गढ़वाली कविता: तीन मई….

तीन मई …  थे रे  बई
घर मा रई ,कखी न जई,
खई पैई  अर  सैंयू   रई
पर  तू  भैर कतै न जई 

किताब पढ़ी, गीत सुणी
या त ऊन की स्वेटर बुणी
चौकू चूल्हू तू करदू रई
झाडू पोछा म वक्त बितई !!
पर  तू  भैर कतै न जई l

रिश्तेदारों तैं फोन मिलई 
दोस्त-यारों तैं याद दिलई
सेवा सौंली सबू तै भेजदू रै
राजी खुशी त्यूं की पुछणू रई
पर तू भैर कतै न जई

गरीब छैं त गरीब ही रई
झोली झंगौरू छंछैणू खई
लोग त्वै मा दैण क आला
तू  कैम मागण न जई
पर तू भैर कतै न जई 

अंधियारा का बाद उजालू आळू
नयू सुरज  तब  जगमगाळू
बंच्या रौला त मेहनत करला
ई बात अपणा बच्चों बिंगई
पर तू भैर कतै न जई !!

(सोशल मीडिया से साभार)

नइमा खान उप्रेती: पूरी जिंदगी उत्तराखंडी लोक संगीत पर न्यौछावर की

उत्तराखंडी लोकसंगीत और लोकनाट्य को पहाड़ के घाटे-बाटों से निकालकर विश्व पटल पर पहुंचाचाने में अहम भूमिका निभाई है। आज जब आप बेडु पाको बारोमासा और लाली हौेंसिया जैसे गीत गुनगुनाते हैं, तो इन गीतों को भी आप तक पहुंचाने में इनकी अहम भूमिका रही है। इनका नाम है नइमा खान उप्रेती। जी हां… नईमा खान उप्रेती। 

कौन हैं नइमा खान उप्रेती
अल्मोड़ा के कारखाना बाजार में एक समृद्ध मुस्लिम परिवार रहता था। इसी परिवार में सन 1938 में नइमा खान का जन्म हुआ। नइमा का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब उत्तराखंड का लोकसंगीत सिर्फ लोगों के बीच था। इसका अभी तक आधिकारिक मंचन और आधिकारिक रिकॉर्ड कहीं भी नहीं हुआ था।

नइमा खान को बचपन से ही गायन का शौक था। वह हिंदी फिल्मों के गीत गुनगनाया करती थीं।… बाद में नइमा खान के गायन का यही शौक स्कूल और कॉलेज में भी जारी रहा।… गायन के इसी शौक के जरिये उनकी मुलाकात भारतीय थियेटर म्यूजिक के प्रणेता मोहन उप्रेती से हुई।

मोहन उप्रेती के साथ आने के बाद नइमा ने उत्तराखंडी नाटकों के मंचन में भी भाग लिया। और इसी दौरान दोनों में प्रेम उपजा और दोनों ने शादी कर ली। 2018 में नइमा ने आखिरी सांस ली… लेकिन वह आखिरी सांस तक उत्तराखंडी लोकसंगीत को बढ़ावा देने में जुटी रहीं।

मोहन उप्रेती जी से पहली मुलाकात
नइमा खान की मोहन उप्रेती से मुलाकात काफी दिलचस्प रही। एक इंटरव्यू में नइमा ने खुद इसका जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि एक दिन उनके कॉलेज में मोहन उप्रेती जज बनकर आए थे। इस कार्यक्रम में नइमा ने भी गाना गाया। हमेशा पहले पायदान पर आने वाली नइमा को उप्रेती ने दूसरे पायदान पर चुना। नइमा इससे गुस्सा हो गईं और उन्होंने जज यानि उप्रेती की आलोचना करनी शुरू कर दी।

भले ही इनकी शुरुआत थोड़ी कड़वी रही, लेकिन आगे जाकर इन्होंने साथ मिलकर उत्तराखंडी नाटक किए। राजुला मालुशाही, रामी बौराणी, इंद्रसभा समेत कइ नाटकों को इन्होंने मंच पर प्रदर्शित किया था।… महिलाएं क्योंकि नाटक नहीं करती थीं। इसलिए नइमा सिर्फ बैकग्राउंड में गाती थीं। हालांकि बाद में उन्होंने नाटक में हिस्सा भी लिया। और अपने पति के साथ पर्वतीय नाट्य कला मंच की स्थापना भी की। दोनों के दिल में प्रेम के बीज तो पनपे लेकिन हिंदू ब्राह्मण परिवार से आने वाले उप्रेती जी के परिवार को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। हालांकि बच्चों की जिद के आगे दोनों परिवारों को झुकना पड़ा और नइमा खान नइमा खान उप्रेती बन गईं।

मोहन उप्रेती और नइमा ने साथ मिलकर उत्तराखंडी लोकसंगीत को पूरे देशभर में पहुंचाया। नइमा ने एक इंटरव्यू में बताया कि बेडु पाको गीत मोहन उप्रेती ने लिखा नहीं है। उन्होंने कहीं ये गीत सुना था। जब उन्होंने यह गीत सुना था… तो यह काफी धीमे सुर में था।

उन्होंने इस गीत को धुनबद्ध किया और देश-दुनिया तक पहुंचाया। इसके अलावा आज जो घस्येरी गीत आप सुनते हैं, वे भी इन्हीं की वजह से हैं। क्योंकि इस जोड़ी ने घस्येरी गीतों का जगह-जगह मंचन किया। 

रामी बौराण
रामी बौराण पहले सिर्फ एक गीत था। लेकिन इस जोड़ी ने ही इसे नाट्य रूप दिया। नइमा ने १९५३ में गायन की औपचारिक शुरुआत की। 1967 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की शिक्षा ली। 1973 में नइमा दूरदर्शन से जुड़ीं। देश में जो सबसे पहला कलर शो चला था, उसका हिस्सा भी नइमा रही हैं। 

महान इंसान का दर्जा हासिल किया
नइमा चाहती तो बॉलीवुड में एक्टिंग या गायन कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक उत्तराखंड लोकनाट्य को बढ़ाने का काम किया। पर्वतीय नाट्य कला मंच आज भी उत्तराखंडी नाटकों का आयोजन करता है। यूट्यूब पर भी आपको ये देखने को मिल जाते हैं।

अब वो बात जो उन्हें महान इंसान बनाती है। दरअसल अपनी मौत से पहले ही नइमा ने कह दिया था कि उनके मरने के बाद उनके शरीर को जलाया या दफनाया न जाए। बल्कि इस शरीर को अस्पताल में दान कर दिया जाए। और ऐसा ही हुआ।… उनके शरीर को दिल्ली एम्स में डोनेट कर दिया गया। 

अपने आखिरी समय में नइमा दिल्ली में किराये के कमरे में रह रही थीं। हमारी राज्य सरकार को तो भनक भी नहीं लगी कि नइमा खान नहीं रहीं।… और सरकार को ये भी चिंता नहीं है कि वो इन विभूतियों के गीतों को सहेजे। खैर, अंधी-बैरी सरकारों से उम्मीद भी क्या करना। 

…पलायन बेचारा जीत गया

यह कविता सोशल मीडिया से ली गई है। हम इसके लेखक का नाम तो नहीं जानते पर ये कविता सच बयां करती है।…

अटठारह साल का उत्तराखंड
कुछ इस तरह से बीत गया!
सत्ता की दौड़ में कभी कमल
तो कभी हाथ ही जीत गया!!

महफूज़ थे जो खेत खलिहान
उन सबको बंजर कर गया!
पुश्तैनी मकानों की नींव को
पलायन से जर्जर कर गया!!

पहाडों की रौनक और खुशियां
गांवों को सुनसान कर गया!
विकास भी पहाडों में आने से
धरातल पर सचमुच डर गया!!

राज्य बनाया जिस मकसद से
वो सपनों मे ही रीझ गया!
विकास की दौड़ में पहाडों में
पलायन बेचारा जीत गया!!

डांडी-कांठ्योंन भी धै लाणी छोड़याली…

उंद्यार बगण बैठिग्यां सभी
उकाअ नी कैका बसा की.
डांडी-कांठ्योंन भी धै लाणी छोड़याली,
क्वी बाच नी सुणदो अब यखा की.

पाड़ का जरम्यां परदेश का बणी गैन
बांझी ड्वखरी-मोरों पर तावा लैगेन.
अफड़ी औलाद औंदी सैलानी बणीक,
इखुली गुंडा-गूठ्यारुं की स्वैण कैन.

हिसाब कु लगालू पाड़ै की व्यथा की
डांडी-कांठयोंन भी धै लाणी छोड़याली,
क्वी बाच नी सुणदो यखा की.

डाम हमरी जिकुड़ी पर कै छन पैणा
पर यु त् बतावा ई कैक तैं छन बैणा
रोजगार हो या खेती आज भी नी यख,
नौंना हमरा परदेशो बाटु छन पकैणा.
जिम्मेदार कै बणौण पाडै़ की ईं दशा की
डांडी-कांठयोंन भी धै लाणी छोड़याली,
क्वी बाच नी सुणदो यखा की.

कादि उत्तराखंड कु विकास वालू
परदेश जायूं नौना घर बौड़ी आलू.
सुरोजगार मिललू जब अफड़ा मुलुक
केक क्वी उंदरी का बाटा जालू.

हरित प्रदेश बण सकदां छैं छी बसा की.
प्रयास जु हम सब मिलीक कौला भै-बंदो,
और सुणु जु सरकार यखा की

डांडी-कांठ्योंन भी धै लाणी छोड़याली,
क्वी बाच नी सुणदो अब यखा की.

                                                         -शायर दिलशाद

 

अच्छे दिन आने वाले हैं?

वो कहते हैं अच्छे दिन आने वाले हैं.
और मैं सोचता हूं कब और कैसे आएंगे?

क्या वो बड़े महानगरों को जोड़नेवाली,
उन मेट्रो ट्रेनों में बैठकर आएंगे?
जो मेरे इन दूर-दूराज के गांवों तक नहीं पहुंचेगी.
क्या वो उन बड़े-बड़े आईआईटी कॉलेजों से निकलेंगे?
जिनके बारे में मैंने सिर्फ सुना भर है.
लेकिन कभी उन्हें देख तक भी नहीं पाऊंगा.
क्या वो शहर की उन चिकनी सड़कों से पहुंच पाएंगे,
मेरे गांव तक पहुंचने वाले ऊबड़-खाबड़ रास्ते से?

क्या वो अच्छे दिन पहुंच पाएंगे उत्तराखंड के उन गांवों में,
जहां आजादी से लेकर अभी तक कोई नेता नहीं पहुंचा है.
क्या वो पहुंच पाएंगे झारखंड के उन गांवों में,
जहां कोयला तो करोड़ों का है, लेकिन इन्सान की कीमत नहीं।
क्या वो पहुंच पाएंगे राजस्‍थान के उन गांवों में,
जहां लोग मीलों से पानी लेकर आते हैं और वो भी खारा।
क्या वो पहुंच पाएंगे उस भारत तक,
जो आज भी गांवों में है और इंतजार कर रहा है,
अच्छे दिनों का.

ये अच्छे ‌दिन, जो बनाए हैं मीडिया और फेसबुक ने
इसे नहीं दिखते वे बुरे दिन, जिनसे भारत आज भी जूझ रहा है.
ये अच्छे दिनों का सपना दिखाया है जिन नेताओं ने
उनके लिए गरीब की भूख से ज्यादा जरूरी है डेवलपमेंट.
डेवलपमेंट, वो भी किसका? इंडिया का, भारत का नहीं।
और हम उसी दिखावटी डेवलपमेंट के पीछे भूल रहे हैं,
आज भी भूख से मर रहा है भारत।
और हम कह रहे हैं….
अच्छे दिन आने वाले हैं….
क्या सच में?

                                                        – शायर दिलशाद

 

उत्तराखंड का राज्य गीत…

उत्तराखंड देवभूमि-मातृभूमि
शत्-शत् वंदन अभ‍िनंदन
दर्शन, संस्कृति, धर्म, साधना
श्रम रंजित तेरा कण-कण.
अभ‍िनंदन अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि….

गंगा-यमुना तेरा आंचल
दिव्य हिमालय तेरा शीश
सब धर्मों की छाया तुझ पर
चार धाम देते आश‍िष
श्री बदरी, केदारनाथ हैं
श्री बदरी, केदारनाथ हैं
कलियर, हिमकुंड अति पावन.
अभ‍िनंदन अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि….

अमर शहीदों की धरती है
थाती वीर जवानों की
आंदोलनों की जननी है ये
कर्मभूमि बल‍िदानों की
फूले-फले तेरा यश वैभव
तुझ पर अर्प‍ित है तन-मन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

रंगीली घाटी शौखों की या
मंडुवा झुंगुरा भट अन्न-धन
रुम-झुम-रुम-झुम, झुमैलो-झुमैलो
ताल, खाल, बुग्याल, ग्लेश‍ियर
दून तराई भाबर बण
भांट‍ि-भांटि लगै गुजर है चाहे
भांट‍ि-भांटि लगै गुजर है चाहे
फिर ले उछास भरै छै मैन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

गौड़ी-भैंस्यूंन गुंजदा गुठयार
ऐपण सज्यां हर घर हर द्वार
काम-धाण की धुरी बेटी ब्वारी
कला प्राण छन श‍िल्पकार
बण पुंगड़ा सेरा पंदेरो मां
बण पुंगड़ा सेरा पंदेरो मां
बंटणा छन सुख-दुख संग-संग
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

कस्तूरी मृग, ब्रह्मकमल है
फ्यूंली, बुरांस, घुघती, मोनाल
रुम-झुम-रुम-झुम, झुमैलो-झुमैलो
ढोल नगाड़े, दमुवा हुड़का
रणसिंघा, मुरली सुर-ताल
जागर, हारुल, थड्या, झुमैलो
ज्वाड़-छपेली पांडव नर्तन.
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

कुंभ, हरेला, बसंत, फूलदेई
उत्तरैणी कौथिग नंदा जात
सुमन, केसरी, जीतू, माधो
चंद्रसिंह वीरों की थात
जियारानी तीलू रौंतेली
जियारानी तीलू रौंतेली
गौरा पर गर्व‍ित जन-जन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमिuttrakhand map

 
यहां सुनेंं पूरा गीत

गढ़वाली कव‍िता: म्यारा गौं मां जब मनखी छाई…

सुबेर उठ‍िक लगदी छै छ्वीं
तेरी मी मां, मेरी त्वै मां.

गौं का गौं व्हैन खाली
मी ई सौंचणू रौ ब्याई

घास पाता को डांडा जांदा छाई
थड्या-चौफड़ा ख्यलदा छाई
खैरि खुद लगांदा छाई
म्यारा गौं मां जब मनखी छाई…

मयाई मुखड़ी, रगर्यांदी आंखि छाई
झुरदी झ‍िकुड़ी, बडुई लगदी सांखी छाई
रोंदा बाआ बुथ्यांदा दाना छाई
म्यारा गौं मां जब मनखी छाई…

घसेरि गीत गांदी छाई
बैख ठुमका लगांदा छाई
द्यूर बौजिक मजाक छाई
द्यूरण‍ि का नाक लगदी घचाक छाई
म्यारा गौं मां जब मनखी छाई…

इग्वास बग्वाअ आंद‍ि छाई
छ‍िल्लों का मुट्ठों का भैला खिलेंदा छाई
स्वावा चूड़ा पकदा छाई
म्यारा गौं मां जब मनखी छाई…

– नूतन तनु पंत (गढ़वाली पत्रिका ‘धाद’ से साभार)