गढ़वई समाचार-2: अफड़ी भाषा, अफड़ा समाचार

नमस्कार भैजीबुलों

मी सौंणु दिदा फिर हाजिर छौं गढ़वई समाचार लीक। गढ़वई समाचार मां हम तुम खुणी बतौला ये हफ्ता की 10 बड़ी खबर। चला भै शुरु करदां आजकु समाचार।

1.
शुरुआत एक दुखद समाचार सी कनू छों. भारतपाकिस्तान सीमा पर पेट्रोलिंग का दौरान चमोली कु हमारु जवान राजेंद सिंह नेगी लापता व्हैगेनी। करीब एक हफ्ता बाद भी तौंकु कुछ पता नी चली। परिवार की टक्क लगीं कि फोन की घंट बजली और क्वी खुशखबरी आली। कुछ मीडिया रिपोर्ट बोलणी छन कि राजेंद्र जी फिसलीक पाकिस्तान की सीमा मां पौंछीगेनी। तलाश अभियान मां जुटी सेना न् बोली की राजेंद्र पाकिस्तान सीमा मां नीन। सोशल मीडिया से लीक सरकार तक नेगी जी तैं खोजणा कु प्रयास जारी च। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत्न रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सी मुलाकात करी और तलाशी अभियान मां तेजी लौणा की अपील करी। हम भी फिलहाल दुआ ही करी सकदां कि जल्द सी जल्द राजेंद्र जी मिल जां और राजी खुशी घोर जां।

.
बैजी क्या कभी आपन् देखी कि पुलिस घर सी बुलैबुले तैं लोगुं उणी मोबैल द्याणी च। वी भी मैंगामैंगा। मी जाणदूं छों कि तुम उणी अफड़ा कंडूड़ पर विश्वास नी वलु व्हणू। किलै कि पुलिस त् चुनाव लड़दी और ना ही पुलिस सी हम कुछ मिलणा की उम्मीद करदां बल्कि डर हमेशा अफड़ी जेब सी देणा कु रंदू लग्यूंउत्तराखंड पुलिस कुछ अलग कनी च। देहरादून पुलिस लोगों उणी बुलैबुलै क् मोबैल द्याणी च। यु कमाल चीमोबाइल रिकवरी सेलकु। और जु मोबैल बंट्याणा छिन तौंकि कीमत हजारों रुपये सी लीक करोड़ो तक च्. जब या बात मैंन ग्वाणु दिदा बताई। त् ग्वाणु दिदा रातु का घम अंध्यारा मां देहरादून पैटिगे। अरे बल बड़ी मुश्किल सी थामी और तौं उणी ये की वजह बताई। दरअसल यी फोन वु छन जु ख्वैगे छया या चोरी वैगे छया। लेकिन उत्तराखंड पुलिस कु कमाल कि तौंन सब मौबैल खोजिक लेल्यन। त् बैज्यों यांक ही बोलदन हमारी उत्तराखंड पुलिस हीरा ची हीरा।

.
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय सी पढ़ाई कन वावा छात्रों का खातिर एक खुशखबरी च।अब तुम तैं फाइनल ईयर की मार्कशीट लेणा खुणी ठैट अफड़ा गौं सी विश्वविद्यालय औणां की जरूरत नही। बल्कि अब सीधा तुमारा मोबैल पर मार्कशीट मिल जाली। जी हां सीधा तुम्हारा मोबैल पर। त् तुम उणी क्या लगी कि मोबैल सिर्फ व्हाट्सऐप पर छ्वीं लगाण च् और फेसबुक पर मथी गौं की रामप्यारी तैं मैसेज भेजणा क् . ना जी ना। एक ऐप डिजी लॉकर। सरकारी ऐप ची भाई। यीं ऐप पर तुम खुणी अफड़ी मार्कशीट मिल जाली। ये खातिर आप खुणी जै दिन तुम ईं धरती पर जर्म्यन, तैं दिन की तारीख, परीक्षा कु अनुक्रमांक और नामांकन संख्या डालण पड़ली।

.
पिछला हफ्ता एक फिल्म आई छपाक। या फिल्म एसिड अटैक की एक पीड़िता का जीवन पर बणी च। फिल्म कु विरोध भी व्है। किलै कि कुछ लोगुंन दीपिका का JNU मां जाण का विरोध मां फिल्म कु विरोध करी। पर हमारी उत्तराखंड सरकार्न एक बड़्या काम करी। राज्य सरकार् एसिड अटैक सर्वाइवर्स का खातिर पेंशन स्कीम की घोषणा करी। राज्य मंत्री रेखा आर्या न् बताई कि एसिड अटैक सर्वाइवर खुणी हर मैना 5000 सी 6000 की आर्थिक सहायता दिये जाली। ये कदम की तारीफ हुईं चैंदी। चला क्वी जु राजनीति का अलावा भी सौचदू।

.
एक और अच्छी खबर सुणा। उत्तराखंड पुलिस एक खास ऐप ल्योंणी च्. जैसी तुम जब पाड़ी रास्ता पर गाड़ी चलाला त् तुम खुणी ब्लाइंड टर्न यानि नी दिख्याण वावा मोड का बारा मां पैली ही पता चली जालु। बैजी ब्लाइंड टर्न सही बताई न् मैन। नी बताई व्हलु सई बतै द्यांक्या कन बैजी गाड़ीघोड़ा छौ नीन्हम त् विश्वानाथ ट्रांसपोर्ट का धक्का खाण वावा छां।

हां हम बात छई कना उत्तराखंड पुलिस की ऐप की। ऐप कु नौं व्हलु मेरी यात्रा। ऐप 31 जनवरी तक लॉन्च व्है जाली। ईं ऐप की मदद सी एक्सिडेंट कम व्हण की उम्मीद च।

.
बैजी…. तुम चाहे सुंघुर पाया, बाघ पाया या फिर रीख।.. पर गलती सी भी लैबरा डोग पाया भाई। अरे लबरा छौरी वाई लबरा न् रै…. यु नी उंदु लबरा डोग. भई सु अंग्रेजी कुत्ता। जी हां। त् एक दुखभरी काणी सुणा। उद्धम सिंह नगर जिला मां द्वी परिवारु का पास छई लबरा कुकुर। द्वी का कुकुर दिसंबर का मैना मां ख्वै गैनी। एक दिन एक भला मनखी वुणी एक लबरा कुकुर मिलगे। और वै भला मनखीन् फेसबुक पर पोस्ट लिखी कि भई जैकु भी यू कुकुर सु फुंडु लिगै द्या। अर बल यख पोस्ट वई, तक द्वी परिवार एग्यन और बोलण बैठिग्यन कि यु कुकुर मेरु च। त् भई फैसला जब वई नी। पुलिस का पास मामला गै।

पुलिसन् भी दिमाग लगाई और बोली कि द्वी कुकुर उणी तैका नौं सी बुलालाकुकर जैमा जालू, कुकुर तैकु। लेकिन लबरा कुकुर लबरा छई. द्वी मालिकुन तै अफड़ा धर्यां नौं सी बुलाई और स्वी द्वी मां नैंगे। पुलिस भी अफड़ु कपाउ पकड़ीक बैठी। फिर पुलिसन् रात भर सु कुकुर कस्टडी मां रखी और ये दौरान द्वी मालिक भी वखी रैन।


ये वक्त मां भी कुकुर द्वी मालिकु दगड़ी मस्त करी घुमणु रै। पुलिसन् कपाउ पर चोट मारी कि अब फैसला कन क्वै वलु। तब तैं सुबेर कु एक मालिकन लिखिक दे दिनी कि यू कुकुर तैकु नी। त् भई लबरा कुकर लबरा निकली भै। या खातिर छौं ब्वनु रीख पाया, बाघ पाया, पर लबरा नौं कु कुकुर ना पाया। अफड़ा पाड़ी कुकुर ही बड्या छन। मोटाताजा भी और ईमानदार भी।

.
अब उत्तराखंड का जथगा रेलवे स्टेशन छिन.. सबु पर संस्कृत मां स्टेशन कु नों नजर आलू। मतलब यु मौका छैंछी भैजी कि अगर संस्कृत मां तुम पास नी वै सक्यन। पर थ्वाड़ा बौत संस्कृत जांदी स्टेशन खड़ू वै तैं तुम दगड़्यों दगड़ी संस्कृत आणा की धौंस मारी ही सकदां। पैली स्टेशनों कु नौं हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू मां होंदू छै। पर अब संस्कृत मां. तुमखुणी बतैद्यां कि संस्कृत उत्तराखंड और हिमाचल की दूसरी आधिकारिक भाषा च।

.

अब सुणा तुम सबसी ब्रेकिंग न्यूज। एश्वर्या राय बच्चन, जिंकी एक बेटी च। तिंन बौत बड़ी बात हमसी छुपाई। जु पिछला हफ्ता बैर आई। बल एक 32 साल आदमी कु दावा ची कि बल सु एश्वर्या कु नौन्याअ ची। तैकु बोलणु ची कि 1988 मां ऐश्वर्यान तै जनम दिनी। और बाद मां ऐश्वर्या का मांबापन् सु द्वी साल तक पाई। बल एश्वर्या इथरु बड़ु पाप लुकायुं रै। अब क्या वलु रै अभिषेक।

जथगा उमरै बिचारी एश्वर्या व्हली। तैंका आसापास की उम्र कु तिंकु नौन्याअ भी लो। भै।क्या व्हैगी ईं दुन्या उणी। कलियुग सचै ऐगे बै। कना कना दावा छिनकना कना लोग।

.
तन बल पुलिस का हाथ बड़ा लंबा होंदनक्वी भी अपराधी तौंकि पौंछ सी बची नी पौंदु. पर बैजी यु कैन नी बताई कि तौंका हाथ लंबा होंदा छांपर अपराधी उठोणै की ताकत कभीकभार कम पड़ी जांदी। जी हांमामलु इराक कु च।यख सुरक्षाबलों की एक टीमन आतंकी संगठन ISIS का एक आतंकी वुणी गिरफ्तार करी। लेकिन सु गाड़ी मां नी आई। असल मां आतंकी कु वजन इथगा छई कि कार मां सु घुसी ही नी सकी। रिपोर्ट का मुताबिक मौलवी कु वजह २५० किलोग्राम छई। त् आखिर मां सुरक्षाबल उणी ट्रक बुलौण पड़ी और फिर तै आतंकी उणी पुलिस स्टेशन लिगाई। मी यु स्वाचणु छौं कि कखि पुलिस स्टेशन का दरवाजा छ्वटा पड़ी व्हला पुलिस कु या हैकु खर्चा बड़िगे व्हलू।

१०.

हफ्ता मां सिर्फ 4 दिन नौकरी और दिन आराम। सुणी कति भलु लगणु च। पिछला कुछ दिनु बटी सोशल मीडिया पर मैसेज वायरल व्हणु च। जैका अनुसार फिनलैंड सरकार हफ्ता मां चार दिन सिर्फ नौकरी की व्यवस्था कन वाई च। और छह घंटा काम। कई बड़ाबड़ा न्यूज चैनलुन भी खबर चलाई।

लेकिन अब फिनलैंड सरकारन् बोलीअरे भाई।इथगा ज्यादा सुपिन्या नी द्याखा। हमारु इनु क्वी विचार नी। और यु सिर्फ एक मीटिंग मां यनी बात वई छईइथगा गंभीरता सी ल्याणा की जरुरत क्या भै।

  

धगुली, हंसुली बच्चे अब पहनेंगे ही नहीं, पढ़ेंगे भी

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक किताब के कुछ पन्ने वायरल हो रहे हैं। इन पन्नों पर उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा में बच्चों के लिए कविताएं लिखी गई हैं। हर उत्तराखंडी इन कागजों को एक उम्मीद के साथ शेयर कर रहा है।उसे उम्मीद है कि ये कागज सिर्फ कंप्यूटर से बने ना हों और कहीं पाठ्यक्रम हिस्सा हों। जब हमने किताब के इन टुकड़ों की पड़ताल की तो हमें जो पता चला वो हमारी तरह ही आपके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान ला देगा।

गढ़वाली भाषा में किताब

गढ़वाली भाषा में किताब

मेरा बालपन मां

नाना न् धगुली दिनी

दादा न् हंसुली पैराई

दादी न् बोली- छुबकी पैर

नानी न् खुटुक पैजबी ल्याई

बाबा दगड़ी बाजार गयूं

बाबा न् मैंकु झुमकी मुल्याई

मेरू बालपन यों हाथों न् सजाई

धगुली… हंसुली…. छुबकी… पैजबी… झुमकी…. उत्तराखंड के हर शख्स ने इन शब्दों को सुना होगा। जिनका बचपन पहाड़ की वादियों में गुजरा है, उन्हें कभी उनके नाना ने तो कभी दादा ने धगुली और हंसुली पहनाई होगी। हमारे दादा-नाना के ये तोहफे ही अब हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा सिखाएंगे। हमारी अगली पीढ़ी को ये उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा सिखाएंगे।

पहले बात करते हैं इन वायरल पन्नों की। ये जो वायरल पन्ने आपको दिख रहे हैं, ये पौड़ी में पहली से 5वीं के बच्चों की किताबों का हिस्सा हैं। पौड़ी के जिलाधिकारी डीएस गबरियाल को इसका श्रेय जाता है। उन्होंने यहां पहली से लेकर पांचवीं क्लास तक गढ़वाली भाषा में पाठ्यक्रम शुरू किया है। पहली क्लास की किताब का नाम है. धगुलि, दूसरी के लिए हंसुलि, तीसरी के लिए छुबकी, चौथी के लिए पैजबी, पांचवीं क्लास के लिए झुमकि।

एक किताब का नाम झुमकी है

एक किताब का नाम झुमकी है

उत्तराखंड में दो प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं। गढ़वाली और कुमाऊंनी। दोनों ही भाषाएं अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनेस्को की उस सूची में शामिल हैं, जिसमें लुप्त होने की कगार पर खड़ी भाषाओं को रखा गया है। कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए भी प्रयास शुरू हो चुके हैं। यहां भी इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की पहल की गई है।

पौड़ी में तैयार की गई इन किताबों में उत्तराखंड की संस्कृति, वाद्य यंत्र, हीरो व अन्य कथा०कहानियों को शामिल किया गया है। इन किताबों के जरिये बच्चों को बचपन से ही अपनी संस्कृति से जोड़ना है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट पाइलट बेसिस पर किया जा रहा है। अगर यह पौड़ी में सफल होता है, तो इसे राज्य की अन्य जगहों पर भी लागू किया जा सकता है।

गबरियाल कहते हैं कि मैं जैसे ही पौड़ी आया, वैसे ही मैंने इस काम के लिए एक टीम बनाई और इस टीम ने इन किताबों को तैयार किया है। 

गबरियाल जी की इस पहल और कोशिश की जितनी हो सराहना कम ही पड़ेगी। उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि वह भी कुछ ऐसी पहल पूरे राज्य में करे। सिर्फ गढ़वाली के लिए नहीं, बल्कि कुमाऊंनी की खातिर भी। ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा बोल सके। समझ सके और सहज सके। 

वीडियो देखें

उत्तराखंड बजट: इं‍ग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे के साथ ‘मातृभाषा स्पीक‍िंग डे’ भी हो जाए तो…

उत्तराखंड सरकार ने गुरुवार को वर्ष 2018-19 के लिए 45,585 करोड़ रुपये का बजट पेश किया. वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने गैरसैंण विधानसभा में यह बजट पेश किया. इसमें जहां सबसे ज्यादा फोकस किसानों पर रखा गया है, वहीं, गैरसैंण और माताओं व श‍िशुओं के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र के लिए भी कई प्रावधान किए गए हैं. इन प्रावधानों में से ही एक है, ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’.

‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’
बजट में क्या-क्या खास रहा और राज्य के निवासी को इससे क्या मिला. इसका विश्लेषण और समीक्षा तो आपने समाचार साइटों पर पढ़ लिया होगा, लेकिन एक अहम घोषणा जो इस बजट में की गई है. हम आपका ध्यान उस तरफ खींचना चाहते हैं. बजट में प्रावधान किया गया है कि हर शन‍िवार को ‘इंग्ल‍िश स्पीकिंग डे’ मनाया जाएगा.

अंग्रेजी तो बोल लेंगे, लेकिन पहाड़ी कब
कहने का मतलब यह है कि इस दिन हर स्कूल में ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग क्लासेज’ हो सकती हैं. इसके साथ ही छात्रों को अंग्रेजी बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. यह अपने आप में एक सराहनीय कदम है. अंग्रेजी आज के कारोबार जगत की अहम भाषा बन चुकी है, लेक‍िन इस प्रस्ताव को रखने के दौरान हमारी सरकार यह भूल गई कि हमारी मातृभाषा को इससे ज्यादा संरक्षण की जरूरत है.

‘मातृभाषा स्पीकिंग डे’ की है जरूरत
जैसे हमने ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’ रखा है, क्या इस तर्ज पर ‘मातृभाषा स्पीकिंग डे’ नहीं रखा जा सकता था. पहाड़ छोड़कर मैदान आ चुके लोग अब धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी भूलते जा रहे हैं. ज्यादातर परिवार अपने घर में बच्चों से अपनी भाषा में बात करना भूल रहे हैं.

नहीं है कोई क्लास
अंग्रेजी तो वे स्कूल में भी सीख लेते हैं, लेकिन उत्तराखंडी भाषाओं के लिए अभी तक कोई क्लास नहीं लगती है. न ही इसे बच्चों को पढ़ाने के लिए पुख्ता इंतजाम ही राज्य में हैं. बजट में भी कोई ऐसी खास घोषणा नहीं की गई है, जिससे यह राहत हो कि राज्य में मातृभाषाओं को बढ़ावा मिल रहा है.

लुप्त होने की कगार पर हमारी भाषा
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक गढ़वाली दुनिया की उन भाषाओं में शामिल हो गई है, जो खत्म होने की कगार पर हैं. यूनेस्को ने इस गढ़वाली अर्थात गढ़वाली और कुमाऊंनी दोनों भाषाओं को ‘वलनरेबल’ श्रेणी में रखा है. इसका मतलब यह है कि ये भाषाएं बच्चे घर पर तो बोलते हैं, लेक‍िन आम बोलचाल में इनका इस्तेमाल नहीं करते हैं.

सिर्फ 27 लाख लोग बोलते हैं यह भाषा
यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड की करीब 1.80 करोड़ की जनसंख्या में से सिर्फ 27 लाख, 9 हजार 5 सौ लोग इन भाषाओं में बात करते हैं. धीरे-धीरे इस भाषा में बोलने वालों की तादाद घट रही है. अगर प्रयास नहीं किए गए, तो एक दिन यह लुप्त हो जाएगी.

ऐसे में सरकार को चाहिए कि इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे के जैसे ही ‘गढ़वाली अथवा कुमाऊंनी स्पीकिंग डे’ भी रखा जाए, तो शायद अपनी मातृभाषा को भी कुछ बढ़ावा मिल सके.

हिंदी के कुछ शब्द कुमाऊंनी में…

उत्तराखंड में तीन समृद्ध भाषाएं बोली जाती हैं. इसमें कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी शामिल है. इन तीन भाषाओं की कई उपबोलियां भी उत्तराखंड में बोली जाती हैं.  यह सेक्शन आपको इन भाषाओं को सीखने और बोलने में सहयोग करने की हमारी एक कोश‍िश है.

कुमाऊंनी में हिंदी के कुछ आसान शब्द

हिंदी कुमाऊंनी
मैं मी/मैं
वह वु/उल/वु
वह (लड़की) वु
तुम तू/तेर/त्यारु
यह या/यो
वो वो/वु
आता हूं आई/औंणों छों
साथ दगड़
झगड़ा झगड़
छोटा भाई भुल
किचन चुल
रुपया पैंस
गजक पिन

 

 

मौसम से जुड़े शब्द ‘गढ़वाली’ में…

उत्तराखंड में तीन समृद्ध भाषाएं बोली जाती हैं. इसमें कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी शामिल है. इन तीन भाषाओं की कई उप बोलियां भी उत्तराखंड में बोली जाती हैं.  यह सेक्शन आपको इन भाषाओं को सीखने और बोलने में सहयोग करने की हमारी एक कोश‍िश है.

मौसम से जुड़े कुछ शब्द गढ़वाली में

हिंदी गढ़वाली
धूप घाम
हवा बथों/हव्वा
बर्फ ह्यूं/ध्याण/ बरफ
ओला ढांडू
छाया छैल
आसमान सर्ग/अगास
बारिश बरखा

गढ़वाली भाषा में कुछ ऐसे पुकारते हैं ऋतुओं का नाम…

उत्तराखंड में तीन समृद्ध भाषाएं बोली जाती हैं. इसमें कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी शामिल है. इन तीन भाषाओं की कई उपबोलियां भी उत्तराखंड में बोली जाती हैं.  यह सेक्शन आपको इन भाषाओं को सीखने और बोलने में सहयोग करने की हमारी एक कोश‍िश है.

गढ़वाली में ऋतुओं के नाम

बसंत – मौल्यार
ग्रीष्म – रूड़ी / करषा
बारिश – चौमास (बरखा)
शरद – क्वठार-भंडार
शिशिर – ह्यूंद
हेमंत – झाड़पात

देखें वी‍डियो

WhatsApp पर करें गढ़वाली-कुमाऊंनी में टाइप

उत्तराखंड में कई भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं, लेक‍िन प्रमुख तीन भाषाएं हैं. गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी. सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ इन पहाड़ी भाषाओं को बचाने का प्रयास चल रहा है. इस प्रयास को गूगल का भी साथ मिला है. गूगल ने गढ़वाली और कुमाऊंनी को अपने ‘गोकीबोर्ड’ में शामिल किया है.

ज्यादातर एंड्रॉयड फोन पर ‘गो कीबोर्ड’ इंस्टॉल होता है. इसकी बदौलत ही आप व्हाट्सऐप, फेसबुक मैसेंजर और अन्य जगहों पर टाइप करते हैं. जिस तरह आप अभी तक हिंदी में टाइप करते थे, उसी तरह अब आप गढ़वाली और कुमाऊंनी भी टाइप कर सकते हैं.

कैसे करें यूज:
गढ़वाली और कुमाऊंनी कीबोर्ड चुनने के लिए आपको गोकीबोर्ड ऐप के सेटिंग्स में जाना होगा. यहां आपको ‘Choose Keyboard’ का विकल्प मिलता है. इसे सेलेक्ट करें और आपके सामने भाषाओं की एक पूरी लिस्ट आएगी. इस लिस्ट में ही आपको गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा म‍िलेगी.

ऐसे हो जाएगा काम
भाषा को सेलेक्ट करने के बाद आपको ‘Add Keyboard’ करना है. जैसे ही आप इस पर क्ल‍िक करेंगे. आपके जीबोर्ड में गढ़वाली अथवा कुमाऊंनी कीबोर्ड भी जुड़ जाएगा. इसके बाद आप टाइप करते समय जैसे हिंदी और अंग्रेजी के बीच स्व‍िच करते हैं, वैसे ही आप इन पहाड़ी भाषा के लिए भी कर सकते हैं.

garwali keyboard1

म‍िलते हैं ऑटो सजेशन

गूगल देता है सुझाव:
गोकीबोर्ड से जब आप टाइप करते हैं, तो हमेशा आपको सामने शब्दों का ऑटो सजेशन आता है. पहाड़ी भाषाओं के मामले में भी यही है. जैसे ही आप कोई शब्द टाइप करते हैं, वैसे ही आपके सामने गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषा के शब्दों का ऑटो सजेशन आने लगता है.

कीबोर्ड पर हाथ ब‍िठाएं
शुरुआत में कीबोर्ड पर पकड़ बनाने में आपको टाइम लग सकता है, लेक‍िन कुछ दिन तक प्रैक्ट‍िस करने के बाद आपको अपनी मातृभाषा में टाइप करने में बड़ा मजा आएगा. गोकीबोर्ड ने गढ़वाली और कुमाऊंनी ही नहीं, बल्क‍ि भारत की अन्य कई भाषाओं को गोकीबोड पर जगह दी है.

यहां से करें इंस्टॉल
आप गोकीबोर्ड को आसानी से ‘गूगल प्लेस्टोर’ से डाउनलोड कर सकते हैं. आप नीचे दी गई ल‍िंंक पर क्लि‍क करके सीधे इस ऐप को डाउनलोड कर सकते हैं.

डाउनलोड करने के ल‍िए यहां क्ल‍िक करें

गढ़वाली सीखें