च हो जाता है। कलाकारों को भी कुछ नहीं मिलता है। उत्तराखंडी फ़िल्मों से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। इसलिए वो इन फ़िल्मों से दूरी बना लेते हैं। 

हमारे यहाँ के लोग फ़िल्मों से उम्मीद करते हैं कि उनकी क्वालिटी 100-200 करोड़ के बजट वाली फ़िल्म के बराबर हो। लेकिन ख़ुद थियेटर में नहीं जाते। जब लोग अपना योगदान देंगे तब ही तो सिनेमा भी सुधरेगा। निर्माताओं को प्रोत्साहित करना होगा। हम भी 100 200 रुपये खर्च कर फ़िल्म देखने जाए तो लगता है कि फ़िल्म चल रही है। जब प्रोत्साहन देंगे तो अच्छी फ़िल्में भी बनेंगी। 

अब बात करते हैं प्रवासियों की। कोरोना काल में हज़ारों प्रवासी प्रदेश से लौटकर गाँव वापस आ गए हैं। कई लोग हैं जो ये कह रहे हैं कि वो अब गाँव में ही रहेंगे। ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि एकसाथ इतनी बड़ी जनसंख्या आई है तो राज्य में रोज़गार का संकट पैदा हो जाएगा? आपकी इस पर क्या राय है?
 ये एक टेंपररी फ़ेज़ है। लोग गाँव आए हैं क्योंकि शहर में उनका रोज़गार छिन गया था। लोगों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया था। गाँव में तो कुछ-न-कुछ इंतज़ाम हो जाता है। लोग बीमारी के डर से गाँव लौट रहे हैं।

उन्हें परदेश जाना पड़ा क्योंकि हमारे राज्य ने उन्हें रोज़गार नहीं मुहैया कराया। अगर सरकार इन प्रवासियों को यहीं रोकना चाहती है तो उन्हें रोज़गार उपलब्ध कराए। किसी की बड़ी नौकरी है तो उसकी बात अलग है। लेकिन जो 7-8 हज़ार के लिए परदेश जा रहा है उसे तो राज्य में ही रोका जा सकता है। कुछ रोज़गार दिया जा सकता है। 

आप अगर प्रवासियों को वापस बुला रहे हैं तो उनके लिए रोज़गार की व्यवस्था करिए। नहीं कर सकते हैं तो हाथ खड़े कर दीजिए। तब वो लोग जाएँगे ही दूसरे राज्यों में रोज़गार की खोज में। 

पहाड़ में खेती के आधार पर जीवन व्यतित करना मुश्किल है। यहाँ एक परिवार के पास 4-5 खेत होते हैं। यहाँ की खेती तराई की तरह नहीं होती है। इस ज़मीन पर जो थोड़ी बहुत फसल हो भी जाती है तो उसे बंदर या जंगली जानवर ख़राब कर देते हैं। 

चकबंदी है समाधान?
सरकार को चकबंदी करनी चाहिए। चकबंदी से ही पहाड़ में खेती सफल हो पाएगी। चकबंदी हो जाएगी तो जिसके पास ज़्यादा ज़मीन है, उसे एक पूरा प्लॉट मिल जाएगा। बड़े प्लॉट में वो सब्जी-फल-फूल, जो चाहे उगा सकता है। पहाड़ में खेत दूर-दूर होते हैं। लोगों के खेती छोड़ने की यही बड़ी वजह है।  अगर खेत एक जगह ही हो जाए तो काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होगा। 

खेतों का अधिग्रहण करने की बजाय सरकार को चकबंदी करनी चाहिए। एक जगह खेत मिलेंगे तो लोग अपने खेतों पर बाढ़ भी लगा सकेंगे। वहाँ मकान भी बना सकेंगे। चकबंदी को लेकर हिमाचल हमारे सामने बड़ा उदाहरण है। यहाँ पर चकबंदी सफल हुई है। आप (सरकार) कहती है कि व्यावसायिक खेती करो। व्यावसायिक खेती तभी तो होगी जब खेत एक ही जगह पर मिलेंगे। पानी की व्यवस्था भी हो सकेगी।

गणेश गरीब जी हैं। उनका पूरा जीवन चकबंदी के लिए आंदोलन करने में चला गया है। लेकिन उनकी कोई सुन ही नहीं रहा। जब ज़मीन सोना उगलेगी तो क्यों नहीं आएँगे लोग घर। 

नेगी दा। कुछ वक़्त पहले आपने एक कविता लिखी थी- ‘नजीबाबाद कु इफ्तखार हुसैन’। इस कविता में आप पहाड़ में ढोल-दमो के गुम होने पर और बैंड बाजा के हावी होने पर व्यंग्य कर रहे हैं। लेकिन आपको नहीं लगता कि पहाड़ में ढोल-दमो पर बैंड-बाजा हावी हो रहे हैं?
हावी तो हो रहे हैं। ढोल-दमो को बचाने के लिए हमें ज़िद्द करनी होगी। अभी मैंने अपने दो बच्चों की शादी करवाई। मैंने तय किया कि शादी में न तो शराब पिलाई जाएगी और ढोल दमो ही लाए जाएंगे। बैंड-बाजा नहीं।

कुछ बैंड बाजा वाले फ़्री में अपनी सेवा देने के लिए तैयार थे लेकिन मैंने फिर भी उनको इसके लिए इनकार किया। हमें ज़िद करनी होगी। ज़िद नहीं करेंगे तब तक स्थिति सुधरेगी नहीं। 

हम अपने औजी की इज़्ज़त नहीं करते। उन्हें हम 2 से 4 हज़ार रुपये देने में भी हिचकते हैं। लेकिन वहीं बैंड-बाजा वाले को 8 से 10 हज़ार देने में भी नहीं हिचकते। बैंड-बाजा वालों के मुक़ाबले औजी ज़्यादा मेहनत करता है। वो बारात लेकर भी आता है। लेकर भी जाता है। दो दिन उसी प्रवास में रहता है। 

हम अपने लोगों की कद्र नहीं करते। जब तक हम औजियों को सम्मान नहीं देंगे तो क्यों बजाएँगे वो ढोल। उनके बच्चे भी सोचेंगे कि ढोल बजाने में न इज़्ज़त है और ना ही पैसा। तो क्यों करेगा वो ये काम। 

बाहर के जो कारीगर आते हैं, उनकी हम जात तक नहीं पूछते। हमें पता भी नहीं होता कि वो क्या हैं। लेकिन अपने गाँव के औजी को पहले ही किनारे बिठा दिया जाता है। उन्हें अलग खाना देते हैं। औजियों के लिए अलग-अलग नियम क़ानून बनाते हैं। 

औजियों को अपने साथ बिठाइए। खिलाइए-पिलाइए। उन्हें अच्छा मेहनताना दीजिए तो क्यों नहीं बजाएँगे वो ढोल-दमो। हमें पहले अपनी कमियों को दूर करना होगा। उसके बाद ही हालात सुधर सकते है। 

नेगी जी। उत्तराखंड आंदोलन में भी आप शामिल हुए थे। कहीं मैंने आपके बारे में पढ़ा था कि आप कंबल से मुँह ढककर प्रभात फेरियों में शामिल होते थे। इसमें कितनी सच्चाई है?
उत्तरकाशी में एक संस्था है कला दर्पण। वह प्रभात फेरियाँ निकाला करती थी। मैं भी उसमें शामिल हुआ। सुबह का वक़्त होता था। ठंडी बहुत ज़्यादा होती थी। इसलिए हम लोग कंबल ओढ़कर रैलियों में शामिल होते थे। इस दौरान जनगीत गाए जाते थे। इसी दौरान मैंने आंदोलन गीत लिखे थे। बाद में यही गीत ‘उत्तराखंड आंदोलन’ एल्बम में सामने आए।

नेगी जी। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान आप सरकारी नौकरी में थे। क्या कभी आपको अपने गीतों की वजह से तलब किया गया?
हां। मेरे गीत प्रभात फेरियों में बजने लगे थे। 26 जनवरी के दिन मैं डीएम के साथ जा रहा था और सामने से मेरे गीत रैलियों में बज रहे थे। इसके बाद लोकल इंटेलिजेंस यूनिट्स वालों ने मेरी शिकायत DM से कर दी। उन्होंने कहा कि ये आदमी गीत लिख रहा है और आंदोलन को भड़का रहा है।

DM ने मुझे तलब किया। अच्छे व्यक्ति थे वो। मैंने उनके सामने तर्क दिया कि जब खुद मुलायम सिंह सरकार अलग राज्य का समर्थन करती है। रोज अखबारों में विज्ञापन देती है तो ऐसे में मैं भी तो उसी के समर्थन में गीत गा रहा हूं। इस पर जिलाधिकारी ने मुझे हिदायत दी कि हमें इससे बचना चाहिए। क्योंकि हम सरकारी नौकरी वाले हैं। 

गाने के लिए ही छोड़ी सरकारी नौकरी
2005 में मैंने सरकार नौकरी छोड़ दी। दरअसल उस समय में मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के ख़िलाफ़ गीत लिखा था। ‘नौछमी नारैणा’।  इस गीत को गाने से पहले मेरे लिए नौकरी छोड़ना बेहद ज़रूरी था। क्योंकि सर्विस के दौरान अगर मैं ये गीत गाता तो वो नियमों का उल्लंघन माना जाता। इसलिए मैंने पहले नौकरी छोड़ी और फिर ये गीत गाया।