‘आप’ की उम्मीदों का पहाड़ चढ़ेगा पहाड़ी?

भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ की अब उत्तराखंड पर नजर है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में घोषणा की कि उनकी पार्टी 2022 में उत्तराखंड की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनका दावा है कि उन्होंने उत्तराखंड में सर्वे करवाया। सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि ‘आप’ को उत्तराखंड में चुनाव लड़ना चाहिए। 

कई मोर्चों पर दिल्ली की सूरत बदल कर रख देने वाले केजरीवाल के सामने पहाड़ की कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे अभी तक उनका सामना नहीं हुआ है। और जो चुनौतियां 20 सालों से कमोबेश जस की तस हैं।

उम्मीद की किरण ‘आप’
9 नवंबर, 2000 वो तारीख है, जिस दिन उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। अलग राज्य से उम्मीदें थीं कि सालों से चली आ रही दिक्कतों से निजात मिलेगा। पहाड़ में रोजगार पैदा किए जाएंगे तो पलायन रुकेगा। पहाड़ों में अस्पताल बनेंगे तो जानें बचेंगी। अच्छे स्कूल होंगे तो पहाड़ से ही डॉक्टर-इंजीनियर निकलेंगे। उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, पहाड़ में ही (गैरसैण) राजधानी बनेगी। 

20 साल में क्या बदला?
उत्तराखंड 20 साल का हो चुका है लेकिन जो मांगें 20 साल पहले थीं वो आज भी जस की तस हैं। इन 20 सालों में उत्तराखंड पर सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही कुर्सी बदलती रही है। उत्तराखंड आंदोलन से निकली पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल यानि उक्रांद आपसी झगड़ों और फूट के चलते कहीं नजर भी नहीं आई। लेकिन अब ‘आप’ से उम्मीद कर सकते हैं। 

उत्तराखंड ने बीजेपी और कांग्रेस को आजमाकर देख लिया है। यूकेडी अपना कोई मजबूत आधार यहां खड़ा करने में अभी तक विफल ही रही है। उक्रांद ना मजबूत विपक्ष साबित हो पाई है, ना ही वो कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प बन पाई है। लेकिन ‘आप’ इन दोनों मजबूत पार्टियों का विकल्प बनने की ताकत रखती है। 

दिल्ली का सुधार उत्तराखंड में होगा?
दिल्ली में केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी अचीवमेंट शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए बदलाव माने जाते हैं। उत्तराखंड के परिपेक्ष में देखें तो यहां की भी सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव की है। ‘आप’ के उत्तराखंड में आने से इस उम्मीद को पंख जरूर लगेंगे। और कई ऐसे लोग होंगे जो इस बिना पर ‘आप’ को वोट दे सकते हैं।

गैरसैंण स्थायी राजधानी?
दूसरी मांग, जिसके आधार पर केजरीवाल उत्तराखंड में वोट मांग सकते हैं, वो है- गैरसैंण। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भले ही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया हो लेकिन आम पहाड़ी अभी भी इससे ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। केजरीवाल आम जन की नब्ज पकड़ना काफी अच्छी तरह से जानते हैं। और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा उनके घोषणापत्र में सबसे ऊपर हो सकता है।

फ़्री बिजली ने कांग्रेस के इरादों पर फेरा पानी!
मार्च 2020 में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि 2022 में सत्ता में आने पर फ्री बिजली और पानी देंगे। जब उन्होंने यह घोषणा की थी, तब ‘आप’ के मैदान में आने की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। हरीश ने जिस केजरीवाल मॉडल पर चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई थी, वो कांग्रेस के लिए ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि केजरीवाल फ्री बिजली और पानी के वादे के साथ मैदान में उतरेंगे।

कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी दिल्ली की तरह लोकल मुद्दों पर लड़ती दिखेगी। लोकल मुद्दे यानि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और राजधानी। दिल्ली का रिपोर्ट कार्ड और प्रवासी उत्तराखंडियों के बूते उत्तराखंड में ‘आप’ मजबूत जनमत हासिल करती दिखेगी। 

20 साल से पहाड़ का जनमानस कांग्रेस और बीजेपी का जो विकल्प ढूंढ़ता दिख रहा था,  वो आखिर उसे मिलता दिख रहा है। कांग्रेस और न बीजेपी के लिए एक पहाड़ सी चुनौती बनती दिख रहे हैं- केजरीवाल।

अशोक मल्ल: वो एक्टर जो पहले किसान फिर सबकुछ था

1987 में जब पहली कुमाऊँनी फ़िल्म मेघा आ रिलीज़ हुई तो एक डायलॉग सबकी जुबां पर था। ‘गंगुवा की खुकुरी दुधारी भै, दुधारी’। जिन्होंने इस डायलॉग को फ़िल्म के विलन के मुँह से सुना, उन्हें आज भी ये डायलॉग याद है। इसे अमर करने वाले थे- अभिनेता अशोक मल्ल।

अशोक मल्ल एक अभिनेता से पहले किसान थे और वो ख़ुद ये ज़ाहिर किया करते थे। वो अपनी जड़ों की खोज में भी जुटे थे लेकिन उससे पहले  वो  हो गया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

अशोक मल्ल का निधन
8 जुलाई, 2020। सुबह के 5 बजकर 57 मिनट हो रहे थे। नवी मुंबई के साई स्नेहदीप हॉस्पिटल में उत्तराखंड का एक और चमकता सितारा बुझ गया। उत्तराखंड की दर्जनों फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाले अशोक मल्ल हमेशा के लिए चले गए।अशोक लंबे समय से बीमार थे। वह कैंसर की बीमारी सी पीड़ित थे।

पहले किसान फिर एक्टर थे अशोक
अशोक मल्ल ने मेघा आ, चक्रचाल, मेरी गंगा होली त् मैमु आली, कौथिग, बंटवारु समेत कई फ़िल्मों में अभिनय किया। अशोक जी ने गोपी भिना फ़िल्म का निर्देशन भी किया था। एक अभिनेता होने से पहले अशोक प्रकृति प्रेमी थे। मुंबई के कोलाबा में उनका अपना बोटैनिकल गार्डन है। सिर्फ़ यही नहीं अशोक को ख़ुद को किसान कहने में फक्र महसूस होता था। यही वजह है कि सोशल मीडिया में अपने परिचय में सबसे पहले वह किसान लिखते थे और फिर बाक़ी चीजें। 

अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे अशोक दा
अशोक दा वैसे तो पिथौरागढ़ के मूल निवासी थे। वह धपड़पट्टा, पुलिस लाइन के रहने वाले थे। पिथौरागढ़ के मिशन इंटर कॉलेज से 1978 में उन्होंने ग्रैजुएशन पूरा किया। लंबे समय से वह अपने परिवार के साथ मुंबई में ही रहते थे।

वो अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे। पिछले साल से वो अपने वंशजों के मूल ठिकाने का पता लगाने में जुटे हुए थे। अपनी इस खोज में उन्हें पता चला कि वे नेपाल से उत्तराखंड आए थे। उनकी बड़बूबू ब्रिटिश आर्मी में थे। उनके बुबु का जन्म अल्मोड़ा के वार कैंप में हुआ था। उसके बाद उनकी परवरिश देवलथल के मल जमतड़ निवासी उनके रिश्तेदारों ने की थी। अशोक जमतड़ जाने की तैयारी में थे लेकिन तभी बीमारी ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया और वो अपनी जड़ तक पहुँचने से पहले ही चले गए। 

रहते मुंबई में थे, दिल उत्तराखंड में था
अशोक दा वैसे तो मुंबई में रहते थे लेकिन उनका दिल हमेशा उत्तराखंड में बसता था। गोपी बिना के प्रीमियर पर सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने उत्तराखंड को याद किया था। इस दौरान उन्होंने लोगों से अपनी बोली-भाषा याद रखने को कहा। उन्होंने कहा कि आप दुनिया के जिस भी कोने में रहें। जहां भी रहें। जो भी करें। आप चाहें दुनिया की कोई भी भाषा सीख लें लेकिन अपनी मातृ भाषा कभी न भूलें। क्योंकि वही हमारा मूल है।

उत्तराखंडी फ़िल्मों का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है। लेकिन जितना भी है, उसमें अशोक मल्ल जी की बहुत ही अहम भूमिका है। आज उत्तराखंडी फ़िल्मों की कल्पना उनके अभिनय के बिना करना संभव नहीं।

उम्मीद करते हैं कि भविष्य में हमारा सिनेमा भी भोजपुरी और दूसरे क्षेत्रीय सिनेमा की तरह आगे बढ़ेगा। अशोक मल्ल जैसे अभिनेताओं का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

वो गीत, जिसे गाने के लिए नेगी दा ने छोड़ दी सरकारी नौकरी


गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी। जिसके गीत आम पहाड़ी की भाषा में बात करते हैं। उनके गीतों में हर पीढ़ी से मुलाक़ात होती है। उनके गीतों को तो हर किसी ने सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि नेगी दा ने एक गीत को गाने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी? और तब जो उन्होंने वो गीत गाया तो एक बहुत बड़ा भूचाल आया।

सूचना विभाग से जुड़े थे नेगी दा
नरेंद्र सिंह नेगी गायन के साथ सरकारी नौकरी भी किया करते थे। वह सूचना विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने कई सालों तक उत्तरकाशी में सेवा दी। 2005 में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी। अभी सिर्फ़ 6 साल और थे उनकी सर्विस ख़त्म होने में लेकिन फिर भी उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया। और वो भी सिर्फ़ इसलिए ताकि वो अपना एक नया-नवेला गीत गा सकें। 

वो गीत था- नौछमी नारैणा। नेगी दा ने ये गीत तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को लेकर लिखा था। इस गीत ने पूरे उत्तराखंड में भूचाल ला दिया था। और ऐसा असर हुआ कि आख़िर में तिवारी जी की कुर्सी ही चली गई। 

अब आप सोचेंगे कि क्या नेगी दा इस गीत को सरकारी नौकरी में रहते ही नहीं गा सकते थे? क्या वो सरकार से डर गए थे? तो उनके सरकारी नौकरी छोड़ने वाले सवाल का जवाब ख़ुद नेगी दा से लीजिए। 

छिबड़ाट को दिए अपने ख़ास इंटरव्यू में उन्होंने ही इस बारे में बताया। नेगी दा ने बताया कि वो इस गीत को गाना चाहते थे। लेकिन सर्विस कंडक्ट रूलिंग की वजह उन्हें दिक़्क़त हो सकती थी।

उनके मुताबिक़ अगर वो सर्विस के दौरान इस गीत को गाते तो उन्हें नियमों के मुताबिक़ जेल में भी डाला जा सकता था। इसीलिए उन्होंने पहले सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दिया। उसके बाद ही नौछमी नारैणा गीत गाया।

बता दें कि नौछमी नारैणा गीत काफ़ी फ़ेमस हुआ था। इस गीत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी। वो जहां भी जाते, यह गीत सुनाई देता था। इस गीत को सेंसर कराने की कोशिश भी की गई।

इसके विरोध में कलाकार सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया। और आख़िर में सरकार बनाम कलाकार में कला की जीत हुई। 

PM मोदी, रजनीकांत, दुनिया के 5 शक्तिशाली लोग जिनका देवभूमि से खास नाता

दुनिया के 5 शक्तिशाली लोग और उनकी सफलता का एक ही राज- उत्तराखंड! एक वो है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधान है। एक वो है जो देश का सबसे अमीर शख़्स है। एक ने पूरी दुनिया को वर्चुअल वर्ल्ड में मिलाने का इंतजाम किया। एक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक का मालिक है। एक वो है, जिसे लाखों लोग भगवान की तरह पूजते हैं।

एक तरफ जहां रिया मावी जैसे लोग केदारनाथ जैसे धामों को लेकर जो चाहे बोल जाते हैं तो दूसरी तरफ ये धाम दुनिया के शक्तिशाली लोगों की आस्था का अहम बिंदु हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 में जब फिर प्रधानमंत्री बने तो वह केदारनाथ की शरण में जाना नहीं भूले। ये पहली बार नहीं है कि पीएम मोदी केदार बाबा की दर पर गए हों। उनका केदारबाबा से रिश्ता 1985 से ही है। वह यहां पर तकरीबन 5 साल तक सन्यासी बने रहे। और तब से लेकर अभी तक, जब भी वह जीवन में कुछ बड़ी सफलता हासिल करते हैं तो वह बाबा केदार के दर्शन के लिए जरूर जाते हैं। 

मुकेश अंबानी
पीएम मोदी के अलावा बाबा केदार और बद्रीनाथ के भक्त देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी भी हैं। अंबानी अपने जीवन में कोई भी अहम काम शुरू करने से पहले बाबा केदार के दर्शन करने के लिए जरूर पहुंचते हैं। पिछले साल जब उनके बड़े बेटे की शादी थी तो सबसे पहला कार्ड उन्होंने बाबा केदार को दिया।

मुकेश अंबानी हर साल परिवार के साथ बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मुकेश भी अपने जीवन के सबसे अहम काम को करने से पहले बाबा केदार के दर्शन के लिए जरूर पहुंचते हैं। मुकेश ने बाबा केदार और बद्रीनाथ के लिए काफी ज्यादा दान दिया है।

स्टीव जॉब्स
आधे खाए सेब के लोगो से लगभग सभी लोग वाकिफ होंगे। ऐसे में स्टीव जॉब्स को भी लोग जानते होंगे। नाम है स्टीव जॉब्स। ऐपल की शुरुआत करने से पहले स्टीव जॉब्स संन्यासी बनने की ख्वाहिश से उत्तराखंड आए थे। यहां वह नीम करोली बाबा की शरण में आए। नीम करोली बाबा ने उन्हें वापस भेजकर वो करने को कहा जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद है। इस तरह स्टीव वापस अमेरिका आए और उन्होंने ऐपल की शुरुआत की। 

 मार्क जुकरबर्ग
दुनिया के अरबों लोग हर दिन फेसबुक पर एक घंटा बिताते हैं। इससे फेसबुक हर दिन अरबों रुपये की कमाई करता है। लेकिन मार्क के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्होंने फेसबुक को बंद करने की ठान ली थी। वो वक्त था 2007-08 का।

इस दौरान स्टीव जॉब्स ने मार्क को नीम करोली बाबा की शरण में जाने को कहा। मार्क कैंची धाम आश्रम आए। उन्होंने यहां ध्यान लगाया। नीम करोली बाबा के प्रवचन सुने। और उसके बाद जब उन्होंने वापसी की तो फेसबुक को उन्होंने नये मुकाम पर पहुंचाया। मार्क इसका श्रेय नीम करोली बाबा को देना नहीं भूलते।

रजनीकांत
रजनीकांत हर साल अल्मोड़ा जाते हैं। वो जीवन का हर जरूरी काम करने से पहले यहां दस्तक देते हैं। वह हर साल महावतार बाबा के दर्शन के लिए यहां आते हैं। महाअवतार बाबा से उनकी पहचान उनके दो कारोबारी दोस्तों ने कराई। रजनीकांत को बाबा के दर्शन के बाद काफी फायदे हुए। तब से रजनीकांत कोशिश करते हैं कि वो हर साल यहां आएं और जीवन के हर जरूरी काम को करने से पहले वह महाअवतार बाबा का आशिर्वाद जरूर लेते हैं। 

तो ये हैं वो 5 शख्स जिन्हें उत्तराखंड की धरती ने न सिर्फ आस्था का केंद्र दिया। बल्कि उन लोगों से भी मिलाया, जिन्होंने इन्हें जिंदगी में सही राह दिखाई। इन लोगों ने सफलता के नये मुकाम छुए।

रिया मावी जैसे लोग चाहे कुछ भी कहें। इनके कहने से हमारे धामों की आभा और उनमें हमारी आस्था कभी कम नहीं हो सकती।

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कोरोना काल की एक घटना, जिस पर विश्वास करना मुश्किल पर है सच

एक बुजुर्ग हैं सूरत सिंह। ये घटना 78 साल के सूरत सिंह के 60 सालों की कहानी है। इस बुजुर्ग ने जो किया और अब इसका परिवार जो इसके साथ कर रहा है, वो कितना सही है या कितना गलत? इसका हिसाब आप पूरी कहानी जानने के बाद खुद लगा लें। लेकिन कोरोना काल में जो इस बुजुर्ग ने किया है, उससे तो एक बात साबित हो जाती है कि आप दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाएं। आखिर में आपको अपनी मिट्टी और अपने घर आना ही पड़ता है। 

Surat Singh

सूरत सिंह

इस तस्वीर को जरा ध्यान से देखिये। इस तस्वीर में दिख रहा ये बुजुर्ग सूरत सिंह है। सूरत सिंह के चेहरे पर उम्मीद है, पछतावा है और माफी पाने के लिए बिलख रही आंखें हैं। दरअसल 78 साल के सूरत सिंह तकरीबन 60 साल बाद अपने घर लौटे हैं।

सूरत सिंह 18 साल की उम्र में घर छोड़कर चले गए थे। अब कोरोना काल में उन्होंने घर वापसी की है। उत्तरकाशी के जेस्तवाड़ी के रहने वाले सूरत सिंह अभी तक हिमाचल में थे। वह हिमाचल में सेब के बगानों में काम किया करते थे। कोरोना की वजह से कामकाज ठप हुआ तो सूरत सिंह ने भी अपने गांव वापस आने की अर्जी दे दी। लेकिन सूरत सिंह जब घर लौटे तो उनके परिवार ने उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए। और ऐसा करने के लिए परिवार के पास भी काफी बड़ी वजह है। 

आखिर क्यों किए दरवाजे बंद?
हुआ कुछ यूं था कि जब सूरत सिंह घर छोड़कर चले गए थे। तब वह महज 18 साल के थे और उनकी पत्नी 16 साल की। इस दौरान उनके बच्चे भी हो चुके थे। इन 60 सालों के दौरान परिवार ने उन्हें काफी खोजने की कोशिश की। पता चला कि वो हिमाचल में हैं। परिवार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई।  सूरत सिंह से अपील की कि वो वापस घर आ जाएं। परिवार की इन मिन्नतों का उन पर कोई असर नहीं हुआ।

अब जब सूरत अपने गांव वापस लौटे हैं तो उनकी पत्नी का कहना है कि अब उनका सूरत सिंह से कोई वास्ता नहीं है। उनका ये गुस्सा जायज भी है  क्योंकि इतने सालों तक उस महिला ने अपने बच्चों को अकेले पाला बिना किसी सहारे के।

सूरत सिंह को उम्मीद है कि उन्हें अपने घर में आसरा मिलेगा। क्वारंटीन सेंटर में रहने के दौरान वो सिर्फ दीवारों को निहारते रहे। उनकी आंखें जैसी अपनी पत्नी से कहना चाहती हों कि गलती हो गई। मुझे माफ कर दे। वो किसी से ज्यादा बात नहीं करते। शायद जो गलतियां उन्होंने की हैं, उनका अब उन्हें पछतावा हो रहा है। 

इस आर्टिकल को लिखने तक हमारे पास उनके अपने घरवालों के साथ होने की जानकारी नहीं है। लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि उनकी पत्नी, जिनका गुस्सा जायज है। जिनकी नाराजगी भी मायने रखती है। उन्हें सहारा दे दें। उन्हें माफ कर दें। 

एक चीज सूरत सिंह ने जरूर महसूस की होगी कि उन्होंने जिंदगी के इतने अहम साल अपने परिवार, अपने बच्चों के बिना गुजारकर बरबाद कर दिए हैं।

बॉलीवुड फिल्मों का वो ‘अंग्रेज अफसर’, उत्तराखंड जिसकी मातृभूमि थी!

बॉलीवुड फिल्मों का वो अंग्रेज अफसर जो असल में अंग्रेज था ही नहीं। उसकी अंग्रेजियत सिर्फ इतनी थी कि वो मूलत: अमेरिका का था। करीब 100 साल पहले उसके पुरखे भारत आए थे और तब से उसका रिश्ता भारत से जुड़ गया था। हम बात कर रहे हैं टॉम एल्टर की।

मसूरी में पले-बढ़े टॉम एल्टर दिल से पहले भारतीय, फिर उत्तराखंडी थे। उनका बचपन मसूरी में गुजरा। रानीखेत से उन्हें प्यार था। उत्तराखंडी भाषाओं को बोलने में वो पारंगत थे। सिर्फ वो भाषाएं बोला नहीं करते थे, बल्कि उन्हें बढ़ावा भी देना चाहते थे।

जब DD नेशनल पर टॉम बोले गढ़वाली
टॉम एल्टर गढ़वाली और कुमाऊंनी बोलने में पारंगत थे। वो जितनी साफगोई से उर्दू और हिंदी बोला करते थे, उसी तरह गढ़वाली और कुमाऊंनी पर उनकी पकड़ मजबूत थी। टॉम ने डीडी नेशनल की एक डॉक्यूमेंट्री में गढ़वाली भाषा बोली थी। बहुत कोशिश के बावजूद हमें वो डॉक्यूमेंट्री तो नहीं मिल पाई। इतना जरूर है कि उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री और सीरियल की शूटिंग रानीखेत समेत उत्तराखंड के कई भागों में की थी।

कुमाऊंनी फिल्म में किया काम
भले ही उत्तराखंडी सिनेमा आजतक अपनी एक पहचान न बना पाया हो लेकिन टॉम उत्तराखंड के उन कुछ अभिनेताओं में से एक हैं. जिन्होंने इसे बढ़ाने की कोशिश की है। टॉम ने न सिर्फ असमी, बंगाली, कन्नड फिल्मों में काम किया है, बल्कि उन्होंने कुमाउंनी फिल्म में भी काम किया है। कुमाऊंनी फिल्म में उनके काम करने की जानकारी आपको लगभग सब जगह मिल जाती है। हालांकि उन्होंने किस कुमाउंनी फिल्म में काम किया, इसका हम पता नहीं कर पाए। इसकी वजह ये है कि कहीं पर भी फिल्म का नाम नहीं दिया गया है।

गढ़वाली फिल्म में करना चाहते थे काम
टॉम एल्टर हमेशा एक अदद गढ़वाली फिल्म में काम करना चाहते थे। अमर उजाला की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये टॉम की दिले-ख्वाहिश थी कि वो किसी गढ़वाली फिल्म में काम करें। हालांकि इसके लिए किसी भी निर्माता ने उन्हें एप्रोच नहीं किया। और 2017 में उनके निधन के साथ ही ये संभावना भी खत्म हो गई।

टॉम एल्टर बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेता होने के साथ ही बेहतरीन इंसान भी थे। मसूरी के लंडौर में आज भी उनका घर है। मसूरी के लोगों के लिए टॉम एक परिवार का ही हिस्सा थे।

जीवन का आखिरी वक्त टॉम मसूरी में बिताना चाहते थे लेकिन बीमारी के चलते ऐसा हो नहीं पाया। टॉम एल्टर ने जो जिया, खूब जिया। हमें गर्व है कि वो उत्तराखंड से हैं और उत्तराखंडी सिनेमा में उन्होंने योगदान देने की कोशिश की।

रामायण, महाभारत और 90 के दशक का उत्तराखंड

बिछना के पति की दिल्ली से अंतरदेशी आई है। पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले भगतु को चिट्टी पढ़ने के लिए बुलाया गया है। और भगतु पढ़ने में पारंगत ना होने के बावजूद जैसे-तैसे चिट्टी पढ़ लेता है। इस तरह बिछना को और परिवार को परदेश गए अपने की खुशखबर मिल जाती है। ये था 90 के दशक का उत्तराखंड। जब हालचाल अंतरदेशी के सहारे मिला करता था और घरबार मनी ऑर्डर के सहारे चला करते थे। लेकिन 90 के दशक में पहाड़ सी मुसीबतों और अंतरदेशी की खुशियों के अलावा एक और चीज आई थी। और वो थी रामायण, श्री कृष्ण और महाभारत जैसे सीरियल।

पूरे भारत की तरह ही पहाड़ में भी इन सीरियल ने अपना जादू बिखेरा था। लेकिन संसाधनों की कमी के चलते इन सीरियलों को देखने के लिए यहां जो इंतजाम और जुगाड़ किए जाते थे, वो भगतु जैसे सैकड़ों उत्तराखंडियों के दिल में गहरे उतरे हैं। आज की पीढ़ी उस सुख को कभी महसूस नहीं कर पाएगी।

जब टीवी वाले से दोस्ती की बहुत कीमत थी
90 के दशक के उत्तराखंड के ज्यादातर गांवों में न सड़क पहुंची थी और ना ही बिजली। ऐसे वक्त में गांव के कुछ चुनिंदा परिवारों के पास ही टीवी होता था। वो भी ब्लैक एन व्हाइट। जिस पर सिर्फ दूरदर्शन चैनल आता था। कुछ गांवों में बिजली थी भी तो वो सिर्फ 2 से 3 घंटों के लिए रहती थी। ऐसे में बच्चों की कोशिश रहती थी कि जिसके घर में टीवी है, उससे दोस्ती की जाए। क्योंकि उससे दोस्ती होने का मतलब है कि रविवार को रामायण, महाभारत देखने उसके घर जा सकते थे।

बहुत कम ही सौभाग्यशाली बच्चे होते थे, जिन्हें टीवी वाले घर में बैठकर रामायण, श्रीकृष्ण या अन्य कोई सीरियल देखने का मौका मिलता था। कुछ बच्चे बाहर से सिर्फ टीवी की आवाज सुनकर और झांककर काम चला लेते थे। ऐसे में अक्सर टीवी  के मालिक की नजर बाहर खड़े बच्चों पर पड़ती तो टीवी बंद कर देता। लेकिन बच्चे फिर भी नहीं जाते… क्योंकि उन्हें पता था कि टीवी अभी नहीं तो थोड़ी देर में फिर शुरू होगा। 

जब खल्याण (आंगन) में टीवी पर दिखाया गया श्रीकृष्ण
कुछ वक्त बीता और धीरे-धीरे कुछ लोगों ने कलर टीवी और VCR ले लिया। एक नये तरह का बिजनेस शुरू हो गया था। हर गांव में एक तय दिन पर कलर टीवी, जनरेटर और श्रीकृष्ण या रामायण सीरियल का VCR कैसेट मंगाया जाता था। सीरियल देखने के इच्छुक लोग 25 पैसे, आठन्नी या फिर एक रुपये तक सीरियल को देखने के लिए किराया देते थे। फिर तय दिन को सब लोग दिन में अपना कामकाज निपटाते और रात में पंचायत वाले मैदान में कलर टीवी लगाया जाता और उस पर चलता सीरियल।

पूरी रातभर सीरियल चलता और हर आदमी मैदान में बैठकर एकटक देखता। गांव वालों के लिए और खासकर बच्चों के लिए सीरियल में दिखने वाले ये कलाकार ही भगवान बन चुके थे।

श्रीकृष्ण, राम के पोस्टर से भर दी दीवारें
श्रीकृष्ण, रामायण जैसे सीरियलों का ऐसा जादु हुआ था कि हम इन कलाकारों को ही भगवान समझते थे। गांव के बच्चे जंगलों से बीज जमा किया करते थे और बीज के बदले उन्हें पैसे मिला करते थे। इन पैसों से दो ही चीजें आती थीं… कंचे या तो भगवान के पोस्टर। टीवी पर दिखने वाले इन भगवानों के पोस्टर कमरे में हर तरफ चस्पा कर दिए जाते थे। और फिर होती थी इनकी पूजा।

पहाड़ में जीवन ना सिर्फ पहले कठिन था बल्कि अब भी काफी हद तक है। लेकिन पहाड़ सी कठिनाइयों के बीच हम मनोरंजन का साधन खोज ही लेते थे। आज भले ही मोबाइल और इंटरनेट से हम काफी नजदीक हैं, लेकिन जो नजदीकी इनके बिना थी वो शायद अब कभी नहीं होगी।

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यहां दुल्हन लेकर आती है बारात, दहेज लड़की नहीं, देता है लड़का

आपने दुनिया की अजीबोगरीब शादियों और चीजों के बारे में सुना होगा लेकिन हम आपको शादी की एक ऐसी परंपरा के बारे में बता रहे हैं जो अपने आप में अनोखी है। ये शादी पूरी दुनिया को बताती है कि आखिर विवाह होने कैसे चाहिए। इस शादी में दुल्हा नहीं दुल्हन बारात लेकर आती है। उसके बाद जो मंजर तैयार होता है, उसके बारे में सुनकर आपको भी अच्छा लगेगा।

जौनसार बावर की परंपरा
उत्तराखंड में आज भी अगर कहीं सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह जीवित है तो वो जौनसार बावर में है। देहरादून से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर बसा जौनसार बावर सिर्फ अपनी संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि अपनी अलग परंपराओं के लिए भी फेमस है। इन्हीं परंपराओं में से एक हैजाजड़ परंपरा।

हिमाचल के सिरमौर और उत्तराखंड के जौनसार बावर में यह परंपरा काफी आम है। जहां आम शादियों में दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है। वहीं,  सिरमौर और जौनसार में दुल्हन बारात लेकर आती है। जी हां. दुल्हन। सिर्फ यही नहीं, कबायली संस्कृति की इन शादियों में महिलाओं की काफी ज्यादा अहमियत होती है। यही वजह है कि यहां पूरे गांव की महिलाओं को अलग से भोज करवाया जाता है। इस परंपरा को रहिंन जिमाना कहा जाता है।

दिखावा किया तो होगा विरोध
दुल्हन जब दूल्हे के घर बारात लेकर आती है तो बारात मेहमानों को लेकर दूसरे दिन लौट जाती है। लेकिन दुल्हन दूल्हे के घऱ पर 5 दिन तक रहती है। आजकल जहां लोग शादियों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, वहीं जौनसार बावर में शादी में दिखावा करना काफी ज्यादा खराब माना जाता है। शादी परंपराओं के हिसाब से करना बेहद जरूरी है। अगर किसी ने शादी में अमीरी दिखाने की कोशिश की और बेजा खर्च किया तो पूरा गांव उसका विरोध करता है। सदियों से चली रही ये परंपरा आज भी यहां कायम है।

क्या इतना दहेज लेंगे आप?
अब बात करते हैं दहेज की। जहां पढे़लिखे लोग लाखों का दहेज और घोड़ागाड़ी लड़कियों से लेते हैं। वहीं, जौनसार और सिरमौर में बिलकुल उल्टा है। यहां कई इलाकों में दूल्हे की तरफ से दुल्हन के परिवार को दहेज देने की प्रथा है। हालांकि ये दहेज पैसों और घोड़ागाड़ी का नहीं होता, बल्कि ये कोई सामान्य चीज जैसे बर्तन और कपड़े हो सकते हैं। और ये दहेज देने का मतलब ये है कि दूल्हे के मांबाप दुल्हन के मांबाप का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी का हाथ उनके लड़के के लिए दिया। कुछ शादियों में दुल्हन दहेज देती है, लेकिन ये सिर्फ 5-7 बर्तन ही होते हैं।

अनोखी विदाई, सिर्फ दुल्हन की नहीं, पूरी बारात की
हर शादी की तरह जौनसार की शादियों में भी नाचगाना होता है। लेकिन इन शादियों में परंपरागत नृत्यों को तवज्जो दी जाती है। हारुल, तांदी, झुमैलो जैसे नृत्य रातभर चलते हैं। जाजड़ परंपरा की शादी की एक और खास बात है, वो है विदाई। यहां जब विदाई का वक्त आता है तो दुल्हादुल्हन के परिवार वाले छत पर खड़े हो जाते हैं और गाना गाने लगते हैं। गाने के जरिये लड़के वाले लड़की पक्ष से कहते हैं कि सेवा में कुछ भूलचूक हुई हो तो हमें माफ कर देना। वहीं, लड़की के पक्ष वाले कहते हैंआपने हमारी काफी सेवा की। हमारी लड़की जब आपके घऱ में रहना शुरू करेगी तो आप उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें।

बता दें कि जौनसार बावर कभी हिमाचल की सिरमौर रियासत का ही हिस्सा था और जब अंग्रेजों ने जौनसार बावर को उत्तराखंड में शामिल किया तो लोग जरूर बंटे लेकिन यहां की संस्कृति नहीं। आज भी सिरमौर और जौनसार बावर के बीच रिश्ते लगते हैं।

WhatsApp का ये इस्तेमाल नहीं किया तो क्या किया?

आज लगभग सभी लोगों के पास स्मार्टफोन है। स्मार्टफोन है तो उसमें व्हाट्सऐप भी है ही। लेकिन अक्सर आपने व्हाट्सऐप का इस्तेमाल सिर्फ मैसेज, फोटो और वीडियो भेजने के लिए किया होगा लेकिन इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल जो आप कर सकते हैं। वो आपने अभी तक नहीं किया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में बताया है। दूसरी बात जो हम आपको बताने वाले हैं, वो ये है कि अगर आप उत्तराखंड घूमने की योजना बना रहे हैं और गांवों की सैर करना चाहते हैं तो मोबाइल आपकी काफी मदद कर सकता है। आप अगर उत्तराखंड से हैं और अपने घरगांव से दूर रहते हैं तो मोबाइल आपको आपके बचपन से मिलाएगा।

पीएम मोदी से जानिए WhatsApp का सही इस्तेमाल

 नरेंद्र मोदी ने नवंबर के आखिर रविवार को जब मन की बात की, तो इसमें उन्होंने धारचुला का एक उदाहरण पेश किया। इस उदाहरण में उन्होंने बताया कि किस तरह उत्तराखंड में रहने वाला एक समुदाय, जिसकी जनसंख्या अब 10 हजार से भी कम है। वो व्हाट्सऐप के जरिये अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने में जुटा हुआ है। रंग समुदाय की भाषा रंगलो कहलाती है। इस भाषा की कोई लिपि नहीं है। अपनी भाषा को खत्म होने से बचाने के लिए दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानि जेएनयू की प्रोफेसर संदेशा रायाप गर्ब्याल ने एक अनोखी पहल की। संदेशा ने अपने समुदाय के दूसरे लोगों से जुड़ने की अपील की और व्हाट्सऐप ग्रुप की शुरुआत हुई।

व्हाट्सऐप ग्रुप पर इस समुदाय के लोग सिर्फ अपनी मातृभाषा में ऑडियो मैसेज भेजते हैंबल्कि लिखते भी अपनी ही रंगलो भाषा में हैं। व्हाट्सऐप ग्रुप से शुरू हुई ये कहानी अब सोशल मीडिया पर बढ़ चुकी है। और कई लोग व्हाट्सऐप के साथ ही फेसबुक, ट्विटर पर भी रंगलो भाषा में लिख और बोल रहे हैं।

लुप्त होने की कगार पर खड़ी विरासत
ऐसा नहीं है कि सिर्फ रंगलो भाषा ही लुप्त होने की कगार पर है। उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं कह लीजिए या बोलियां, कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भी लुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। क्योंकि हम अब मिलते हैं तो इन भाषाओं में बात करने के से कतराते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं को बचाने के लिए व्हाट्सऐप का इस्तेमाल रंग समुदाय की तरह हम भी कर सकते हैं। कम से कम व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अपनी भाषा में बात कर सकते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन भाषाओं में बात कर सके।

मोबाइल लौटाएगा बचपन!

अब बात करते हैं उन उत्तराखंडियों की जो अपने घर से दूर शहरों में रह रहे हैं और अपना बचपन मिस कर रहे हैं। आपका मोबाइल आपका बचपन लौटा सकता है। दरअसल आकाश शर्मा नाम के युवक हैं। देहरादून में रहते हैं और सॉफ्टवेयर ऐप डेवलपिंग से जुड़े हुए हैं। आकाश ने उत्तराखंडियों का बचपन उनके मोबाइल पर लाने की कोशिश की है।

गूगल प्ले स्टोर पर आपको दो ऐप मिल जाएंगे। एकबाघबकरी और दूसरी, बट्टी। आम तौर पर उत्तराखंड में ये खेल काफी ज्यादा खेले जाते थे। लेकिन जब से मोबाइल आया है, तब से ये खेल नदारद से हो गए हैं। बाघबकरी और बट्टी, दो ऐसे खेल हैं, जिन्हें अब आप अपने मोबाइल पर खेल सकते हैं। और अपने बचपन की यादों को फिर से ताजा कर सकते हैं।  

घूमने जा रहे हैं उत्तराखंड तो मोबाइल करेगा मदद

अब जो बात हम करने वाले हैं ये सिर्फ उत्तराखंडियों के लिए नहीं, बल्कि देश और विदेश से आने वाले सभी लोगों के लिए है। आप उत्तराखंड घूमने जाना चाहते हैं। उत्तराखंड के गांवों की सैर करना चाहते हैं और यहां के पुराने लोगों से यहां की बातें जानना चाहते हैं तो आपका मोबाइल यहां भी आपकी मदद करेगा।

आप चाहे अंग्रेजी बोलते हों या फिर फ्रेंच भाषा आपको आती है। और चाहे फिर हिंदी ही आपकी प्रमुख भाषा क्यों हो। लेकिन आपको गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषा नहीं आती है। ऐसे में आप अगर उत्तराखंड की इन भाषाओं के शब्दों का अर्थ समझना चाहते हैं या फिर इन भाषाओं को सीखना चाहते हैं तो बहुत आसानी से आप ये काम कर सकेंगे।

गूगल प्लेस्टोर पर जाइए। हैलो उत्तराखंड ऐप डाउनलोड कीजिए। और फिर आप जिस भी भाषा के हैं और उस भाषा में बात कर और लिख कर उनका अर्थ उत्तराखंडी भाषाओं में समझ सकते हैं। आकाश शर्मा और उनकी टीम ने करीब 2 साल तक इन भाषाओं के शब्द जुटाए और फिर ये ऐप तैयार किया।

ये ऐप सिर्फ गैरउत्तराखंडियों के लिए नहीं है। अगर आप उत्तराखंड के हैं और अपनी तीनों भाषाओं पर पकड़ बनाना चाहते हैं तो ये ऐप आपकी मदद कर सकता है। और अपनी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए इन ऐप्स को जरूर डाउनलोड करें। और देखें कि कैसे आप इनके जरिये अपनी भाषाओं को जीवित रख सकते हैं और दूसरों तक पहुंचा सकते हैं।

पलायन रोकना अगर आपके हाथ में नहीं तो कम से कम अपनी भाषाओं और संस्कृति को बचाना तो हमारे हाथ में है। सोचिए, समझिए और करिये।

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धगुली, हंसुली बच्चे अब पहनेंगे ही नहीं, पढ़ेंगे भी

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक किताब के कुछ पन्ने वायरल हो रहे हैं। इन पन्नों पर उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा में बच्चों के लिए कविताएं लिखी गई हैं। हर उत्तराखंडी इन कागजों को एक उम्मीद के साथ शेयर कर रहा है।उसे उम्मीद है कि ये कागज सिर्फ कंप्यूटर से बने ना हों और कहीं पाठ्यक्रम हिस्सा हों। जब हमने किताब के इन टुकड़ों की पड़ताल की तो हमें जो पता चला वो हमारी तरह ही आपके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान ला देगा।

गढ़वाली भाषा में किताब

गढ़वाली भाषा में किताब

मेरा बालपन मां

नाना न् धगुली दिनी

दादा न् हंसुली पैराई

दादी न् बोली- छुबकी पैर

नानी न् खुटुक पैजबी ल्याई

बाबा दगड़ी बाजार गयूं

बाबा न् मैंकु झुमकी मुल्याई

मेरू बालपन यों हाथों न् सजाई

धगुली… हंसुली…. छुबकी… पैजबी… झुमकी…. उत्तराखंड के हर शख्स ने इन शब्दों को सुना होगा। जिनका बचपन पहाड़ की वादियों में गुजरा है, उन्हें कभी उनके नाना ने तो कभी दादा ने धगुली और हंसुली पहनाई होगी। हमारे दादा-नाना के ये तोहफे ही अब हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा सिखाएंगे। हमारी अगली पीढ़ी को ये उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा सिखाएंगे।

पहले बात करते हैं इन वायरल पन्नों की। ये जो वायरल पन्ने आपको दिख रहे हैं, ये पौड़ी में पहली से 5वीं के बच्चों की किताबों का हिस्सा हैं। पौड़ी के जिलाधिकारी डीएस गबरियाल को इसका श्रेय जाता है। उन्होंने यहां पहली से लेकर पांचवीं क्लास तक गढ़वाली भाषा में पाठ्यक्रम शुरू किया है। पहली क्लास की किताब का नाम है. धगुलि, दूसरी के लिए हंसुलि, तीसरी के लिए छुबकी, चौथी के लिए पैजबी, पांचवीं क्लास के लिए झुमकि।

एक किताब का नाम झुमकी है

एक किताब का नाम झुमकी है

उत्तराखंड में दो प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं। गढ़वाली और कुमाऊंनी। दोनों ही भाषाएं अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनेस्को की उस सूची में शामिल हैं, जिसमें लुप्त होने की कगार पर खड़ी भाषाओं को रखा गया है। कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए भी प्रयास शुरू हो चुके हैं। यहां भी इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की पहल की गई है।

पौड़ी में तैयार की गई इन किताबों में उत्तराखंड की संस्कृति, वाद्य यंत्र, हीरो व अन्य कथा०कहानियों को शामिल किया गया है। इन किताबों के जरिये बच्चों को बचपन से ही अपनी संस्कृति से जोड़ना है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट पाइलट बेसिस पर किया जा रहा है। अगर यह पौड़ी में सफल होता है, तो इसे राज्य की अन्य जगहों पर भी लागू किया जा सकता है।

गबरियाल कहते हैं कि मैं जैसे ही पौड़ी आया, वैसे ही मैंने इस काम के लिए एक टीम बनाई और इस टीम ने इन किताबों को तैयार किया है। 

गबरियाल जी की इस पहल और कोशिश की जितनी हो सराहना कम ही पड़ेगी। उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि वह भी कुछ ऐसी पहल पूरे राज्य में करे। सिर्फ गढ़वाली के लिए नहीं, बल्कि कुमाऊंनी की खातिर भी। ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा बोल सके। समझ सके और सहज सके। 

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