वो गीत, जिसे गाने के लिए नेगी दा ने छोड़ दी सरकारी नौकरी


गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी। जिसके गीत आम पहाड़ी की भाषा में बात करते हैं। उनके गीतों में हर पीढ़ी से मुलाक़ात होती है। उनके गीतों को तो हर किसी ने सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि नेगी दा ने एक गीत को गाने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी? और तब जो उन्होंने वो गीत गाया तो एक बहुत बड़ा भूचाल आया।

सूचना विभाग से जुड़े थे नेगी दा
नरेंद्र सिंह नेगी गायन के साथ सरकारी नौकरी भी किया करते थे। वह सूचना विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने कई सालों तक उत्तरकाशी में सेवा दी। 2005 में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी। अभी सिर्फ़ 6 साल और थे उनकी सर्विस ख़त्म होने में लेकिन फिर भी उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया। और वो भी सिर्फ़ इसलिए ताकि वो अपना एक नया-नवेला गीत गा सकें। 

वो गीत था- नौछमी नारैणा। नेगी दा ने ये गीत तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को लेकर लिखा था। इस गीत ने पूरे उत्तराखंड में भूचाल ला दिया था। और ऐसा असर हुआ कि आख़िर में तिवारी जी की कुर्सी ही चली गई। 

अब आप सोचेंगे कि क्या नेगी दा इस गीत को सरकारी नौकरी में रहते ही नहीं गा सकते थे? क्या वो सरकार से डर गए थे? तो उनके सरकारी नौकरी छोड़ने वाले सवाल का जवाब ख़ुद नेगी दा से लीजिए। 

छिबड़ाट को दिए अपने ख़ास इंटरव्यू में उन्होंने ही इस बारे में बताया। नेगी दा ने बताया कि वो इस गीत को गाना चाहते थे। लेकिन सर्विस कंडक्ट रूलिंग की वजह उन्हें दिक़्क़त हो सकती थी।

उनके मुताबिक़ अगर वो सर्विस के दौरान इस गीत को गाते तो उन्हें नियमों के मुताबिक़ जेल में भी डाला जा सकता था। इसीलिए उन्होंने पहले सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दिया। उसके बाद ही नौछमी नारैणा गीत गाया।

बता दें कि नौछमी नारैणा गीत काफ़ी फ़ेमस हुआ था। इस गीत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी। वो जहां भी जाते, यह गीत सुनाई देता था। इस गीत को सेंसर कराने की कोशिश भी की गई।

इसके विरोध में कलाकार सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया। और आख़िर में सरकार बनाम कलाकार में कला की जीत हुई। 

फ्वां बागा रे… गीत के बारे में कितना जानते हैं आप?

फ्वां बागा रे… उत्तराखंड का ये लोकगीत आज न सिर्फ उत्तराखंडियों के लबों पर चढ़ा है, बल्कि देश के दूसरे हिस्से के लोग भी इस गीत को काफी पसंद कर रहे हैं। टिकटॉक पर फ्वां बागा रे बाकायदा ट्रेंड कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी आपको सैकड़ों मैसेज इस गीत को लेकर आ रहे होंगे। इस गीत को आपने सुन तो लिया है, लेकिन क्या आप इस गीत के बारे में जानते हैं?… कैसे ये गीत बना? किसने बनाया? और सबसे पहले किसने इस गीत को गाया? आज इन सभी सवालों का जवाब हम आपको देने वाले हैं।

सबसे पहले किसने गाया?
फ्वां बागा रे गीत को सबसे पहले लोकगायक स्वर्गीय चंद्र सिंह राही जी ने गाया। इस गीत को खोजने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इस गीत को खोजने के पीछे एक रोचक वाकिया है, जो एक मंच से खुद राही जी ने बताया था। खैर उससे पहले हम आपको बता दें कि राही जी उत्तराखंड के पहले ऐसे लोकगायक कहे जा सकते हैं, जिन्होंने काफी प्रयोग किए। राही जी ने उत्तराखंडी गीतों के साथ हिंदी मिक्स कर ‘ढांगा रे ढांगा’ गीत गाया। अंग्रेजों की खातिर ‘तु किलै नी आयी’ गीत पेश किया। इस गीत में उन्होंने गढ़वाली के साथ अंग्रेजी का भी इस्तेमाल किया।… और हां. मत भूलिए कि पहाड़ के सबसे फेमस गीतों में से एक- चैत्वली भी इनकी देन है।

अब किसने गाया?
फ्वां बागा रे गीत को कुछ साल पहले स्वर्गीय पप्पू कार्की ने गाया था। जिसे नीलम कैसेट्स ने कुछ वक्त पहले ही यूट्यूब पर रिलीज किया। गाना रिलीज होने के बाद 10 लाख का आंकड़ा पार कर चुका है।

कैसे तैयार हुआ ये गीत?
इस गीत के तैयार होने की कहानी काफी रोचक है। एक कार्यक्रम में खुद में चंद्रसिंह राही जी ने बताया था। उन्होंने बताया कि कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर एक भिक्षुक बैठा रहता था। वह गीत गाकर लोगों से पैसे मांगता था। लेकिन उनके गीतों की खासियत ये थी कि ये गीत उत्तराखंड के हाल बताया करते थे। राही जी बताते हैं कि सन 1985 में उनका कोटद्वार जाना हुआ। वहां उन्होंने भिक्षु, जिनका नाम-ज्वकि था। से पूछा कि आजकल क्या हाल हैं? ज्वकि ने कहा कि आज कल मनस्वाग लगा है यानि उत्तराखंड में बाग लगा हऐ। उस समय दुगड्डा, लैंसिडोन में बाग लगा हुआ था।

ज्वकि वहीं पर कुछ लाइनें गीत की इस संबंध में बना लीं। बाद में इन्हीं लाइनों को सुरबद्ध कर राही जी ने सबसे पहले एक कार्यक्रम में गाया।… और ऐसे ये आज एक अमर कृति बन गई। इस गीत और कोटद्वार का कनेक्शन आप इसी से समझ सकते हैं कि एक नाटक में कोटद्वार का सीन दिखाने के लिए सिर्फ इस गीत का इस्तेमाल किया गया।

कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर एक सूरदास जी भिक्षा मांगते थे और गीत लगाते थे।- ज्वकि। ८४ में मुलाकात हुई। बाघ लग्यूं च। वो गीत लगाते थे उस बाग के।

वीडियो देखें

नइमा खान उप्रेती: पूरी जिंदगी उत्तराखंडी लोक संगीत पर न्यौछावर की

उत्तराखंडी लोकसंगीत और लोकनाट्य को पहाड़ के घाटे-बाटों से निकालकर विश्व पटल पर पहुंचाचाने में अहम भूमिका निभाई है। आज जब आप बेडु पाको बारोमासा और लाली हौेंसिया जैसे गीत गुनगुनाते हैं, तो इन गीतों को भी आप तक पहुंचाने में इनकी अहम भूमिका रही है। इनका नाम है नइमा खान उप्रेती। जी हां… नईमा खान उप्रेती। 

कौन हैं नइमा खान उप्रेती
अल्मोड़ा के कारखाना बाजार में एक समृद्ध मुस्लिम परिवार रहता था। इसी परिवार में सन 1938 में नइमा खान का जन्म हुआ। नइमा का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब उत्तराखंड का लोकसंगीत सिर्फ लोगों के बीच था। इसका अभी तक आधिकारिक मंचन और आधिकारिक रिकॉर्ड कहीं भी नहीं हुआ था।

नइमा खान को बचपन से ही गायन का शौक था। वह हिंदी फिल्मों के गीत गुनगनाया करती थीं।… बाद में नइमा खान के गायन का यही शौक स्कूल और कॉलेज में भी जारी रहा।… गायन के इसी शौक के जरिये उनकी मुलाकात भारतीय थियेटर म्यूजिक के प्रणेता मोहन उप्रेती से हुई।

मोहन उप्रेती के साथ आने के बाद नइमा ने उत्तराखंडी नाटकों के मंचन में भी भाग लिया। और इसी दौरान दोनों में प्रेम उपजा और दोनों ने शादी कर ली। 2018 में नइमा ने आखिरी सांस ली… लेकिन वह आखिरी सांस तक उत्तराखंडी लोकसंगीत को बढ़ावा देने में जुटी रहीं।

मोहन उप्रेती जी से पहली मुलाकात
नइमा खान की मोहन उप्रेती से मुलाकात काफी दिलचस्प रही। एक इंटरव्यू में नइमा ने खुद इसका जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि एक दिन उनके कॉलेज में मोहन उप्रेती जज बनकर आए थे। इस कार्यक्रम में नइमा ने भी गाना गाया। हमेशा पहले पायदान पर आने वाली नइमा को उप्रेती ने दूसरे पायदान पर चुना। नइमा इससे गुस्सा हो गईं और उन्होंने जज यानि उप्रेती की आलोचना करनी शुरू कर दी।

भले ही इनकी शुरुआत थोड़ी कड़वी रही, लेकिन आगे जाकर इन्होंने साथ मिलकर उत्तराखंडी नाटक किए। राजुला मालुशाही, रामी बौराणी, इंद्रसभा समेत कइ नाटकों को इन्होंने मंच पर प्रदर्शित किया था।… महिलाएं क्योंकि नाटक नहीं करती थीं। इसलिए नइमा सिर्फ बैकग्राउंड में गाती थीं। हालांकि बाद में उन्होंने नाटक में हिस्सा भी लिया। और अपने पति के साथ पर्वतीय नाट्य कला मंच की स्थापना भी की। दोनों के दिल में प्रेम के बीज तो पनपे लेकिन हिंदू ब्राह्मण परिवार से आने वाले उप्रेती जी के परिवार को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। हालांकि बच्चों की जिद के आगे दोनों परिवारों को झुकना पड़ा और नइमा खान नइमा खान उप्रेती बन गईं।

मोहन उप्रेती और नइमा ने साथ मिलकर उत्तराखंडी लोकसंगीत को पूरे देशभर में पहुंचाया। नइमा ने एक इंटरव्यू में बताया कि बेडु पाको गीत मोहन उप्रेती ने लिखा नहीं है। उन्होंने कहीं ये गीत सुना था। जब उन्होंने यह गीत सुना था… तो यह काफी धीमे सुर में था।

उन्होंने इस गीत को धुनबद्ध किया और देश-दुनिया तक पहुंचाया। इसके अलावा आज जो घस्येरी गीत आप सुनते हैं, वे भी इन्हीं की वजह से हैं। क्योंकि इस जोड़ी ने घस्येरी गीतों का जगह-जगह मंचन किया। 

रामी बौराण
रामी बौराण पहले सिर्फ एक गीत था। लेकिन इस जोड़ी ने ही इसे नाट्य रूप दिया। नइमा ने १९५३ में गायन की औपचारिक शुरुआत की। 1967 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की शिक्षा ली। 1973 में नइमा दूरदर्शन से जुड़ीं। देश में जो सबसे पहला कलर शो चला था, उसका हिस्सा भी नइमा रही हैं। 

महान इंसान का दर्जा हासिल किया
नइमा चाहती तो बॉलीवुड में एक्टिंग या गायन कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक उत्तराखंड लोकनाट्य को बढ़ाने का काम किया। पर्वतीय नाट्य कला मंच आज भी उत्तराखंडी नाटकों का आयोजन करता है। यूट्यूब पर भी आपको ये देखने को मिल जाते हैं।

अब वो बात जो उन्हें महान इंसान बनाती है। दरअसल अपनी मौत से पहले ही नइमा ने कह दिया था कि उनके मरने के बाद उनके शरीर को जलाया या दफनाया न जाए। बल्कि इस शरीर को अस्पताल में दान कर दिया जाए। और ऐसा ही हुआ।… उनके शरीर को दिल्ली एम्स में डोनेट कर दिया गया। 

अपने आखिरी समय में नइमा दिल्ली में किराये के कमरे में रह रही थीं। हमारी राज्य सरकार को तो भनक भी नहीं लगी कि नइमा खान नहीं रहीं।… और सरकार को ये भी चिंता नहीं है कि वो इन विभूतियों के गीतों को सहेजे। खैर, अंधी-बैरी सरकारों से उम्मीद भी क्या करना। 

पप्पू कार्की की वजह से इस स्कूल में कुछ ऐसा हुआ, जो हर स्कूल में होना चाहिए

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हुआ था। इस वीडियो में कुछ बच्चे कुमाऊंनी प्रार्थना गा रहे थे। ये प्रार्थना स्कूल में गाई जा रही थी। ये वीडियो सोशल मीडिया काफी वायरल हुआ था। लेकिन इस वीडियो को देखा तो सबने पर ये है कहां का है, ये किसी को नहीं पता। तो आगे पढ़ते रहिए और जानिए इसका पप्पू कार्की से क्या नाता है?

कहां का है ये वीडियो?

ये वीडियो जो सोशल मीडिया पर वायहर हुआ है। ये पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग के एक स्कूल का है। यहां पर बच्चे हर सुबह कुमाऊंनी भाषा में प्रार्थना गाते हैं। बच्चों की इस प्रार्थना को सुनने के लिए गांव के लोग भी स्कूल के आसपास जमा हो जाते हैं। और हो भी क्यों न। किसी स्कूल में पहाड़ी भाषा में प्रार्थना बोली जा रही है।… लेकिन इस स्कूल में हमेशा से कुमाऊंनी में प्रार्थना नहीं होती थी। इसकी शुरुआत दिवंगत लोकगायक पप्पू कार्की की वजह से हुई।  

पप्पू दा को श्रद्धांजलि है ये प्रार्थना

दरअसल पिछले साल जून महीने में पप्पू कार्की का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। पूरे देश में शोक की लहर पसर गई। सभी लोगों ने पप्पू दा को अपने-अपने तरीके से याद किया। लेकिन बेरीनाग के इस स्कूल ने पप्पू दा को श्रद्धांजलि देने के लिए एक अनोखी पहल की। स्कूल के बच्चों और शिक्षकों ने मिलकर तय किया कि वे पप्पू कार्की को कुमाऊंनी भाषा में प्रार्थना गाकर श्रद्धांजलि देंगे। तब से स्कूल की हर सुबह को पप्पू दा को श्रद्धांजलि स्वरूप ये प्रार्थना गाई जाती है। और पप्पू दा को याद किया जाता है। 

प्रार्थना भी पप्पू दा से जुड़ी है

जब आप इस प्रार्थना को सुनते हैं तो इसमें वीणा वादिनी सरस्वती मां का वंदन किया जा रहा है। ये प्रार्थना भी पप्पू दा से जुड़ी है। अगर आप ने गौर किया होगा  तो इस प्रार्थना को पप्पू दा के ‘सुन रे दगडिया’ गाने की पैरोडी पर बनाया गया है।

पप्पू दा को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रार्थना क्यों?

अब आप ये सोच सकते हैं कि दिवगंत पप्पू दा को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रार्थना ही क्यों चुनी गई। तो इसकी एक ही और बहुत अहम वजह है। दरअसल पप्पू कार्की को कुमाऊं मंडल के उन गायकों में सबसे आगे रखा जाता है, जिन्होंने कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए कदम उठाए… उन्होंने अपने गीतों के जरिये इस भाषा को देश और दुनिया तक पहुंचाया।… वह हमेशा अपनी भाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध रहे। यही वजह है कि इस स्कूल के छात्रों ने पप्पू दा को इस प्रार्थना के जरिये श्रद्धांजलि दी।…

पप्पू दा भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके गाने और उनके प्रयास आज भी उत्तराखंड का नाम ऊंचा करने में जुटे हुए हैं। जिस तरह बेरीनाग के इस स्कूल ने कुमाऊंनी में प्रार्थना गाई है।उसी तरह उत्तराखंड के हर स्कूल में पहाड़ी भाषा में प्रार्थना गाई जानी चाहिए… इससे आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा में बात करने के लिए प्रेरित होगी और लुप्त होती हमारी भाषाओं को बचाया जा सकेगा।   

वीडियो देखें

उत्तराखंडी संगीत को हमसे ज्यादा जानता है ये अंग्रेज

आप ने लोकगायक प्रीतम भरतवाण के साथ एक अंग्रेज की तस्वीर अक्सर देखी होगी. प्रीतम के नारंगा सारंगा एलबम के जागर में भी आपको ये अंग्रेज दिखा होगा. दमो बजाते हुए. इस अंग्रेज के एकाध ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जहां ये नेगी दा के गीत को गुनगना रहा है.

लेक‍िन क्या आप जानते हैं ये शख्स ढोल-दमो के बारे में हमसे ज्यादा जानता है. जी हां. और ये कोई आम अंग्रेज नहीं है. इसमें समूचा उत्तराखंड और यहां का पूरा पारंपरिक संगीत बसता है.

नाम है स्टीफन फियोल, लेकिन उत्तराखंड आकर ये फ्योंली दास बन गए. इनका जन्म वैसे तो 80 के दशक में हुआ है, लेक‍िन उत्तराखंड से इनका नाता 88 साल पहले ही जुड़ गया था. जब 1930 में इनके दादा जी यहां आए थे.

कौन हैं स्टीफन फियोल?
स्टीफन फ‍ियोल अमेरिका के एक जाने-माने प्रोफेसर हैं. वे सिनसिनैटी शहर के रहने वाले हैं. कुछ साल पहले तक वह यहीं स्थ‍ित सिनस‍िनैटी यूनिवर्सिटी में संगीत के प्रोफेसर थे. इन्होंने करीब 14 साल तक उत्तराखंड के पारंपर‍िक वाद्य यंत्र ढोल-दमो और यहां के पारंपर‍िक संगीत को सीखा, समझा और अपनाया.

995748_10151728355453866_1863848574_n

14 साल तक अध्ययन करने के बाद इन्होंने 2017 में ‘Recasting folk in the himalayas’ नाम की किताब ल‍िखी है. इस किताब में उन्होंने उत्तराखंड के पारंपर‍िक संगीत और ढोल-दमो का विस्तार से अध्ययन किया है. इस किताब को आप ऑनलाइन आसानी से खरीद सकते हैं.

उत्तराखंड में फियोल का सफर
फियोल साल 2003 में उत्तराखंड पहुंचे. वह यहां उत्तराखंडी संगीत को समझना और सीखना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने देवप्रयाग स्थित नक्षत्र वेधशाला शोध केंद्र में योगाचार्य भास्कर जोशी से ढोल सागर के इतिहास व बारीकियों को समझा. इसके साथ ही इस परंपरा के सिद्धहस्त लोकवादकों की जानकारी भी जमा की.

उन्होंने इस सिलसिले में देवप्रयाग ब्लॉक के पुजार गांव में लोकवादक सोहन लाल से ढोल-दमाऊं की ताल, वार्ता व जागरों को भी सीखा. इसके लिए वह उनके साथ यहीं रहे. उन्हें उत्तराखंड और यहां की संस्कृति इतनी पसंद आई कि वह यहां के ही होकर रह गए और अपना नाम भी फ्योंली दास रख दिया. उन्होंने न सिर्फ हिंदी सीखी, बल्क‍ि वह अच्छी गढ़वाली भी बोल लेते हैं.

28432749_1554155958036936_595203001740689408_n

अमेरिक‍ियों को भी सिखाया ढोल-दमो:
वो स्टीफन फियोल ही थे, जो लोकगायक प्रीतम भरतवाण को अमेरिका लेकर गए. 2012 में तकरीबन एक महीने तक प्रीतम भरतवाण ने छात्रों को ढोल-दमो बजाना सिखाया. इसके बाद स्टीफन और प्रीतम भरतवाण ने सिनसिनैटी यूनिवर्स‍िटी के छात्रों के साथ मिलकर यहां की कई यूनिवर्स‍िटीज में इस कला का प्रदर्शन भी किया. स्टीफन इस साल फरवरी में भी एक बार फिर प्रीतम को अमेरिका लेकर गए. यहां प्रीतम भरतवाण ने अपने जागरों का जादू बिखेरा.

स्टीफन फियोल ढोल-दमो पर एक किताब लिख चुके हैं, जो एक ढोल-दमों की विधा को सहेजने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है. अब वह एक और किताब ‘ Dialects of Dhol: Mapping Rhythm, Memory and History in the Central Himalayas’ लिख रहे हैं. इसमें वह ढोल-विधा पर और करीब से प्रकाश डालेंगे. और उनकी एक शॉर्ट फिल्म भी इस संबंध में जल्द आने वाली है.

287658507_780x439

स्टीफन ने न सिर्फ दासों से संगीत सीखा है, बल्क‍ि उनकी दयनीय स्थ‍िति सुधारने की खातिर भी उन्होंने काम किया है. इसके लिए उन्होंने प्रीतम भरताण और नरेंद्र सिंह नेगी के साथ मिलकर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए.

ढोल-दमो के बारे में क्या कहते हैं स्टीफन:
जागरों में देवताओं को बुलाने के लिए बजाई जाने वाली धुन्याल को स्टीफन ने बड़े ही रोचक तरीके से पेश किया है. उनके मुताबिक ढोल-दमो टेलीफोन की तरह हैं. औजी अथवा दास इनका इस्तेमाल देवताओं को बुलाने के लिए करते हैं. स्टीफन आगे कहते हैं, ”मैं ढोल दमों और यहां के संगीत के जरिये इस क्षेत्र को समझने की कोश‍िश कर रहा हूं.”

stefen123

 आज भी उत्तराखंड से जुड़े हैें स्टीफन
स्टीफन आज भी मन से उत्तराखंड में हैं और वह आज भी हमारे पारंपरिक ढोल-दमो वाद्य यंत्रों को बचाने और इनके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं. हम उत्तराखंड के लोग (अगर औजियों को छोड़ दिया जाए तो) उत्तराखंड संगीत और ढोल-दमो के बारे में ना के बराबर जानते हैं. लेक‍िन स्टीफन इस संगीत को न सिर्फ जानते हैं, बल्क‍ि वह इसे जीते हैं.

आज अगर देश और दुनिया में उत्तराखंडी संगीत व ढोल-दमो सुनाई देते हैं, तो उसका कुछ हद तक श्रेय स्टीफन फ‍ियोल को भी जाता है. हमें उम्मीद है कि हम भी स्टीफन से कुद सीखेंगे और भेद-भाव छोड़कर औजियों का सम्मान और सत्कार करेंगे.

उत्तराखंड का राज्य गीत…

उत्तराखंड देवभूमि-मातृभूमि
शत्-शत् वंदन अभ‍िनंदन
दर्शन, संस्कृति, धर्म, साधना
श्रम रंजित तेरा कण-कण.
अभ‍िनंदन अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि….

गंगा-यमुना तेरा आंचल
दिव्य हिमालय तेरा शीश
सब धर्मों की छाया तुझ पर
चार धाम देते आश‍िष
श्री बदरी, केदारनाथ हैं
श्री बदरी, केदारनाथ हैं
कलियर, हिमकुंड अति पावन.
अभ‍िनंदन अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि….

अमर शहीदों की धरती है
थाती वीर जवानों की
आंदोलनों की जननी है ये
कर्मभूमि बल‍िदानों की
फूले-फले तेरा यश वैभव
तुझ पर अर्प‍ित है तन-मन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

रंगीली घाटी शौखों की या
मंडुवा झुंगुरा भट अन्न-धन
रुम-झुम-रुम-झुम, झुमैलो-झुमैलो
ताल, खाल, बुग्याल, ग्लेश‍ियर
दून तराई भाबर बण
भांट‍ि-भांटि लगै गुजर है चाहे
भांट‍ि-भांटि लगै गुजर है चाहे
फिर ले उछास भरै छै मैन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

गौड़ी-भैंस्यूंन गुंजदा गुठयार
ऐपण सज्यां हर घर हर द्वार
काम-धाण की धुरी बेटी ब्वारी
कला प्राण छन श‍िल्पकार
बण पुंगड़ा सेरा पंदेरो मां
बण पुंगड़ा सेरा पंदेरो मां
बंटणा छन सुख-दुख संग-संग
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

कस्तूरी मृग, ब्रह्मकमल है
फ्यूंली, बुरांस, घुघती, मोनाल
रुम-झुम-रुम-झुम, झुमैलो-झुमैलो
ढोल नगाड़े, दमुवा हुड़का
रणसिंघा, मुरली सुर-ताल
जागर, हारुल, थड्या, झुमैलो
ज्वाड़-छपेली पांडव नर्तन.
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमि

कुंभ, हरेला, बसंत, फूलदेई
उत्तरैणी कौथिग नंदा जात
सुमन, केसरी, जीतू, माधो
चंद्रसिंह वीरों की थात
जियारानी तीलू रौंतेली
जियारानी तीलू रौंतेली
गौरा पर गर्व‍ित जन-जन
अभ‍िनंदन-अभ‍िनंदन
उत्तराखंड देवभूमिuttrakhand map

 
यहां सुनेंं पूरा गीत

ये गीत दिल ही नहीं आंखों को भी खुश करेगा

gham1

सोशल मीडिया और यूट्यूब ने भले ही उत्तराखंड फ‍िल्म इंडस्ट्री की कमाई पूरी तरह चट कर दी हो, लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जेा इस बीच भी अपनी संस्कृति दिखाने के प्रयास करते रहते हैं.

gham2

अब देख‍िये न! आप सब लोग डीजे वाला भैजी और चैत्वाली के पीछे पड़े हुए हैं, लेकिन इस शोर के बीच आप ने यह उत्तराखंडी गीत नहीं देखा, जिसमें आपको उत्तराखंड संस्कृति की झलक देखने को मिलती है.

poster

‘घाम छलाया’ एक बहुत ही सुंदर उत्तराखंडी गीत है. इसे न सिर्फ राज्य के शांति देने वाले संगीत की तर्ज पर बनाया गया है, बल्क‍ि इसमें उत्तराखंड की संस्कृति और परिधान को काफी अच्छे से पेश किया गया है.

gham5

किशन महिपाल के निर्देशन में बनाए गए इस वीडियो में आपको चमोली का पहनावा देखने को मिलता है. यही इसमें आपको उत्तराखंड की बेहद खूबसूरत नजारे भी देखने को मिलते हैं.

gham6

सिर्फ एक ही कमी हमें इस गाने में नजर आई और वो है कि जब परिधान उत्तराखंडी कर दिया गया था, तो कलाकारों को पैंट और जूते भी थोड़े पारंपरिक होते, तो अच्छा लगता. या कम से कम जीन्स पैंट और स्पोर्ट्स शूज न पहनते.

gham8

इस गाने को प्रह्लाद मेहरा ने गाया है. किशन महिपाल ने इस गीत को निर्देश‍ित और शूट किया है. यूट्यूब पर यहां गाना आप आसानी से सुन सकते हैं.

gham3

खूबसूरत नजारे इस वीडियो में आपको  देखने को म‍िलेंगे

यहां देख‍िये पूरा वीडियो 

‘चैता की चैत्वाई’ सुना तो जरूर होगा, इसके बारे में जानते कितना हैं आप

उत्तराखंड में और देश व दुनिया के जिन भी भागों में उत्तराखंडी रहते हैं, वहां चैता की चैत्वाली गीत धूम मचा रहा है. शादी-विवाह कार्यक्रम हो या फिर कोई छोटा-मोटा आयोजन, सब जगह आपको यह गीत सुनाई देगा.

यूट्यूब पर इसके कई वर्जन मौजूद हैं. लेक‍िन क्या आप जानते हैं कि अमित सागर पहले नहीं हैं, जिन्होंने इस गीत को गाया है.

इन्होंने गाया सबसे पहले
चैता की चैत्वाली सबसे पहले अमित सागर ने नहीं, बल्क‍ि उत्तराखंड के फेमस लोकगायक चंद्र सिंह राही जी ने गाया था. उन्होंने सबसे पहले इसे रिकॉर्ड किया था. उन्होंने पारंपर‍िक अंदाज में इस जागर को प्रस्तुत किया था.

राही जी ने बाकायदा ढोंर-थाली और ढोल-दमों के साथ इस जागर को गाया है. राही जी की आवाज में यह गीत आपको यूट्यूब पर आसानी से मिल जाएगा.

किसने लिखा यह गीत
चैता की चैत्वाल या चैता की चैत्वाली दरअसल एक आछरी जागर है. यह जागर लोक गाथाओं और लोक परंपराओं का एक अहम हिस्सा है. इस जागर को उत्तराखंड के औजी सालों से गाते आ रहे हैं. औजी और चंद्र सिंह राही जी की बदौलत ही आज की पीढ़ी भी इस जागर से रूबरू हो रही है.

इनका ‘चैता की चैत्वाली’ सुना आपने
चैता की चैत्वाली को अमित सागर ने एक अलग अंदाज में गाकर और उसमें आधुनिक संगीत का मिश्रण कर उसे युवाओं के बीच काफी पसंदीदा बना दिया है. लेक‍िन सिर्फ अमित ही नहीं हैं, जिन्होंने इस जागर को गाया है.

आप इस जागर को लोकगायक व निर्देशक अनिल बिष्ट की आवाज में भी सुन सकते हैं. उन्होंने भी ‘चैता की चैत्वाल’ को ढोल-दमो की थात पर गाया है. येे भी आपको थि‍रकने पर मजबूर कर देगा.

YouTube पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाला गीत है ये
चैता की चैत्वाई के व्यूज 70 लाख का आंकड़ा पार कर चुके हैं. इसी के साथ ही यह गीत YouTube पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाला उत्तराखंडी गीत बन चुका है.

इससे पहले यह रिकॉर्ड किसन महिपाल के ‘फ्यों‍लड़िया’ गीत के नाम था. फिलहाल फ्योंलड़िया 66 लाख व्यूज के साथ दूसरे नंबर पर है.

राजपथ पर बजे जिस गीत को आप खोज रहे थे, वो मिल ही गया

गणतंत्र दिवस के मौके पर इस बार राजपथ पर उत्तराखंड की झांकी भी दिखी. इस झांकी में जौनसारी लिबास के साथ ही एक जौनसारी गीत भी बजा.

हमारे यूट्यूब चैनल पर लोगों ने राजपथ पर बजे इस गीत को पूरा सुनने की ख्वाहिश जताई.

राजपथ पर बजे वह गीत आख‍िरकार हमें मिल गया है. चौमास को लेकर गाये गए इस गीत को जब आप पूरा सुनेंगे, तो आपको मन और भी ज्यादा खुश हो जाएगा. उत्तराखंड की झांकी में इस गीत की सिर्फ चंद लाइनें बजी थीं.

इस गीत को गाया जौनसार के फेमस गायक सनी दयाल ने और इस गीत को खूबसूरत संगीत से सजाया है संगीतकार सुरेंद्र नेगी ने.

और अब लीजिए सुनिए इस पूरे गीत को. हमारा वादा है आपका दिल खुश हो जाएगा.