आप उत्तराखंड के हैं, क्या ये 5 चीजें पता हैं आपको?

गुजरते वक्त के साथ पुरानी चीजें छूटती चली जाती हैं और नई चीजें अपनी जगह बना लेती हैं। आज हम आपको 5 ऐसी चीजों के बारे में बताने वाले हैं जो न सिर्फ पहाड़ की परंपराओं का अभिन्ना हिस्सा रही हैं बल्कि इन चीजों की बदौलत पहाड़ की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा का जीवन चलता था। ये 5 चीजें जो अब पहाड़ में बहुत ही कम सुनाई या दिखाई पड़ती हैं। और नई पीढ़ी को शायद इनके बारे में पता भी नहीं है।

1. ढाकर

ढाकर पैटी रे माडू थैर्वाअ
अस्सी बरस कु बुढया रे माडू थैर्वाअ

पहाड़ का जीवन हमेशा से संघर्षों से भरा रहा है। उसी की बानगी है ढाकर। पुराने वक्त में लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर ढाकर जाते थे और जरूरत की चीजें लाया करते थे। इस दौरान कोटद्वार समेत कई जगहों पर ढाकर मंडिया लगा करती थीं। जहां लोग अपने खेतों और सग्वाड़ों पर उगी मिर्च या दूसरे धान लाया करते थे। मंडियों में इन चीजों के बदले नमक, सब्जियां और जरूरत की दूसरी चीजें ले जाया करते थे।

ढाकर यानि ढोकर ले जाना। जो ढाकर आते थे, उन्हें ढाकरी कहा जाता था। आज लुप्त हो चुकी इस परंपरा से सैकड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई थी। जब लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर ढाकर जाते थे तो रास्ते में कई ढाकरी पड़ाव होते थे। बांघाट और दुग्गड्डा भी कभी ढाकरी पड़ाव थे।

जहां-जहां ढाकरी रुकते तो वहां मनोरंजन का पूरा साधन होता। नाच-गाना करने वाले, जादू खेल दिखाने वाले, मैणा यानि कहावतें, लोकगीतों को गाना जैसे कई तरीके वक्त काटने के लिए अपनाए जाते थे। बदले में मनोरंजन करने वालों को दिया जाता था- इनामी राशि। और इसी से होता था इनका जीवनयापन। ढाकर की परंपरा पर आधे पहाड़ की आजीविका जुड़ी हुई थी।

2. डड्वार
ये एक ऐसी चीज है जो थोड़ी बहुत आज भी बची हुई है। डड्वार पहाड़ में दिया जाने वाला एक प्रकार का पारितोषिक है। ये फसल का एक हिस्सा होता है। बदलते वक्त के साथ फसल के बदले कई जगहों पर पैसे भी दिए जाते हैं। इसे ब्राह्मण, लोहार और औजी को दिया जाता था। सालभर में होने वाली दो फसलों गेंहू-जौ और दूसरी धान के वक्त डड्वार दिया जाता था।

फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को चढ़ाया जाता है, इसे पूज या न्यूज कहा जाता है। दूसरा हिस्सा पंडित को दिया जाता था। सालभर पंडित ने घर में जो पूजा-पाठ किए और उसमें कभी कम दक्षिणा गई हो तो ये डड्वार एक तरह से उस कमी को पूरा करने के लिए दिया जाता था।

तीसरा हिस्सा लोहार का था। फसल काटने से पहले दाथुड़ी और अन्य हथियारों को पैना करने के बदले डड्वार दिया जाता था। वहीं, संग्राद- मक्रैणी और अन्य अहम त्योहारों पर घर आकर ढोल-दमो बजाने वाले औजियों को भी डड्वार दिया जाता था। औजियों को ही डड्वार देने की परंपरा कई जगहों पर आज भी है।

3. बोरू
बोरू डड्वार की तरह ही श्रम के बदले पारितोषिक देने की परंपरा है। जहां पंडित, औजी, लोहार को डड्वार दिया जाता है। वहीं, खेतों में काम करने और किसी अन्य के काम में हाथ बटाने आए ग्रामीणों को बोरु दिया जाता था। यह एक तरह की दैनिक मजदूरी होती थी जो काम करने वाले व्यक्ति को दी जाती थी। हालांकि बदलते वक्त के साथ बौरु की जगह दिहाड़ी ने ले ली है।

4. धिनाली
आज भले ही हालात बदल रहे है। पहाड़ के लोग भैंस, गाय रखने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन एक वक्त था, जब ये सब शान माने जाते थे। जब किसी दुधारु पशु का दूध निकालकर लाया जाता है तो उसे हमेशा छुपाकर लाया जाता है. स्थानीय भाषा में दूध, दही, घी आदि को धिनाली कहा जाता है. धिनाली को छुपाने की एक वजह ये भी थी कि किसी की नजर ना लगे और गाय या भैंस कम दूध ना देने लगे। एक वक्त ऐसा भी था, जब धिनाली को परिवार की संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। बिना दूध की चाय पीना, एक गाली मानी जाती थी।

5. कोटी बनाल
कोटी बनाल कोई परंपरा तो नहीं है लेकिन यह वो शैली है, जिससे उत्तराखंड के घर हजारों सालों तक सीना तने खड़े रहते हैं। सीमेंट और शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी बनाल वास्तुकला खत्म सी हो गई है। लेकिन इसके अवशेष आज भी उत्तरकाशी, जौनसार और हिमाचल में देखने को मिलती है। कोटी बनाल से बनाए गए मकान भूकंप रोधी होते थे। और इसमें कई मंजिलों के घर बनाए जाते थे। शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी-बनाल वास्तुकला खोती जा रही है और हम कॉन्क्रीट जंगल अपने पहाड़ में खड़ा करने लग गए हैं।

लूण लोटा: इस प्रथा के बाद कोई वचन तोड़ने की हिम्मत नहीं करता

एक शख्स हाथ में पानी से भरे लौटे को पकड़ता है। दूसरे हाथ से उसमें नमक डालता है। इस दौरान वह अपने मुंह से एक वादा अथवा वचन देता है, जिसे पूरा करने की वो कसम खाता है। लौटे में नमक डालने के बाद वो किसी भी सूरत में अपने वचन को पूरा करने से पीछे नहीं हट सकता।… जी हां. यही प्रथा कहलाती है- लूण लौटा। हिमाचल प्रदेश के कई भागों में यह प्रथा आज भी प्रचलित है। लूण लौटा में लूण यानी नमक होता है।

क्या है यह प्रथा?

उत्तराखंड की तरह ही हिमाचल प्रदेश में भी देवताओं का वास है। पहाड़ के भोले-भाले लोगों की देवी-देवताओं में अटूट आस्था है। इसी आस्था से निकली है- लूण लौटा की प्रथा। हिमालच प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में आज भी ये प्रथा मौजूद है। शिमला और सिरमौर के आंतरिक इलाकों में इसे ‘लूण लोटा’ कहा जाता है. इस प्रथा में देवी-देवाताओं के नाम पर कसम खिलाई जाती है। ये देवी-देवता गांव के इष्ट होते हैं।

लूण लौटा के बाद वचन क्यों नहीं तोड़ते?

जैसे कि हमने शुरुआत में बताया कि लौटे में नमक डालकर कसम खिलाई जाती है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रथा का ज्यादातर इस्तेमाल पंचायती चुनाव में देखने को मिलता है। दरअसल जब एक शख्स पानी से भरे लौटे में नमक डालते हुए कसम लेता है, तो वह एक वादा कर रहा होता, जिसे उसे निभाना ही होगा। अगर उसने नहीं निभाया तो जिस तर पानी में नमक घुल गया और खत्म हो गया। उसी तरह अगर वचन अथवा वादा पूरा नहीं किया तो वचन देने वाल शख्स भी इसी तरह खत्म हो जाएगा।   

सिर्फ लूण लौटा नहीं, ये भी हैं तरीके

ऐसा नहीं है कि हिमाचल में सिर्फ लूण लौटा की ही प्रथा है। लूण लौटा के अलावा कई और तरीके हैं, जिनके जरिये एक शख्स को कसम खिलवाई जाती है। जहां सिरमौर और शिमला में लूण लोटा की परंपरा है। वहीं, मंडी, कुल्लू जैसी जगहों मंदिर के सामने पानी पिलाने और चावल देने की प्रथा है। लाहौल-स्पीति की तरफ बढ़ेंगे तो यहां पर बौद्ध और हिंदू परंपराओं का समायोजन दिखता है। ऐसे में यहां पर जाप के लिए इस्तेमाल की जाने वाली माला के माध्य से कसम दिलाई जाती है।

कसमी नारायण
कुल्लू क्षेत्र में इस काम के लिए एक खास देवता हैं। जिन्हें कश्यप नारायण कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इन्हें कसमी नारायण बुलाया जाता है। आज भी लोग नारायण देवता के सामने झूठी कसम खाने से डरते हैं। लोग डरते हैं कि अगर उन्होंने कसमी नारायण की झूठी कसम खाई, तो उन पर देवता का प्रकोप होगा और उनके जीवन में उथल-पुथल हो जाएगी। 

क्यों और कैसे शुरू हुई ये प्रथाएं?

पहाड़ी राज्य हिमाचल और उत्तराखंड के लोगों की सिर्फ संस्कृति में बहुत सी चीजें एक जैसी हैं। और इनमें देवताओं पर अटूट विश्वास की परंपरा भी है। पहाड़ी राज्यों में आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो अपने गांव से बाहर नहीं निकले हैं। उनके लिए ये देवता ही सर्वोपरि हैं।

इन प्रथाओं की जब शुरुआत हुई थी, तब इनका इस्तेमा विवादों का निपटारा करने के लिए किया गया। विवादों को सुलझाने का यह एक शांतिपूर्ण तरीका था। पर जैसे-जैसे वक्त बदला, लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल भी करना शुरू कर दिया। चुनावों में सबसे ज्यादा इसका गलत इस्तेमाल होता है। लूण लोटा करवाकर वोट पक्के किए जाते हैं।

देवी-देवताओं में हम पहाड़ी राज्यों की आस्था का ही परिणाम है कि आज भी हम कई बुराइयों से बचे हुए हैं। लेकिन देवी-देवताओं में हमारे विश्वास का गलत इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी आइना दिखाना जरूरी है।

लठ पंचायतः न सरकार-न प्रशासन, एक लाठी जो चलाती थी उत्तराखंड

एक लाठी। लकड़ी की वह लाठी जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा करती थी। वह इंसानों के बीच होने वाले झगड़ों को सुलझाती थी। और हर गांव के अच्छे-बुरे फैसले लेती थी वो लाठी।… इस लाठी से ही तैयार हुई लठ पंचायत। उत्तराखंड के गांवों से आज लठ पंचायत लगभग लुप्त हो चुकी है। कुछ ही जगहों पर इसका प्रारूप देखने को मिलता है। इस वीडियो में हम  आपको इस अद्भुत लाठी की लोक कहानी और इससे बनी लठ पंचायत के बारे में बताने वाले हैं। 

शुरुआत लोक कथा से

लठ पंचायत की शुरुअात होेने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उत्तराखंड में आज भी इस संबंध में वो लोककथा प्रचलित है। लोककथा के मुताबिक पहाड़ के गांव और यहां के पंच अपने स्तर पर सही न्याय और हर किसी की जरूरतों का ख्याल रखते थे। यह देखकर एक गांव में रहने वाले साधु ने उस गांव के पंचों को एक लाठी दी। साधु ने इस लाठी को अद्भुत बनाया। साधु ने पंचों से कहा कि ये दिव्य लाठी है। ये मैं तुम्हें दे रहा हूं। यह तुम्हारी और तुम्हारे गांव की रक्षा करेगी। लेकिन शर्त यह है कि इस लाठी का उपयोग निजी फायदे के लिए नहीं होना चाहिए। इसे समाज कल्याण की खातिर इस्तेमाल करना होगा। और इसी शर्त के साथ वह लाठी पंचों को मिली। अगर शर्त नहीं मानी गई तो लाठी की सारी शक्तियां खत्म हो जाएंगी। 

क्या है लठ पंचायत?

जब पंचों को ये लाठी मिली तो उन्होंने इसका इस्तेमाल पूरे पहाड़ की खातिर करने की ठानी।… बैठक बुलाई गई और हर गांव का जंगल, खेत और अन्य संपदा को बराबर बांटा गया।…इसके साथ ही हर गांव लठ पंचायत का गठन किया गया। लठ पंचायत का काम गांव की भलाई के लिए और अपनी वन संपदा को सुरक्षित रखना था।… गांव में होने वाली पैदावार और उससे होने वाली कमाई को भी बराबर बांटा जाता था। इस तरह उत्तराखंड के हर गांव में लठ पंचायत की शुरुआत हुई। आज लुप्त होने के कगार पर खड़ी लठ पंचायत सैकड़ों साल पहले से उत्तराखंड में थी। जिस गांवों में लठ पंचायत होती थी, उस गांव में न प्रशासन और ना ही सरकार का ज्यादा दखल होता था। गांव के हित के सभी फैसले लठ पंचायत लेती थी। 

उस लाठी का क्या हुआ?

जब लठ पंचायत बनी और वन से लेकर जगह-जमीन की सीमा तय की गई, तो उनकी सुरक्षा करने की जरूरत भी खड़ी हुई। ऐसे में दिव्य लाठी को इसका सूत्रधार बनाया गया। वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी हर दिन गांव के किसी एक परिवार को दी जाती।…जिस दिन जिस परिवार की बारी होती है, उस दिन दिव्य लाठी उसके घर पर रखी जाती थी। लाठी का घर पर होने का मतलब होता थी कि वन संपदा की रक्षा करने की जिम्मेदारी उस परिवार की होती थी।… आज भी कई जगहों पर ये प्रथा है लेकिन अलग-अलग स्वरूपों में।

लठ पंचायत के सदस्य और काम

लठ पंचायत के सदस्यों में गांव के पुरुष शामिल होते थे। महिलाओं को इसमें शामिल नहीं किया जाता था। जिस तरह आप आज कई गांवों पंचों की भूमिका देखते हैं। उसी तरह ही लठ पंचायत पंच शामिल होते थे। ये पंच गांव में कोई झगड़ा-फसाद या फिर कोई भी मामला उठता तो उसकी निष्पक्ष सुनवाई करते थे। इस दौरान वो अद्भुत लाठी भी साथ रहती। लठ पंचायत के नियम न कहीं लिखे रहते और न ही कोई इनका रिकॉर्ड रखता। ये सिर्फ आपसी समझ-बूझ और पंचों के फैसले का सम्मान करने के रूप में होता था।

कई जगह आज भी मौजूद ये प्रथा

उत्तराखंड के कई गांवों में आज भी ये प्रथा मौजूद है। बस इसका स्वरूप बदल चुका है। ज्यादातर गांवों में लठ पंचायत की जगह अब वन पंचायत ने ले ली है। जिसका लिखित रिकॉर्ड है और जो सरकार की तरफ से संचालित होती है। लठ पंचायत कहां और कितनी है, इसका कोई सीधा-सीधा रिकॉर्ड नहीं है। क्योंकि हमारी सरकारों ने कभी इनका रिकॉर्ड रखने की कोई जहमत नहीं उठाई। लेकिन आज भी कुछ गांवों में लठ पंचायत का स्वरूप है। टिहरी गढ़वाल और चमोली के कई गांवों में गांव वाले अपने जंगल, अपने घास की रक्षा के लिए इस दिव्य लाठी का सहारा लेते हैं। 

इन गांवों में कुछ महीनों में खासकर भादों के महीने में हर परिवार को घास और जंगल की रक्षा के लिए जिम्मेदारी लेनी पड़ती है। जिस दिन जिस परिवार की बारी, उस दिन उसके घर पर लाठी जाती है। कई गांवों में खेतों से बंदरों और सूअरों को भगाने के लिए ये स्वरूप अपनाया जाता है। कई गांवों में अब ये काम चौकीदारों को दिया जाता है। एक चौकीदार नियुक्त कर के उसे पूरे गांव पैसे जमा कर के देते हैं। इस तरह उसकी तनख्वाह दी जाती है। 

अब कहां है वो दिव्य लाठी?

वो दिव्य लाठी, जो उस साधु ने दी थी। वह आज भी उत्तराखंड के किसी न किसी गांव में मौजूद है और किसी न किसी के घर में दरवाजे के पीछे रखी होगी। उस परिवार को उसकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए। दिव्य लाठी की ये लोककथा न जाने कितनी सच है? लेकिन इसकी वजह से शुरू हई ये लठ पंचायत की प्रथा उत्तराखंड को शुद्ध और सुरक्षित रखने में कारगर रही है। शायद उस लाठी की यही दिव्यता थी कि उसने उत्तराखंड के सारे गांवों को एकजुट रखा और वन संपदा की रक्षा के लिए प्रेरित किया। 

हमारी सरकार को चाहिए कि अगर कहीं भी लठ पंचायत आज भी जीवित है तो उसका रिकॉर्ड तैयार किया जाए। सहेजा जाए। क्योंकि ये हमारी धरोहर है। जिसने उत्तराखंड को हरा-भरा और खुशहाल बनाने में अहम भूमिका निभाई है।   

शिव के इस मंदिर में पूजा करना माना जाता है खतरनाक, जाने क्यों?

जब भी कभी हम मंदिर और मस्ज‍िद की बात करते हैं, तो दिमाग में आता है कि यहां मालिक के किसी रूप को पूजा जाता होगा. लेक‍िन एक ऐसा मंद‍िर भी है. वो भी श‍िव भगवान का. जहां लोग पूजा नहीं करते हैं. बल्क‍ि ऐसा माना जाता है कि जो भी यहां पूजा करता है, वह शापित हो जाता है. और यहां के लोगों के ऐसा सोचने के पीछे एक अहम वजह है. 

यह मंदिर उत्तराखंड में स्थ‍ित कस्बा थल से 70 किलोमीटर दूर बल्त‍िर गांव में है. यहीं स्थाप‍ित है यह मंदिर. यहां भक्त आते हैं. दूर से दर्शन करते हैं. लेक‍िन पूजा कोई नहीं करता. 

इस मंदिर को ‘देवाला’ के नाम से जाना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जो भी यहां पूजा करता है, उसके साथ कुछ अन‍िष्ठ हो जाता है अथवा वह शाप‍ित हो जाता है. इसकी वजह मंदिर के निर्माण से जुड़ी हुई है. 

लोक कथाओं के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण कार्य प्राचीन काल में कत्यूरी राजवंश के दौरान किया गया था. हालांकि इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी कई लोक कथाएं हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर को एक बेहद कुशल कारीगर ने अपने एक हाथ से ही बनाया था. 

एक हादसे में उसका एक हाथ कट गया. अमर उजाला में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक यह कारीगर जब भी वह अपने एक हा‍थ से मूर्तियां बनाता, तो लोग उसका मजाक बनाते. लोगों के उपहास से वह इतना क्रोध‍ित हुआ कि उसने एक फैसला लिया. उसने खुद से वादा किया कि वह अब सिर्फ मूर्तियां नहीं, बल्क‍ि पूरे मंदिर का निर्माण अकेले ही और अपने एक हाथ से ही करेगा.

एक दिन वह अपने सभी औजार लेकर दक्ष‍िण की ओर निकल पड़ा. वह लोगों के उपहास से इतना क्रोध‍ित था कि उसने एक रात में ही पूरा मंदिर तैयार कर लिया. इस दौरान उसने चट्टान काट कर न सिर्फ मंदिर तैयार किया, बल्क‍ि श‍िवलिंग भी बनाया. यह मंद‍िर एक हाथ से बना है. इस वजह से इसे एक हाथिया देवाला भी कहा जाता है.  

मंदिर का निर्माण कर वह कभी वापस नहीं आया. लेकिन जब सुबह गांव वालों ने यह मंदिर देखा तो सब इकट्ठा हो गए. कुछ कहानियों के मुताबिक श‍िवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई थी. तो कुछ में ऐसा वर्णन है कि इसका अर्ग सही नहीं था. इसलिए तब के विद्वानों ने यहां पूजा करने से अन‍िष्ठ होने की आशंका जताई थी. तब से ही इस मंदिर में कोई पूजा नहीं करता.  

क्योंकि यह मंदिर क्रोध और उपहास के जवाब में बनाया गया था. दूसरी तरफ, इसमें स्थापित शिवलिंग में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाई गई है. ऐसे में लोग इसे शापित मंदिर मानते हैं. यहां पूजा करने से हर कोई डरता है. सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर को लेकर आज भी लोगों के बीच यह मान्यता बनी हुई है.

लोक कथा: सत्य वचन

एक गाय हमेशा जंगल जाती थी. उसका एक बछड़ा था. गाय जिस दिन हरी-हरी घास से पेट भर खाती उस दिन बछड़ा छककर दूध पीता. बछड़े को अधिक दूध पिलाने की लालसा में गाय जंगल में दूर-दूर तक निकल जाती. हरी घास का लोभ उसे संवरण नहीं हो पाता था.

घास चरते-चरते एक दिन गाय काफी दूर निकल गयी. जंगल में एक बाघ था. बाघ की नजर जैसे ही गाय पर पड़ी तो वह खुशी से झूम उठा. वह गुर्राया, डर के मारे गाय की हालत पतली हो गयी. वह बोली, “घर पर मेरा एक बछड़ा है. जब मैं भरपेट घास नहीं चरती तो छककर उसे दूध नहीं पिला पाती. वह मेरा इन्तजार कर रहा होगा, आज मुझे नहीं खाओ. मुझे घर जाने दो. उसे दूध पिलाकर मैं लौट आऊंगी.”

गाय की बात पर बाघ खूब हंसा-बोला, “मुझे बेवकूफ समझ रही हो. एक बार जान बचाकर जाओगी तो फिर क्यों आओगी. मुझे तो भूख लगी है- मैं तुझे अपना भोजन बना कर रहूंगा.”

गाय ने बड़ी मिन्नतें कीं. आखिकार वह बाघ को विश्वास दिलाने में सफल हो गई. बाघ का मन बछड़े की बात पर पिघल गया- फिर भी उसने गुर्राते हुए कहा, “मैं तेरे लौटने की प्रतीक्षा करूंगा. वरना घर पर आकर तुझे और तेरे बछड़े को भी मार कर खा जाऊंगा.” गाय के कंठ में अटके प्राण वापस लौट आये उसे अपार खुशी हुई, उसने राहत की सांस ली.

परन्तु यह राहत उसे अधिक देर खुशी न दे सकी. ज्यों-ज्यों उसके पांव घर के नजदीक पहुंचे, उसे बाघ को दिया वचन याद आता रहा. बछड़े के करीब पहुंचने तक गाय उदास हो गयी.

घर पहुंचने पर उसने उदास मन से बछड़े को दूध पिलाया, उसे चूमा, प्यार किया. एकाएक बाघ को दिया वचन याद आते ही उसके आंसू छलछला आए. बछड़े को आश्चर्य हुआ. उसने गाय से पूछा.गाय ने बछड़े को सारी बात जस की तस बता दी. बछड़ा धैर्य से सारी बात सुनता रहा और फिर सहजता से बोला, “इजा इसमें रोने की क्या बात है. तुम मुझे भी बाघ मामा के पास ले चलो. मै उन्हें मना लूंगा.”

“नहीं-नहीं बेटा वह जंगली जानवर है, उनके मन में दया भाव कुछ नहीं होता. वे सिर्फ अपने स्वार्थ तक सीमित होते हैं.”

“नहीं इजा. एक बार मुझे भी ले चलो.” बछड़े ने जिद की.

बछड़े की जिद के आगे गाय असहाय हो गयी, वह बोली, “यदि तू ऐसा चाहता है तो चल.”

आगे-आगे गाय और उसका पीछा करता बछड़ा जंगल को चल पड़ा. साथ-साथ चलने के दौरान जीवन-मरण की बातें हुईं. कदम जो थोड़ी देर पहले तक पूरी ताकत से बढ़ रहे थे, वे भी अपना बोझ ढोने में असमर्थ होने लगे. बड़ी मुश्किल से वे दोनों बाघ के पास पहुंचे और उसके सामने खड़े हो गये.

बाघ खुश हुआ. गाय को अपने प्राणों से ज्यादा बछड़े के मारे जाने का भय सताने लगा. उसकी ममता पूरी तरह से पगला सी गयी. वह बोली, “मैं अपनी कौल पर आयी हूं. बाघ दा अब मुझे खा लो. पेट भर कर खा लो. फिर बछड़े को खाना. ये देखो मैं अकेली नहीं आयी हूं- बछड़ा भी साथ लायी हूं.”

बछड़ा बहुत छोटा था. परन्तु बहुत होशियार था, उसने कहा, “बाघ मामा प्रणाम. ये मेरी इजा है. तुम पहले इसे नहीं मुझे खाओ.” बछड़े को रोकती हुई गाय बोली, “नहीं, पहले मुझे.”

“नहीं, नहीं” कहते बछड़ा बाघ के सामने चला गया.

“नहीं, नहीं मैं तुझे पहले नहीं खाऊंगा, तेरी इजा को भी नहीं. तुम दोनों ने मिलकर मुझे हरा दिया, एक तू है जो अपनी इजा के लिए प्राण देने पर तुला है और एक तेरी इजा है- जो अपने सत्य वचन पर यहां तक चली आयी. मैं तो यह देख रहा था कि तेरी इजा लौटेगी भी या नहीं. मुझे उसे खाना होता तो उसी समय वापिस क्यों जाने देता?”

बाघ ने बछड़े को बहुत प्यार किया और उन्हें उनके घर की सरहद तक छोड़ने आया. किसी ने सच ही कहा है, “सच्चे प्राणी को किसी का भय नहीं होता.”

बकरा और बकरी की होश‍ियारी

एक बकरा और बकरी साथ-साथ रहते थे. दोनों के बीच गहरा प्रेम था. एक बार बकरी ने दो पाठों को जन्म दिया. बकरा बहुत खुश हुआ कि अब उसका परिवार बढ़ रहा है. लेकिन कुछ दिन के बाद उसकी खुशी को ग्रहण लग गया. जंगल की ओर से एक सियार दबे पांव आया और उसके दोनों पाठों को ले गया.

बकरी फूट-फूट कर रो पड़ी. बकरे ने उसे समझाया और दिलासा दिया कि हमारे और पाठों का सिर्फ इतने दिनों का ही साथ लिखा होगा. ज्यों-ज्यों दिन बढ़ते गये, बकरी उन पाठों को भूलती गयी. कुछ महीने के बाद उसने फिर से गर्भ धारण किया और दो पाठों को जन्म दिया. संयोगवश इस बार भी सियार आया और दोनों पाठों को उठाकर ले गया.

बकरी बहुत परेशान हो गयी. वह बकरे पर बरस पड़ी. मेरे इस बार भी पाठे मारे गए. तुम्हें पता भी नहीं चला. मैं कहे देती हूं कुछ उपाय करो. बकरे ने बकरी की पीड़ा को महसूस किया और वचन दिया कि भविष्य में जब भी उसके पाठे पैदा होंगे, तो वह उनकी जरूर देख-रेख करेगा. इन शब्दों को बकरी ने गांठ से बांध लिया.

तीसरी बार भी बकरी के दो पाठे हुए. बकरी ने बकरे को उसे वचन की याद दिलायी.

“इस बार कोई न कोई उपाय करो. मैं तुम्हारे साथ घास चरने नहीं जाऊंगी. तुम भी इनकी देखरेख के लिए यहीं रहो.”

बकरे के पांव तले जमीन खिसक गयी. वह बोला, “यह तो कोई उपाय नहीं है. जंगल घास चरने नहीं जाएंगे तो खाएंगे क्या. बिना खाये-पिये हम कब तक रहेंगे.”

“तो मैं अकेली इनकी देखभाल करुंगी. आखिर मां का दिल है मेरा.”
“यह तो मैं भी समझता हूं. ऐसा कोई उपाय भी तो नहीं है कि सियार के आने का पता पहले लग जाए और हम सावधान हो जाएं. वह कभी भी कहीं से भी आ सकता है. तू अकेली कर भी क्या सकती है.”

बकरे ने यह बात कह तो दी, परन्तु उसे भी चिन्ता खाने लगी. वह गहरी सोच में डूब गया. किसी और की बात होती तो अनसुनी कर देता, परन्तु यह तो उसी की बकरी की परेशानी थी. उसने अपना दिमाग दौड़ाया और फिर गहरे सोच-विचार के बाद कहा, “एक बात कहूं बकरी, यदि हम ज्यादा सोच विचार करते रहे तो कोई हल नहीं निकलेगा. अब ऐसा करते हैं मै पास के जंगल में चला जाता हूं और वहां से सियार पर नजर रखता हूं. ज्यों ही वह आएगा मैं तुझे आवाज दे दूंगा कि ये बच्चे क्यों रो रहे हैं इन्हें चुप क्यों नहीं कराती? मेरे शब्दों को सुनते ही तू इन पाठों को चिकोटी काट देना, जिससे ये जोर-जोर से रोने लग जाएं. तू कहना शुरू कर देना कि ये बच्चे सियार का कलेजा खाने को मांग रहे हैं. मैं कहां से लाकर दूं. घर में बासी-कुबासी कलेजा होता तो उसे दे देती. इस समय सियार आए तो उसे मार कर कलेजा निकाल भी लूं तो कहां से?”

मैं कहूंगा, “अरी चिल्लाना बंद कर, बच्चों को भी चुप करवा ले. हो हल्ला सुनकर सियार भाग जाएगा. वो देख एक सियार घर की ओर आ रहा है. मैं उसका कलेजा अभी निकाल कर बच्चों के लिए ला रहा हूं.”

बकरी को यह बात पसंद आ गयी. बकरा तेजी के साथ सामने के जंगल में चला गया. थोड़ी देर में सियार आया. बकरे की नजर उस पर पड़ गयी. उसने बकरी को अपनी योजना के अनुसार आवाज लगा दी- “ अरी बकरी, ये दोनों पाठे क्यों रो रहे हैं?” बकरी ने दोनों पाठों को चिकोटी काट दी, वे दोनों रो पड़े. उसके बाद बकरी ने वैसा ही कह दिया जैसा बकरे ने बकरी को सिखाया था.

सियार ने बकरे और बकरी की आवाज सुनी तो उसके पांव तले जमीन खिसक गयी. वह उल्टे पांव भाग खड़ा हुआ. उसे भागते देख जंगली जानवरों को आश्चर्य हुआ कि कोई भारी संकट आया होगा इसलिए सियार दुम दबाकर भाग रहा है. सियार पर लंगूर की भी नजर पड़ी तो उसने हिम्मत करे उसे रोका और पूछ- “ओ सियार भाई, आज तुम्हारी ये भागमभाग क्यों हो रही है. कहां के लिए भाग रहे हो?”

सियार ने अपने पांव जमीन पर टिकाए और अपने दिल का हाल लंगूर को कह सुनाया. लंगूर उसकी बात सुनकर खूब हंसा. उसने कहा, “सियार भाई तुम्हारी तो मति मारी गयी है. क्या बकरा भी कभी सियार को मार सकता है?”

“मैं अपने कानों से सुनकर आ रहा हूं. वह बकरा अपनी बकरी से कह रहा था कि मैं अभी सियार का कलेजा निकालकर पाठों के लिए लेकर आ रहा हूं. उसने मुझे देख भी लिया था.”

लंगूर को सियार की बात पर आश्चर्य हुआ. उसने कहा, “चलो, मैं तुम्हारे साथ चलूंगा. देखता हूं कैसा बकरा है वह.”

“लंगूर भाई. मैं अवश्य तुम्हें ले चलूंगा तुम्हें वहां, मगर एक शर्त है?”

“वह क्या?” “तुम अपनी पूंछ से मेरी पूंछ बांध लो और मुझे अपनी पीठ पर बिठा लो तभी.”

लंगूर ने सियार की अपनी पूंछ से पूंछ बांध ली और उसे पीठ पर बैठाकर ले गया. दोनों बकरी के पास पहुंचे ही थे कि बकरे की नजर उन पर पड़ गयी. वह जोर-जोर से बोला “अरे बकरी इन पाठों को चुप करा दे. देख मेरा दोस्त लंगूर सियार को अपनी पूंछ से बांध कर ला रहा है. धैर्य रख मैं उस सियार का कलेजा निकाल कर जल्दी ले आउंगा.”

इतना सुनकर सियार की सिट्टी-पिट्टी गोल. उसकी सांस अटक गयी. उसने कान लगाकर सुना तो बकरा कह रहा था. “अरे ओ लंगूर तो बड़ा बेशऊर है. तुझे जरा भी शर्म नहीं. तू तो चार सियार लाने की बात कह कर गया था और तू एक ही उठाकर ला रहा है. इससे बकरी और उसके पाठों का पेट भला कैसे भरेगा.”

बकरे ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि थी कि सियार ने लंगूर की पीठ से छलांग लगायी और भाग गया. उसके पीछे- पीछे लंगूर भी, जान बची तो लाखों पाए. दौड़ते-दौड़ते जब दोनों एक दूर पहाड़ी पर पहुंचे तो उन्हें आगे का रास्ता नहीं सूझा. आगे गहरी खाई थी. रास्ते की तलाश में दोनों ने खाई में छलांग लगा दी. वे दोनों मर गए. उधर बकरी निर्भय और निश्चिंत होकर अपने पाठों को पालने लगी.

 

वो पक्षी जो आज भी रटता है ”तुम कौन-कौन हो”

किसी गांव में एक भाई और एक बहन रहते थे. भाई-बहन का प्यार जगजाहिर था. वे दोनों साथ रहते, साथ खाते-पीते और साथ ही खेलते थे. दिन बीतते गए. दोनों बच्चे जो छोटे थे. वे समझदार और बड़े हो गये. फिर एक दिन वह घड़ी भी आ गयी जब बहन विवाह कर ससुराल चली गयी.

भाई अकेला रह गया. वह उदास रहने लगा. उसके जीवन की जैसे सारी खुशी चली गयी. उसे देखकर उसकी ईजा ने कहा, “बेटा, तू इस तरह उदास क्यों रहने लगा है. तेरी दीदी उत्तरायण पर आएगी, पंचमी, फूलदेई, होला और तीज त्योहार पर आएगी. उस समय देखना तेरी दीदी कितनी सुंदर लगेगी. उसकी नाक पर नथ, पांव पर झांवर, कानों पर कर्णफूल और गले में चरेऊ (मंगलसूत्र) पहने वह बहुत सुंदर लगेगी, तू उसे देखता रह जाएगा.”

त्योहार आएंगे उसकी बहन उससे मिलने आएगी, इसी आशा में भाई बैठा रहा. दिन नजदीक आते गये. भाई के मन में बहन से मिलने का उत्साह नये सिरे से जाग उठा. गांव में दूसरी बहूं-बेटियों का आना-जाना शुरू हो गया. गांव में चहल पहल शुरू हो गयी, गीत-भगनौल और झोड़े शुरू हो गए. गीत-संगीत बजने लगा. किस्से कहानी का दौर चल पड़ा. अपनी ससुराल की बातें शुरू होतीं जो खत्म होने को ही नहीं आतीं. अच्छी-बुरी बातों का अनुभव बंटने लगा.

परन्तु उसकी बहन नहीं आयी. वह उदास हो गया. आज आयेगी या फिर कल इसी उम्मीद पर त्यौहार आया और अपनी खुशियां बिखेर गया. परन्तु उसके घर में उदासी छाई रही. बहना की राह देखते-देखते उसकी आंखें लाल हो गयीं. रोते-रोते उसका कंठ सूख गया. बहन की याद में जैसे वह नीम बेहोशी में चला गया.

गांव-घर में हाहाकार मच गया. क्यों नहीं आयी वह. उसे आना चाहिए था. उसके न आने के कई कयास लगाए जाने लगे. अब उसके बेहोश होने की खबर गांव में फैल गयी तो गांव की बहू-बेटियां उसे मिलने आयीं.

बड़ी कोशिश के बाद उसमें चेतना लौटी, तो उसने देखा गांव की बहू-बेटियों ने उसे घेर लिया है, वे सभी चारों तरफ खड़ी उसे निहार रही हैं. उसने उन सभी के बीच जेवरों से लदी सजी-संवरी अपनी बहन को ढूंढा तो उसे नहीं दिखी।

वह चीख पड़ा- “तुम कौन-कौन हो?”

इस अप्रत्याशित प्रश्न को छोड़कर वह फिर से नीम बेहोशी में चला गया.

इस कथा में भाई-बहन का अमिट प्रेम प्रदर्शित है. आज भी ‘तुम कौन-कौन हो’ की रट लगाता पक्षी इस अमर कथा की याद दिलाता है.

दो भड़ों की कथा

किसी समय कुमाऊं में दो भड़ थे. एक भड़ काली कुमाऊं में और दूसरा पाली पछाऊं में रहता था. दोनों एक दूसरे के विषय में नहीं जानते थे. इसलिए उन्हें विश्वास था कि दुनिया में उनसे बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं है. अतः दोनों की हुंकार कुमाऊं के दोनों छोरों को हिला देती थी, जिसका उन्हें घमण्ड हो चुका था.

लोग उनसे बहुत परेशान रहते थे-सभी उस दिन का इन्तजार कर रहे थे जिस दिन सेर को सवा सेर मिल जाएगा. उनकी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में कोशिश रहती थी कि उनको टक्कर देने वाला मिले. स्वयं वे भी चाहते थे कि किसी बलशाली से उनका सामना हो.

दोनों अपने-अपने मुकाबले का भड़ ढूढ़ने निकल पड़े. अंततः उन्हें एक दूसरे का पता लग ही गया.

दोनों भड़ एक मैदान पर मिले. दोनों में भिड़ंत हुई. एक-दूसरे को पछाड़ देने के उद्देश्य से वे कई रात-दिन लड़ते रहे. दोनों बराबर के मुकाबले के थे इसलिए हार-जीत का फैसला होकर ही दम भरना था. जब कोई निर्णय होने की संभावनाएं नहीं बचीं तो उन्हें शांत करने का साहस भी देखने वालों में नहीं था.

अचानक तेज आंधी तूफान आने लगा. वे दोनों बेफिक्र अपने दांव-पेंचों को आजमाने में डटे रहे. तूफान आने का संदेह बढ़ गया था. परन्तु वे दोनों अपने अहंकार में आकंठ डूबे लड़ते रहे.

तूफान आ ही गया. बड़े-बड़े वृक्ष धराशायी होने लगे. मकान ढह गये. सब कुछ जो तूफान की चपेट में आया वह मीलों-मील उस भंवर के साथ चला गया. वे दोनों तूफान के आगे हार मानने वाले नहीं थे. दोनों उड़े और कहीं दूर किसी गांव में एक बुढ़िया जो ओखल कूट रही थी उसकी आंख में गिर गए.

बुढ़िया ने मूसल नीचे रखा और उन्हें आंख में फंसी घुन समझ कर बाहर निकाल फेंका. दोनों भड़ जब धड़ाम से नीचे गिरे तो उन्हें लगा जैसे उन्हें किसी पहाड़ से नीचे फेंक दिया गया हो. आश्चर्य से उन्होंने एक दूसरे को देखा. सामने बुढ़िया खड़ी थी.

उनके हाथ जुड़ गये, बोले- “हमें भ्रम हो चला था कि हमसे बड़ा शक्तिशाली दुनिया में कोई नहीं हो सकता. आपने उस भ्रम को तोड़ दिया. आपसे शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है-हम दोनों भी नहीं. आपने अपने आंख के कष्ट को भूलकर हमें जीवित छोड़ दिया. हमें क्षमा करें, आपसे बड़ा शक्तिशाली कोई नहीं हो सकता. ”

यह एक सामान्य कथा है. किंतु इससे जन जीवन में अद्भुत घटनाओं के प्रति विश्वास की झलक मिलती है. साथ ही यह कथा हमें शिक्षा देती है कि अपने किसी गुण को सर्वश्रेष्ठ समझने का घमंड कभी नहीं करना चाहिए.

कल बिष्ट: कुमाऊं के देवता

कुमाऊं का एक दर्शनीय स्थल है विनसर. वहां के जंगल में कलू कोटड़ी रहता था. यह नाम उसके दैनिक कार्यकलापों से लोक प्रचलित था. उसका असल नाम कल बिष्ट था.

कल बिष्ट एक सामान्य आदमी नहीं था. वह बड़ा वीर और साहसी था. अपने ममेरे भाइयों के साथ वह दूर जंगल में चला जाता. वहां हरी-हरी घास मवेशियों को चराकर लौटता था. जंगल में भयानक जंगली पशु उसे मिलते थे, परन्तु उनसे भयभीत नहीं होता था. घने वृक्षों की ओट से उसे बातें करना उसे अच्छा लगता था. वह घंटों जंगली जानवरों को निहारता रहता था. उसकी आंखों में एक तरह की चुनौती होती थी. उसके ममेरे भाई उससे काफी दुखी हो जाते. वे कल बिष्ट से मवेशियों को घर के लिए लौटा लाने को कहते तो वह कहता, “अभी लकड़ियां भी काटकर ले जानी हैं.”

कल बिष्ट पेड़ों की शाखाओं पर टूट पड़ता या फिर विशालकाय वृक्षों को धराशायी करने लगता. ममेरे भाई उसे जितना रोकते उतना ही वह अपनी जिद पर उतर आता. शाम होते ही उसके ममेरे भाई जंगली जानवरों के डर से परेशान होने लगते. लेकिन उस भयानक जंगल में उसे अकेले भी नहीं छोड़ा जा सकता था. आखिर उनकी भी सहनशीलता एक दिन डगमगा गई.

बहुत समझाने पर भी जब कलू कोटड़ी नहीं माना तो ममेरे भाइयों ने उससे मुक्ति पाने की सोची. एक दिन वह अकेला था. ममेरे भाई अधिक संख्या में थे. वे सब कलू कोटड़ी पर टूट पड़े. बड़ी मुश्किल से कलू कोटड़ी उनकी गिरफ्त में आया. उन्होंने उसका गला दबाकर हत्या कर दी और उसे एक गहरे गड्ढे में गाड़ दिया.

ममेरे भाई घर लौट आए.

कलू कोटड़ी जब घर नहीं लौटा तो उसकी मां को चिंता होने लगी. मां बेचैन. रात भर वह सो नहीं सकी. सुबह दिशा खुलने का समय हो रहा था. एकाएक उसे नींद आ गई. मां को स्वप्न में कलू कोटड़ी ने कहा, “मां मैं मर चुका हूं. तुम्हारे दूध ने मुझे यह हृष्ट-पुष्ट शरीर दिया है. एक बार मैं फिर से दूध पीना चाहता हूं ताकि मुझमें प्राण लौट सकें.”

मां ने जैसे ही स्वप्न में दूध पिलाया, वैसे ही वह जीवित हो उठा और पूरी ताकत से गड्ढे से बाहर निकल आया.

चारों ओर घुप्प अंधेरा. हिलती-डुलती कुछ आकृतियां उसे दिखीं. गोया निराशा में डूबी वे सभी आकृतियां उसी की प्रतीक्षा में हों. निर्भय वातावरण में घूमने फिरने का आदी कल बिष्ट उनके समीप पहुंचा. वहां उसकी दौ सौ चालीस बांखड़ी भैंसें, 340 नई ब्यायी भैंसें, झपुआ कुत्ता, चंदुआ भैंसा और लखिमा बिल्ली उसे देखकर बहुत खुश हुए. कोई अपना खुर जमीन पर मारकर खुशी प्रकट करने लगा तो झपुआ उसके पांवों पर लोट-पोट होने लगा. और लखिमा बिल्ली तो म्याऊं-म्याऊं करती मानो उससे पूछ रही हो, “कहां गये, इस बीहड़ जंगल में हम सभी को छोड़कर.”

कल बिष्ट से उनकी खुशी देखी न गयी. उसे अहसास हुआ कि सचमुच उसके मवेशी चौपाये होते हुए भी दोपाये इंसान से अधिक संवेदनशील और प्यार करने के योग्य हैं. उसने उन्हें एक-एक कर प्यार किया, फिर सबुह दिशा खुलने से पहले घर लौट आया.

पूरे इलाके में खलबली मच गई. जिस कल बिष्ट को मार कर गाड़ आए थे, वह जीवित लौट आया था. उसके ममेरे भाई छिपते फिर रहे थे. किसी को विश्वास नहीं आ रहा था कि मृत्यु को प्राप्त हुआ व्यक्ति जीवित हो सकता है.

उधर कल बिष्ट अपना क्रोध नहीं रोक पा रहा था. घर के आंगन में पहुंचते ही उसने सभी ममेरे भाइयों को ललकारा तो गांव में एक नयी अनिष्ट की घड़ी का अनुमान सच में बदलने लगा. अन्याय के प्रति प्राणों की बाजी लगाने को उतावला कल बिष्ट के क्रोध से कोई भी अपरिचित नहीं था.

कल बिष्ट के कार्यों से गुरु गोरखनाथ भी अपरिचित नहीं थे. जब कल बिष्ट के जीवित लौट आने की खबर उन्हें पता चली तो वे भी चले आए. कल बिष्ट घर पर नहीं था. उसकी आंखों में खून पहली बार चढ़ा हो ऐसा नहीं था. इससे पहले भी वह कई बार अन्याय के विरुद्ध हथियार उठा चुका था.

गोरखनाथ को घर पर आया देख कल बिष्ट की मां की सांस अटक गई. उसने कहा, “मेरा बेटा जोगियों से चिड़ता है. जो भी जोगी उसके सामने आए वह जीवित नहीं छोड़ता. आप भिक्षा लेकर शीघ्र चले जाइये अन्यथा आप भी मार दिए जाओगे.”

“जहां तक वह इतने जोगियों को मार चुका है, वहां अगर आज मेरी भी मृत्यु लिखी होगी तो उसे कोई रोक नहीं सकता,” गोरखनाथ ने कहा और आंगन की दीवार पर बैठ गये और कल बिष्ट की प्रतीक्षा करने लगे.

सांझ झूलने लगी. कल बिष्ट के लौटने का समय हो रहा था. कल बिष्ट के हाथों एक और वध से घबरायी मां के प्राण जैसे किसी घूंटी पर आकर टिक गये थे. उसे लग रहा था कि उधर जोगी की गर्दन धड़ से अलग हुई और उसके भी प्राण फुर्र से उड़े. वह बार-बार गोरखनाथ की तरफ देखती तो उनके चेहरे पर शान्त एवं अविचलित भाव देखकर सांस रोककर रह जाती. उसने कई बार कहा- “जोगी तुम यहां से अभी भी चले जाओ, मेरा बेटा तुम्हें मार डालेगा.”

परन्तु गोरखनाथ उसके शब्दों को, उस मां के चेहरे को देखते रहे जो अपने पुत्र को क्रूर, निर्दयी जैसी उपमाएं दे चुकी थी. कल बिष्ट जंगल से लौट आया.

गोरखनाथ को आंगन में बैठा देखकर कल बिष्ट क्रोध से उबलने लगा. आंखों में खून चढ़ते समय नहीं लगा. उसने अपना कुल्हाड़ा उठाया और तेजी से गोरखनाथ की तरफ बढ़ा. मवेशियों ने अपने कदम गोशाला की तरफ बढ़ाए और एक-एक कर अपनी खूंटी पर खड़े हो गए. आंगन में पहुंचकर कल बिष्ट ने शेर की भांति दहाड़ा- “ऐ जोगी! इस दीवार पर बैठा तू अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है.”

कल बिष्ट के क्रोध को देखकर गोरखनाथ जरा भी विचलित नहीं हुए बल्कि मुस्कुराने लगे. उन्होंने चुटकी भर भभूति निकाली और कल बिष्ट की तरफ फूंक दिया.

“तुम इस गांव-घर में पहली बार आए हो, ऐसा प्रतीत होता है. थोड़ा और प्रतीक्षा करो. मै मवेशियों को उनकी खूंटी पर बांध आता हूं.”

और कल बिष्ट दनदनाते गौशाला की तरफ चला गया. उसका पीछा करते गोरखनाथ भी गौशाला पहुंचकर सामने बैठ गए. लेकिन आज मवेशियों को बांधते-बांधते कल बिष्ट को समय लग रहा था. वह जिस फुर्ती से हाथ चला रहा था उस फुर्ती से मवेशी उससे बंध नहीं पा रहे थे और रोज की भांति कोई पशु अपनी प्रवृति के अनुरूप दाएं-बाएं मुंह भी नहीं मार रहा था.

ऐसा क्या हुआ कि सभी शांत चित्त खड़े अपनी खूंटी पर बंधने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल बिष्ट का आश्चर्य बढ़ता गया. उसे लगा यह जोगी साधारण नहीं हो सकता. यह या तो कोई जादू टोना करने वाला है या फिर कोई पहुंचा हुआ सिद्ध है. वह सोचता रहा. उसका क्रोध जो सातवें आसमान को छू रहा था, वह धीरे-धीरे शांत होता चला गया. जब तक सभी मवेशी खूंटी से बांधता तब तक कल बिष्ट मानसिक और शारीरिक रूप से बुरी तरह थक चुका था.

उसकी हालत देख गोरखनाथ मुस्कुराये और बोले, “कल बिष्ट तुम बहुत थक चुके हो. मेरा भाग्य कि तुममे मेरा वध करने की सामर्थ्य नहीं बचा.” “हां, ठीक कह रहे हो. मैंने तुम्हें मारने का निश्चय किया था परन्तु-”

“क्या तुम अब मुझे नहीं मारोगे. ओह,” यकायक गोरखनाथ गंभीर हो गये. “तुम्हें अफसोस क्यों हुआ जोगी.”

“अफसोस इस बात का है-जिसे मृत्यु चाहिए उसे तुम नहीं दे सकते और जो मरना नहीं चाहते उन्हें तुम मृत्यु देते रहे हो-अब मेरी इच्छा जीवित रहने की नहीं है. तब तक के लिए जीवित रहना चाहता हूं जब तक मृत्यु की इच्छा को भूल नहीं जाऊं. ”

“ठीक है, मैंने अपना निश्चय बदल दिया है. अब तुम्हें जो कुछ मांगन��� है वह मुझसे ले लो.”

“जिन मवेशियों से तुम इतना प्यार करते हो उनका एक खप्पर दूध दही मुझे दे सको तो दे दो.”

“ इसमें कौन सी बड़ी बात है. चलो, वापस मां के पास तुम जितना चाहो ले लो.” कल बिष्ट वापस लौटा आया. पीछे-पीछे गोरखनाथ भी. दोनों के साथ आते देख कर मां की आंखें खुली की खुली रह गईं. सशरीर चलते जोगी और बेटे के शांत चित्त चेहरे को देखकर उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. उसने अनुमान लगाया सचमुच यह कोई साधारण जोगी नहीं है. कल बिष्ट का हृदय परिवर्तन करने वाला कोई सिद्ध है.

“तुम लौट आए जोगी, तुम सचमुच लौट आए हो.”

“हां, कल बिष्ट ने मुझे मारने से मना कर दिया है.”

“अच्छा! आश्चर्य”

“मुझे उन मवेशियों का दूध दही चाहिए. जीवित रहने तक उसी का सेवन करूंगा.” मां दही की हंडिया उठाकर ले आयी. यह कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिए. उसने एक ही बार में जोगी को खप्पर भर देने का प्रयास किया. परन्तु ऐसा नहीं हुआ, वह बारी-बारी से खप्पर लाती रही. खप्पर फिर भी अधूरा रहा.

कल बिष्ट को आश्चर्य हुआ. उसकी समझ में आने लगा कि यह सिद्ध पुरुष हैं. यकायक उसने घुटने टेक कर गोरखनाथ को प्रणाम किया. गोरखनाथ ने कल बिष्ट को गले से लगा लिया और अपना शिष्य बना लिया. वही कलूकोटी, कल बिष्ट और कलुआ बीर आदि नामों से कुमाऊं के लोगों में देव के रूप में पूजनीय है.

इस मंदिर में पूजा करने से डरते हैं लोग, इस एक वजह से खाते हैं खौफ

जब भी कभी हम मंदिर और मस्ज‍िद की बात करते हैं, तो दिमाग में आता है कि यहां मालिक के किसी रूप को पूजा जाता होगा. लेक‍िन एक ऐसा मंद‍िर भी है. वो भी श‍िव भगवान का. जहां लोग पूजा नहीं करते हैं. बल्क‍ि ऐसा माना जाता है कि जो भी यहां पूजा करता है, वह शापित हो जाता है. और यहां के लोगों के ऐसा सोचने के पीछे एक अहम वजह है.

यह मंदिर उत्तराखंड में स्थ‍ित कस्बा थल से 70 किलोमीटर दूर बल्त‍िर गांव में है. यहीं स्थाप‍ित है यह मंदिर. यहां भक्त आते हैं. दूर से दर्शन करते हैं. लेक‍िन पूजा कोई नहीं करता.

इस मंदिर को ‘देवाला’ के नाम से जाना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जो भी यहां पूजा करता है, उसके साथ कुछ अन‍िष्ठ हो जाता है अथवा वह शाप‍ित हो जाता है. इसकी वजह मंदिर के निर्माण से जुड़ी हुई है.

लोक कथाओं के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण कार्य प्राचीन काल में कत्यूरी राजवंश के दौरान किया गया था. हालांकि इस मंदिर के निर्माण से जुड़ी कई लोक कथाएं हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर को एक बेहद कुशल कारीगर ने अपने एक हाथ से ही बनाया था.

एक हादसे में उसका एक हाथ कट गया. अमर उजाला में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक यह कारीगर जब भी वह अपने एक हा‍थ से मूर्तियां बनाता, तो लोग उसका मजाक बनाते. लोगों के उपहास से वह इतना क्रोध‍ित हुआ कि उसने एक फैसला लिया. उसने खुद से वादा किया कि वह अब सिर्फ मूर्तियां नहीं, बल्क‍ि पूरे मंदिर का निर्माण अकेले ही और अपने एक हाथ से ही करेगा.

एक दिन वह अपने सभी औजार लेकर दक्ष‍िण की ओर निकल पड़ा. वह लोगों के उपहास से इतना क्रोध‍ित था कि उसने एक रात में ही पूरा मंदिर तैयार कर लिया. इस दौरान उसने चट्टान काट कर न सिर्फ मंदिर तैयार किया, बल्क‍ि श‍िवलिंग भी बनाया. यह मंद‍िर एक हाथ से बना है. इस वजह से इसे एक हाथिया देवाला भी कहा जाता है.

मंदिर का निर्माण कर वह कभी वापस नहीं आया. लेकिन जब सुबह गांव वालों ने यह मंदिर देखा तो सब इकट्ठा हो गए. कुछ कहानियों के मुताबिक श‍िवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई थी. तो कुछ में ऐसा वर्णन है कि इसका अर्ग सही नहीं था. इसलिए तब के विद्वानों ने यहां पूजा करने से अन‍िष्ठ होने की आशंका जताई थी. तब से ही इस मंदिर में कोई पूजा नहीं करता.

क्योंकि यह मंदिर क्रोध और उपहास के जवाब में बनाया गया था. दूसरी तरफ, इसमें स्थापित शिवलिंग में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करवाई गई है. ऐसे में लोग इसे शापित मंदिर मानते हैं. यहां पूजा करने से हर कोई डरता है. सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर को लेकर आज भी लोगों के बीच यह मान्यता बनी हुई है.