नरेंद्र सिंह नेगी का ‘नॉन-सिंगिंग’ इंटरव्यू, हर ज़रूरी मुद्दे पर बात

आप अगर उत्तराखंड के हैं तो आपने नेगी दा के गीतों को ज़रूर सुना होगा। नेगी दा यानि गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी। नेगी दा का जब भी इंटरव्यू लिया जाता है तो हमेशा बातें उनके गीतों को लेकर और उनके सफ़र पर होती है। लेकिन यहाँ जो इंटरव्यू में हम आपको बीच पेश कर् रहे हैं। ये कई मामलों में अलग है।

इस इंटरव्यू में आपको नेगी दा के उस सफ़र के बारे में पता चलेगा जो आपने अभी तक ना कहीं पढ़ा है और शायद देखा भी नहीं होगा। तो चलिए शुरू करते हैं- नेगी दा का NON-SINGING INTERVIEW। यहाँ पेश किया जा रहा ये इंटरव्यू नेगी दा से फ़ोन पर हुई बातचीत का हिस्सा हैं। 

नेगी दा। कोरोना के इस काल में आप कहां रह रहे हैं और क्या कर रहे हैं?
कोरोना काल में मैं अपने पौड़ी गाँव आया हूं। पिछले तीन चार महीने से यही हूं। फ़िलहाल मैंने यूट्यूब पर एक सीरीज़ शुरू की है। ‘गीत भि गीत की बात भि’। इस सीरीज़ में मैं अपने गीतों के पीछे की कहानी बता रहा हूं। वैसे हर गीत के पीछे कहानी तो नहीं होती, लेकिन जिनमें है। वो यहाँ शेयर कर रहा हूं। अभी तक 7 भाग आ गए हैं इसके। श्रृंखला अभी भी जारी है।

नेगी दा का नया गीत कब आ रहा है?
अभी मैंने एक गीत गाया था- जख मेरी माया रौंदी। लेकिन अब गीत निकालना काफ़ी महँगा हो गया है। पहले तो कैसेट कंपनियाँ पैसे खर्च करती थीं। अब तो गायकों को ख़ुद खर्च करना पड़ता है। गाना रिकॉर्ड करने से लेकर उसकी शूटिंग तक, लाख-दो लाख रुपये लग जाते हैं। इतनी व्यवस्था कर पाना आसान नहीं है। 

मुझे गीत गाते-गाते 45 साल से ज़्यादा का वक़्त हो गया है। अब वो उत्साह भी नहीं है। नए बच्चे ला रहे हैं। उन्हें लाना भी चाहिए क्योंकि ये उनके लिए बेहतर है। 

मेरा गीत लिखने और रचनाएँ सुधारने का काम जारी है। चाहता मैं भी हूँ कि कोई गीत लाऊँ लेकिन अब गीत निकालना काफ़ी महँगा हो गया है। लेकिन जल्द ही कोशिश करेंगे कोई नया गीत लाने की। जल्द ही लाएंगे। 

नेगी दा भारत के कई क्षेत्रीय सिनेमा हैं जो तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। आप भोजपुरी सिनेमा ही देख लीजिए, जिसकी पहुँच अब देश-विदेशों तक हो गई है। लेकिन इसके मुक़ाबले में हमारा उत्तराखंडी सिनेमा ठप पड़ा हुआ दिखाई देता है। क्या आपको नहीं लगता कि इस मामले में सरकार को कुछ करना चाहिए?
देखिये। मेरा मानना है कि कला और संस्कृति के मामले में सरकार को बाहर ही रहने दें। फ़िल्में सरकार नहीं बनाती। निर्माता बनाते हैं। ये भाषा, संस्कृति और कला हमारी है। सरकार को इसकी क्या पड़ी है?

सरकार अगर दख़लंदाज़ी करेगी तो अपनी बात भी फ़िल्मों में डालेगी। आजतक ऐसा तो हुआ नहीं है कि सरकार फ़िल्म बना रही हो। फ़िल्म तो वहाँ के लोग बनाते हैं जिन्हें अपनी संस्कृति, भाषा और कला से प्रेम है। जिनके दिमाग़ में उत्तराखंड कि चिंता, यहाँ की तकलीफ़ है। वही लोग फ़िल्म बनाएंगे। सरकार बनाएगी तो अपने प्रचार के लिए बनाएगी। 

बॉलीवुड में उत्तराखंड के कई कलाकार हैं। निर्माता से लेकर एक्टर, गायक तक सब भरे पड़े हैं। तो क्या आपको नहीं लगता कि इन लोगों को उत्तराखंडी सिनेमा बनाना चाहिए। ताकि इनके साथ आने से उत्तराखंडी सिनेमा भी आगे बढ़ सके। क्या ये लोग अपने उत्तराखंडी सिनेमा के लिए पैसे खर्च नहीं कर सकते?
बॉलीवुड में काम करने वालों का काम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाता है। करोड़ों लोगों के बीच जाता है। हमारे उत्तराखंड की जनसंख्या ही कितनी है? उस पर भी राज्य की कुल जनसंख्या में से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी लोग ही फ़िल्मों का शौक़ रखते हैं। इन 50 फ़ीसदी में से सिर्फ़ 50 फ़ीसदी लोग ही सिनेमा देखने जाते हैं।

इसके अलावा हमारे ग्रामीण अंचल में सिनेमा हॉल नहीं हैं। सिर्फ़ देहरादून और दिल्ली के सिनेमा हॉल के लिए फ़िल्म तो नहीं बन सकती। ऐसा करना बहुत महँगा सौदा साबित होगा. 

जिन लोगों का आपने नाम लिया वे लोग 100-100 करोड़ की फ़िल्मों में काम करते हैं। ऐसे में उनकी उम्मीद भी करोड़ों में कमाने की होगी ना?  हमारे यहाँ 30-40 लाख में फ़िल्म बनती है। इसमें भी आधे से ज़्यादा खर्चा फ़िल्म के टेक्निकल पक्ष पर खर्च हो जाता है। कलाकारों को भी कुछ नहीं मिलता है। उत्तराखंडी फ़िल्मों से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। इसलिए वो इन फ़िल्मों से दूरी बना लेते हैं। 

हमारे यहाँ के लोग फ़िल्मों से उम्मीद करते हैं कि उनकी क्वालिटी 100-200 करोड़ के बजट वाली फ़िल्म के बराबर हो। लेकिन ख़ुद थियेटर में नहीं जाते। जब लोग अपना योगदान देंगे तब ही तो सिनेमा भी सुधरेगा। निर्माताओं को प्रोत्साहित करना होगा। हम भी 100 200 रुपये खर्च कर फ़िल्म देखने जाए तो लगता है कि फ़िल्म चल रही है। जब प्रोत्साहन देंगे तो अच्छी फ़िल्में भी बनेंगी। 

अब बात करते हैं प्रवासियों की। कोरोना काल में हज़ारों प्रवासी प्रदेश से लौटकर गाँव वापस आ गए हैं। कई लोग हैं जो ये कह रहे हैं कि वो अब गाँव में ही रहेंगे। ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि एकसाथ इतनी बड़ी जनसंख्या आई है तो राज्य में रोज़गार का संकट पैदा हो जाएगा? आपकी इस पर क्या राय है?
 ये एक टेंपररी फ़ेज़ है। लोग गाँव आए हैं क्योंकि शहर में उनका रोज़गार छिन गया था। लोगों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया था। गाँव में तो कुछ-न-कुछ इंतज़ाम हो जाता है। लोग बीमारी के डर से गाँव लौट रहे हैं।

उन्हें परदेश जाना पड़ा क्योंकि हमारे राज्य ने उन्हें रोज़गार नहीं मुहैया कराया। अगर सरकार इन प्रवासियों को यहीं रोकना चाहती है तो उन्हें रोज़गार उपलब्ध कराए। किसी की बड़ी नौकरी है तो उसकी बात अलग है। लेकिन जो 7-8 हज़ार के लिए परदेश जा रहा है उसे तो राज्य में ही रोका जा सकता है। कुछ रोज़गार दिया जा सकता है। 

आप अगर प्रवासियों को वापस बुला रहे हैं तो उनके लिए रोज़गार की व्यवस्था करिए। नहीं कर सकते हैं तो हाथ खड़े कर दीजिए। तब वो लोग जाएँगे ही दूसरे राज्यों में रोज़गार की खोज में। 

पहाड़ में खेती के आधार पर जीवन व्यतित करना मुश्किल है। यहाँ एक परिवार के पास 4-5 खेत होते हैं। यहाँ की खेती तराई की तरह नहीं होती है। इस ज़मीन पर जो थोड़ी बहुत फसल हो भी जाती है तो उसे बंदर या जंगली जानवर ख़राब कर देते हैं। 

चकबंदी है समाधान?
सरकार को चकबंदी करनी चाहिए। चकबंदी से ही पहाड़ में खेती सफल हो पाएगी। चकबंदी हो जाएगी तो जिसके पास ज़्यादा ज़मीन है, उसे एक पूरा प्लॉट मिल जाएगा। बड़े प्लॉट में वो सब्जी-फल-फूल, जो चाहे उगा सकता है। पहाड़ में खेत दूर-दूर होते हैं। लोगों के खेती छोड़ने की यही बड़ी वजह है।  अगर खेत एक जगह ही हो जाए तो काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होगा। 

खेतों का अधिग्रहण करने की बजाय सरकार को चकबंदी करनी चाहिए। एक जगह खेत मिलेंगे तो लोग अपने खेतों पर बाढ़ भी लगा सकेंगे। वहाँ मकान भी बना सकेंगे। चकबंदी को लेकर हिमाचल हमारे सामने बड़ा उदाहरण है। यहाँ पर चकबंदी सफल हुई है। आप (सरकार) कहती है कि व्यावसायिक खेती करो। व्यावसायिक खेती तभी तो होगी जब खेत एक ही जगह पर मिलेंगे। पानी की व्यवस्था भी हो सकेगी।

गणेश गरीब जी हैं। उनका पूरा जीवन चकबंदी के लिए आंदोलन करने में चला गया है। लेकिन उनकी कोई सुन ही नहीं रहा। जब ज़मीन सोना उगलेगी तो क्यों नहीं आएँगे लोग घर। 

नेगी दा। कुछ वक़्त पहले आपने एक कविता लिखी थी- ‘नजीबाबाद कु इफ्तखार हुसैन’। इस कविता में आप पहाड़ में ढोल-दमो के गुम होने पर और बैंड बाजा के हावी होने पर व्यंग्य कर रहे हैं। लेकिन आपको नहीं लगता कि पहाड़ में ढोल-दमो पर बैंड-बाजा हावी हो रहे हैं?
हावी तो हो रहे हैं। ढोल-दमो को बचाने के लिए हमें ज़िद्द करनी होगी। अभी मैंने अपने दो बच्चों की शादी करवाई। मैंने तय किया कि शादी में न तो शराब पिलाई जाएगी और ढोल दमो ही लाए जाएंगे। बैंड-बाजा नहीं।

कुछ बैंड बाजा वाले फ़्री में अपनी सेवा देने के लिए तैयार थे लेकिन मैंने फिर भी उनको इसके लिए इनकार किया। हमें ज़िद करनी होगी। ज़िद नहीं करेंगे तब तक स्थिति सुधरेगी नहीं। 

हम अपने औजी की इज़्ज़त नहीं करते। उन्हें हम 2 से 4 हज़ार रुपये देने में भी हिचकते हैं। लेकिन वहीं बैंड-बाजा वाले को 8 से 10 हज़ार देने में भी नहीं हिचकते। बैंड-बाजा वालों के मुक़ाबले औजी ज़्यादा मेहनत करता है। वो बारात लेकर भी आता है। लेकर भी जाता है। दो दिन उसी प्रवास में रहता है। 

हम अपने लोगों की कद्र नहीं करते। जब तक हम औजियों को सम्मान नहीं देंगे तो क्यों बजाएँगे वो ढोल। उनके बच्चे भी सोचेंगे कि ढोल बजाने में न इज़्ज़त है और ना ही पैसा। तो क्यों करेगा वो ये काम। 

बाहर के जो कारीगर आते हैं, उनकी हम जात तक नहीं पूछते। हमें पता भी नहीं होता कि वो क्या हैं। लेकिन अपने गाँव के औजी को पहले ही किनारे बिठा दिया जाता है। उन्हें अलग खाना देते हैं। औजियों के लिए अलग-अलग नियम क़ानून बनाते हैं। 

औजियों को अपने साथ बिठाइए। खिलाइए-पिलाइए। उन्हें अच्छा मेहनताना दीजिए तो क्यों नहीं बजाएँगे वो ढोल-दमो। हमें पहले अपनी कमियों को दूर करना होगा। उसके बाद ही हालात सुधर सकते है। 

नेगी जी। उत्तराखंड आंदोलन में भी आप शामिल हुए थे। कहीं मैंने आपके बारे में पढ़ा था कि आप कंबल से मुँह ढककर प्रभात फेरियों में शामिल होते थे। इसमें कितनी सच्चाई है?
उत्तरकाशी में एक संस्था है कला दर्पण। वह प्रभात फेरियाँ निकाला करती थी। मैं भी उसमें शामिल हुआ। सुबह का वक़्त होता था। ठंडी बहुत ज़्यादा होती थी। इसलिए हम लोग कंबल ओढ़कर रैलियों में शामिल होते थे। इस दौरान जनगीत गाए जाते थे। इसी दौरान मैंने आंदोलन गीत लिखे थे। बाद में यही गीत ‘उत्तराखंड आंदोलन’ एल्बम में सामने आए।

नेगी जी। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान आप सरकारी नौकरी में थे। क्या कभी आपको अपने गीतों की वजह से तलब किया गया?
हां। मेरे गीत प्रभात फेरियों में बजने लगे थे। 26 जनवरी के दिन मैं डीएम के साथ जा रहा था और सामने से मेरे गीत रैलियों में बज रहे थे। इसके बाद लोकल इंटेलिजेंस यूनिट्स वालों ने मेरी शिकायत DM से कर दी। उन्होंने कहा कि ये आदमी गीत लिख रहा है और आंदोलन को भड़का रहा है।

DM ने मुझे तलब किया। अच्छे व्यक्ति थे वो। मैंने उनके सामने तर्क दिया कि जब खुद मुलायम सिंह सरकार अलग राज्य का समर्थन करती है। रोज अखबारों में विज्ञापन देती है तो ऐसे में मैं भी तो उसी के समर्थन में गीत गा रहा हूं। इस पर जिलाधिकारी ने मुझे हिदायत दी कि हमें इससे बचना चाहिए। क्योंकि हम सरकारी नौकरी वाले हैं। 

गाने के लिए ही छोड़ी सरकारी नौकरी
2005 में मैंने सरकार नौकरी छोड़ दी। दरअसल उस समय में मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के ख़िलाफ़ गीत लिखा था। ‘नौछमी नारैणा’।  इस गीत को गाने से पहले मेरे लिए नौकरी छोड़ना बेहद ज़रूरी था। क्योंकि सर्विस के दौरान अगर मैं ये गीत गाता तो वो नियमों का उल्लंघन माना जाता। इसलिए मैंने पहले नौकरी छोड़ी और फिर ये गीत गाया।

 

  

वो गीत, जिसे गाने के लिए नेगी दा ने छोड़ दी सरकारी नौकरी


गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी। जिसके गीत आम पहाड़ी की भाषा में बात करते हैं। उनके गीतों में हर पीढ़ी से मुलाक़ात होती है। उनके गीतों को तो हर किसी ने सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं कि नेगी दा ने एक गीत को गाने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी? और तब जो उन्होंने वो गीत गाया तो एक बहुत बड़ा भूचाल आया।

सूचना विभाग से जुड़े थे नेगी दा
नरेंद्र सिंह नेगी गायन के साथ सरकारी नौकरी भी किया करते थे। वह सूचना विभाग में कार्यरत थे। उन्होंने कई सालों तक उत्तरकाशी में सेवा दी। 2005 में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी। अभी सिर्फ़ 6 साल और थे उनकी सर्विस ख़त्म होने में लेकिन फिर भी उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया। और वो भी सिर्फ़ इसलिए ताकि वो अपना एक नया-नवेला गीत गा सकें। 

वो गीत था- नौछमी नारैणा। नेगी दा ने ये गीत तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को लेकर लिखा था। इस गीत ने पूरे उत्तराखंड में भूचाल ला दिया था। और ऐसा असर हुआ कि आख़िर में तिवारी जी की कुर्सी ही चली गई। 

अब आप सोचेंगे कि क्या नेगी दा इस गीत को सरकारी नौकरी में रहते ही नहीं गा सकते थे? क्या वो सरकार से डर गए थे? तो उनके सरकारी नौकरी छोड़ने वाले सवाल का जवाब ख़ुद नेगी दा से लीजिए। 

छिबड़ाट को दिए अपने ख़ास इंटरव्यू में उन्होंने ही इस बारे में बताया। नेगी दा ने बताया कि वो इस गीत को गाना चाहते थे। लेकिन सर्विस कंडक्ट रूलिंग की वजह उन्हें दिक़्क़त हो सकती थी।

उनके मुताबिक़ अगर वो सर्विस के दौरान इस गीत को गाते तो उन्हें नियमों के मुताबिक़ जेल में भी डाला जा सकता था। इसीलिए उन्होंने पहले सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दिया। उसके बाद ही नौछमी नारैणा गीत गाया।

बता दें कि नौछमी नारैणा गीत काफ़ी फ़ेमस हुआ था। इस गीत ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी। वो जहां भी जाते, यह गीत सुनाई देता था। इस गीत को सेंसर कराने की कोशिश भी की गई।

इसके विरोध में कलाकार सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया। और आख़िर में सरकार बनाम कलाकार में कला की जीत हुई। 

टीवी के ‘श्रीकृष्ण’ उत्तराखंड में एक महान काम करने में जुटे हैं!

आपका जन्म 90 के दशक में हुआ है तो आप रामायण के राम, महाभारत और श्रीकृष्ण सीरियल के ‘श्री कृष्ण’ से जरूर वाकिफ होंगे। वाकिफ क्या… हम और आप वो बच्चें हैं जिनके लिए टीवी पर आने वाले श्रीकृष्ण ही असल भगवान थे। दूरदर्शन एक बार फिर ‘श्रीकृष्ण’ सीरियल टेलीकास्ट करने वाला है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले वो कलाकार कौन हैं और आजकल कहां हैं? इस वीडियो में हम आपको न सिर्फ उस कलाकार के बारे में बता रहे हैं बल्कि आज जो काम वो कर रहे हैं, वो उन्हें भगवान के बराबर ही खड़ा कर देता है।

कृष्ण के अवतार में सर्वदमन

कृष्ण के अवतार में सर्वदमन

सर्वदमन डी बनर्जी बने थे श्रीकृष्ण
श्री कृष्ण सीरियल में श्री कृष्ण का किरदार सर्वदमन डी बनर्जी ने निभाया था। सर्वदमन की वो मुलमुल मुस्कान और उनका वो बोलने का अंदाज आज भी हम लोगों को याद है। सर्वदमन जिन्हें हम भगवान मान चुके थे वो आज भी भगवान तुल्य काम कर रहे हैं।

माता के साथ सर्वदमन

माता के साथ सर्वदमन

20 साल से ऋषिकेश है निवास
सर्वदमन डी बनर्जी का जन्म वैसे तो उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुआ। हालांकि वो मूलत: बंगाल के रहने वाले हैं। लेकिन अब वो उत्तराखंड के ऋषिकेश में रहते हैं। पिछले करीब 20 सालों से यही उनका बसेरा है। बॉलीवुड की चकाचौंद से दूर सर्वदमन ऋषिकेश में मेडिटेशन सेंटर चलाते हैं। लोगों को योग सिखाते हैं।

सिर्फ यही नहीं, मेडिटेशन के अलावा सर्वदमन बनर्जी ‘पंख’ नाम के एक NGO से भी जुड़े हैं। वो इस एनजीओ के जरिये उत्तराखंड में झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देते हैं। पहाड़ की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनकर आजीविका कमाने में भी मदद करते हैं। 

बॉलीवुड से क्यों गायब हुए ‘श्रीकृष्ण’
अब आप सोचेंगे कि श्रीकृष्ण और कुछ अन्य सीरियलों में दिखने के बाद सर्वदमन क्यों गायब हो गए। आखिर क्यों उन्होंने बॉलीवुड फिल्में कीं? तो इस सवाल का जवाब खुद सर्वदमन देते हैं। एक इंटरव्यू में सर्वदमन ने बताया क’मैंने ‘कृष्णा’ करते वक्त ही फैसला कर लिया था कि मैं 45-47 साल की उम्र तक ही काम करूंगा। उन्होंने कहा था कि एक वक्त तक ये चकाचौंध आपको बहुत अच्छी लगती है, लेकिन उसके बाद आपको आत्मीय शांति की जरूरत होती है।

कृष्ण अवतार

कृष्ण अवतार

 

सर्वदमन को वो आत्मीय शांति ऋषिकेश में मिली। लंबे समय तक बॉलीवुड से दूर रहने के बाद सर्वदमन धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी में कोच बने नजर आए। लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि उन्होंने ऋषिकेश या फिर वो अच्छा काम करना छोड़ दिया हो… वो आज भी इसमें लगे हुए हैं। सर्वदमन बनर्जी

हमने सर्वदमन जी को सिर्फ श्रीकृष्ण में ही नहीं, बल्कि ‘अर्जुन’, ‘जय गंगा मैया’ और ‘ओम नम: शिवाय  जैसे सीरियलों में भी देखा लेकिन इन सबमें भी वो या तो श्रीकृष्ण ही बने या फिर विष्णु के किरदार में नजर आए। उन्होंने बड़े परदे स्वामी विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जैसी फिल्में भी कीं।

सर्वदमन ने भले ही टीवी के रुपहले परदे पर श्रीकृष्ण का किरदार निभाया हो लेकिन आज जो काम वो कर रहे हैं। उस काम ने उन्हें कई लोगों के लिए भगवान ही बना दिया है। हम कामना करते हैं कि हमारे बचपन के हीरो श्रीकृष्ण उर्फ सर्वदमन बनर्जी यूं ही अच्छा काम करते रहें। और जरूरतमंदों की मदद में लगे रहें।

 

वीडियो देखें


इंग्लैंड की ‘नंदा’ की बेल्जियम के ‘शिव’ से शादी

त्रियुगीनारायण में पिछले दिनों एक खास शादी हुई। बेल्जियम के शिवा नंद ने इंग्लैंड की एफ्रोडिएट से शादी रचाई। वो भी पहाड़ी रीति-रिवाज से। उनकी ये शादी काफी वायरल हुई। उनकी शादी के फोटोज सोशल मीडिया पर काफी शेयर किए गए। लेकिन शिव और एफ्रोडिएट का लक्ष्य सिर्फ उत्तराखंड में शादी करना भर नहीं था। बल्कि वे तो उत्तराखंड में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए काम करना चाहते हैं।

शिवानंद और एफ्रोडिएट वैसे तो विदेशी हैं, लेकिन प्रकृति से उनका अथाह प्रेम उन्हें उत्तराखंड खींच लाया। इसीलिए इन्होंने अपने नाम में नंद जोड़ा है। प्रेम से ये खुद को शिवा और नंदा भी कहलाना पसंद करते हैं। दोनों ही शिव भगवान के भक्त हैं। दोनों ने ना सिर्फ पहाड़ी रीति-रिवाज से शादी की, बल्कि यहां की परंपराओं को अपने अंदर समेटा भी है। शादी के बाद एफ्रोडिएट नंदा सिंदूर लगाती हैं। हाथों में चूड़िया भी दिखती हैं। वहीं, शिवानंद के साथ मंदिरों में जाती हैं और पूजा अर्चन करती हैं।

एफ्रोडिएट और उनके पति शिवानंद ने पहाड़ को समझने के लिए ना सिर्फ गांवों का दौरा किया बल्कि यहां के लोगों से मिले और यहां की परंपराओं को आत्मसात भी किया। 

ये तो बात हो गई शिवा और एफ्रोडिएट की। लेकिन अब बात करते हैं कि इनके काम की। शिवा और एफ्रोडिएट दोनों ही योग में पारंगत हैं। दोनों ही प्रकृति प्रेमी हैं। एफ्रोडिएट पहाड़ो में फैल रही गंदगी के खिलाफ एक अभियान चला रही हैं। एफ्रोडिएट से जब हमने उनके अभियान को लेकर बात की, तो उन्होंने बताया कि जब वो पहाड़ और पहाड़ के गांवों में गए तो यहां उन्हें काफी ज्यादा प्लास्टिक कचरा फैला दिखा। एफ्रोडिएट कहती हैं कि इस प्लास्टिक से हमारे पहाड़ दूषित हो रहे हैं और ऐसे में जरूरी है कि इस प्लास्टिक को अपने पहाड़ों से हटाया जाए। 

फिलहाल एफ्रोडिएट 5 से 6 साल के लिए भारत का वीजा हासिल करने की कोशिश में जुटी हुई है। इसी साल मई या जून से वह अपने अभियान को आगे बढ़ाने का काम करेंगी।

एफ्रोडिएट ने पहाड़ों को प्लास्टिक मुक्त करने के लिए फेसबुक पर एक फंड रेजिंग कैंपेंन शुरू किया है। इस कैंपेंन में आप भी डोनेशन दे सकते हैं। और क्यों उन्होंने ये कैंपेंन शुरू किया है, इसकी वजह भी आपको पता चल जाएगी। 

एफ्रोडिएट और शिवानंद का पहाड़ से प्रेम उन्हें यहां खींचकर लाया। आज जब हम अपनी शादियों में देशी बैंड-बाजा बजाना ज्यादा पसंद करते हैं तो वहीं, इंग्लैंड की नंदा और बेल्जियम के शिव हमारी परंपराओं को अपनाकर इन परंपराओं को जिंदा रखने का एक संदेश भी दे रहे हैं।

एफ्रोडिएट और शिवानंद की शादी पर बने वीडियो को देखें

Colonel Ajay Kothiyal: पहले सीमा पर ढंटे रहे, अब पहाड़ को बदलने में जुटे हैं

जून का महीना था। साल 2013 केदारनाथ घाटी में एक ऐसा सैलाब आया जो हजारों जिंदगियों को अपने साथ बहा ले गया। और कर गया नेस्तनाबूत केदारघाटी को। केदारघाटी को मुख्य सड़कों से जोड़ने वाले सारे रास्ते टूट गए और हजारों लोग फंसे रह गए। ऐसे में इन लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का जिम्मा संभाला कर्नल अजय कोठियाल और नेहरू माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट की उनकी टीम ने।

कर्नल अजय कोठियाल के नेतृत्व में उनकी टीम ने अपनी जान पर खेलकर ना सिर्फ हजारों लोगों को बचाया बल्कि विषम परिस्थितियों में केदारनाथ के लिए वैकल्पिक मार्ग भी तैयार किया, लेकिन कर्नल अजय कोठियाल का परिचय इतना भर नहीं है।

17 से ज्यादा आतंकियों का खात्मा कर चुके अजय कोठियाल कीर्ति चक्र, शौर्य चक्र और विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित व्यक्ति हैं। जब निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री थी तो उन्होंने अजय कोठियाल की तारीफ करते हुए कहा था, ‘कर्नल कोठियाल के सेल्फ मोटिवेशन के कॉन्सेप्ट को देशभर में फैलाना चाहिए। कैसे वह उत्तराखंड के युवाओं को सेना में भर्ती करने का काम कर रहे हैं। कर्नल कोठियाल के इस बेहतरीन काम से हम सभी को प्रेरणा मिलती है।” 

टिहरी गढ़वाल के चौंफा गांव के मूल निवासी कर्नल अजय कोठियाल का जन्म वैसे तो पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। लेकिन पहाड़ से वो हमेशा जुड़े रहे। और इसीलिए उन्हें गढ़वाली सरदार भी कहा जाता है। पिता के बाद बेटे अजय ने भी देशसेवा का रास्ता चुना और 90 के दशक में भर्ती हो गए। लगभग 27 साल तक अजय कोठियाल ने देश की सेवा की। और रिटायरमेंट के बाद वो पहाड़ का नक्शा और यहां के युवा की किस्मत बदलने में जुटे हुए हैं।

अजय कोठियाल ने सियाचीन से लेकर UN मिशन तक सेवा दी है। उन्होंने पर्वतारोहण के लिए भी सेना के महिला दल का नेतृत्व किया है। और शायद ही साहस का कोई ऐसा काम हो जो उन्होंने ना किया हो।

एक और कहानी आपको सुनाता हूं। कर्नल अजय कोठियाल सेना से रिटायर होकर जब नेहरू माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट से जुड़े तो उऩकी पोस्टिंग उत्तरकाशी में हुई। सेना से जुड़े होने की वजह से कई मांबाप कोठियाल के पास एक उम्मीद लेकर आए। उम्मीद कि वो उनके बेटे को सेना में भर्ती करने में मदद करें। लेकिन जैसे कोठियाल जी कहते हैं… “सेना में सिफारिश तो चलती नहीं’’…. और इस तरह तैयार हुआ यूथ फाउंडेशन।

अजय कोठियाल के नेतृत्व में यूथ फाउंडेशन के 8500 युवा आज सशस्त्र बलों से जुड़ें हुए हैं। उत्तराखंड पुलिस में 48 से ज्यादा लड़कियां भर्ती हो चुकी हैं। और ये सिलसिला लगातार चलता ही जा रहा है। यूथ फाउंडेशन सेना और पुलिस में भर्ती होने के इच्छुक युवाओं को ट्रेन करती है। और इस ट्रेनिंग की ना कोई फीस है और ना कोई खर्चबस जरूरत है तो सिर्फ जज्बे की और कुछ करने की।

यूथ फाउंडेशन आज ना सिर्फ युवाओं को सेना में भर्ती करने के लिए तैयार कर रहा है। बल्कि यह अजय कोठियाल के नेतृत्व में कई अन्य सामाजिक कार्यों को करने में भी जुटा हुआ है।

अजय कोठियाल ने विवाह नहीं किया है। वो कहते हैं कि हर वो शख्स उनका अपना है, जो जरूरतमंद है। अजय कोठियाल अगर चाहते तो सेना से रिटायर होने के बाद एक आरामबस्त जिंदगी गुजार सकते थे। लेकिन वह अपने दिल में एक मिशन लेकर पहाड़ के उबड़खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं। और इस रास्ते पर जहां भी उन्हें कोई जरूरतमंद मिलता है तो वो उसका हाथ पकड़कर उसे सफलता के माउंट एवरेस्ट तक पहुंचाते हैं। ऐसी महान विभूति और देवदूत को हमारा नमन।

तो दोस्तों ये थी एक छोटी सी वीडियो उस महान शख्स के बारे मेंजिसके काम को एक वीडियो में समा पाना संभव नहीं। हम दुवा और उम्मीद करते हैं कि अजय कोठियाल के नेतृत्व में उत्तराखंड का युवा सफलता के नये आयाम छुए।

हॉलीवुड में एक्टिंग का जादू बिखेर रही उत्तराखंड की बेटी

अब तक आपने बॉलीवुड में काम करने वाले उत्तराखंडी एक्टर्स के बारे में सुना होगा और देखा होगा… लेकिन आज हम आपको मिला रहे हैं उत्तराखंड की एक ऐसी बेटी से.. जो हॉलीवुड में अपने अभिनय का परचम लहरा रही है। नाम है नवी रावत। नवी रावत उत्तराखंड के उस परिवार से नाता रखती हैं, जिस परिवार का एक बेटा उत्तराखंड सरकार में मंत्री है। और दो बेटे ऐसे हैं, जिन्हें दुनिया पूजती है।

नवलता रावत यानि नवी रावत
नवी रावत का नाम शायद आपने सुना भी नहीं होगा, लेकिन नवी उत्तराखंड के उस घराने से वास्ता रखती हैं, जिस घर का एक लाल उत्तराखंड सरकार में मंत्री है।इस घर के एक लाल को पूरी दुनिया पूजती है। और एक लाल पूरी दुनिया में शांति का मैसेज पहुंचाने में जुटा हुआ है। हम आपको बता रहे हैं नवी रावत की हॉलीवुड जर्नी और उनके परिवार व उत्तराखंड कनेक्शन के बारे में। 

कौन है नवी रावत?
नवी रावत हॉलीवुड और अमेरिकी टेलिविजन की फेमस अभिनेत्री हैं। उन्हें अमेरिकन टेलिविजन सीरीज नंबर्स, OC में उनके किरदार के लिए जाना जाता है। नवी रावत उत्तराखंड के हरिद्वार से वास्ता रखती हैं। हालांकि उनकी पैदाइश और परवरिश अमेरिका की ही है। 5 जून, 1972 को राजाजी रावत और क्लॉडिया रावत ने कैलिफॉर्निया में नवी यानि नवलता को जन्म दिया। अब खुद नवी रावत मां बन चुकी हैं। नवी ने 2012 में ब्रावली नॉल्टे से शादी रचाई और उनका एक बच्चा है।

नवी रावत की हॉलीवुड जर्नी
रावत की हॉलीवुड जर्नी की बात करें तो उन्होंने फीस्ट, द कलेक्शन, लवलेस इन लॉस एंजिलिस और द प्लेबैक सिंगर जैसी हॉलीवुड फिल्में की हैं। अमेरिकन टेलिविजन सीरीज में उन्हें नंबर्स सीरीज के लिए याद किया जाता है। इसमें उन्होंने एक गणितज्ञ का किरदार निभाया था। नवी ने कई सॉन्ग एलबम में भी काम किया है। फिलहाल नवी रावत ने एक्टिंग से ब्रेक लिया है और अपने बच्चे पर पूरा ध्यान दे रही हैं।

नवी रावत का परिवार
नवी रावत उत्तराखंड के उस परिवार से आती हैं, जिसका काफी पुराना इतिहास है। नवी रावत उत्तराखंड के फेमस परमसंत श्री हंस जी महाराज की पोती हैं। उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज और भोले जी महाराज नवी के ताऊ लगते हैं। सिर्फ यही नहीं, नवी के पिता के एक और भाई हैं- प्रेम रावत। प्रेम रावत दुनियाभर में पीस एजुकेटर के नाम से फेमस हैं। 

अमेरिका कैसे पहुंचा उत्तराखंड का परिवार?
परमसंत हंस जी महाराज ने बचपन से ही अपने चारों बेटों को आध्यात्मिक ज्ञान दिया और उन्हें भी इस पथ पर चलाना सिखाया और साथ रखा। 60 और 70 के दशक में हंस जी महाराज ने अमेरिका समेत कई देशों की यात्राएं कीं। लेकिन अमेरिका उनके बेटों को सबसे ज्यादा रास आया। भोले जी महाराज, प्रेम रावत समेत राजाजी रावत भी यहीं बसे। यहां राजाजी रावत ने क्लॉडिया से शादी रचाई। प्रेम रावत ने भी यहीं शादी की।

हंस परिवार का एक और चिराग हॉलीवुड में
ऐसा नहीं है कि सिर्फ नवी रावत ही हॉलीवुड में परचम लहरा रही है। इस परिवार का एक और चिराग हॉलीवुड में है। भोले जी महाराज यानि महिपाल सिंह रावत की बेटी शिवानी रावत हॉलीवुड फिल्में बनाती हैं। शिवहंस पिक्चर्स नाम से उनका प्रोडक्शन हाउस है। उन्होंने हॉटेल मुंबई, बेरूत जैसी कई फिल्मों को प्रोड्यूस किया है। 

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‘मोती बाघ’ ने वो दिखाया है जो आजतक किसी ने नहीं देखा

उत्तराखंड के किसान पर बनी डॉक्युमेंट्री मोती बाघ को भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया है। ये उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण है। मोती बाघ पौड़ी गढ़वाल के 83 साल के किसान की कहानी है। जिसने 32 साल पहले सरकारी नौकरी छोड़कर अपने गांव बसने का फैसला किया। वो भी ऐसे वक्त में जब सब शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। विद्यादत्त शर्मा ने खंडहर होते मकानों और बंजर होते खेतों के बीच एक मोती बाघ बनाया है, जिसे वह हमेशा हराभरा रखते हैं। लेकिन इस डॉक्युमेंट्री में सिर्फ इतना भर नहीं है। ये डॉक्युमेंट्री उन लोगों को भी एक कड़ा संदेश देती है, जिनका मानना है कि उत्तराखंड पर नेपालियों का कब्जा हो रहा है। आगे हम बता रहे हैं डॉक्युमेंट्री की वो बातें, जो ये सोचने पर आपको मजबूर करेगी कि अगर नेपाली न होते तो आधे से ज्यादा उत्तराखंड खंडहर और बंजर हो चुका होता।

मोती बाघके बहाने उत्तराखंड का सच
पौड़ी गढ़वाल का एक गांव है। गांव में एक बुजुर्ग महिला का निधन हो जाता है। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होती हैं, लेकिन तभी एक बड़ी समस्या सामने खड़ी हो जाती है। अर्थी को श्मशान घाट कैसे पहुंचाया जाए? क्योंकि गांव में बहुत ही कम लोग हैं… और जो हैं, उनके कंधों में इतनी ताकत नहीं कि अर्थी उठा सकें। आखिर में नेपाली मजदूरों को ढूंढा जाता है और वे अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट पहुंचाते हैं। 

अगर आपने मोती बाघ का ट्रेलर देखा होगा तो उसी में विद्यादत्त शर्मा ये उदाहरण दे रहे होते हैं। और उनके उदाहरण का इशारा साफ है कि उत्तराखंडी अब सिर्फ गांव छोड़ नहीं रहे हैं बल्कि उन्होंने इनका पूरी तरह से त्याग करना शुरू कर दिया है।… कई उत्तराखंडी शहरों के हो चुके हैं और कइयों को शायद अब अपने गांव का रास्ता तक भी याद नहीं। ऐसे में ये नेपाली ही हैं, जो हमारे रोजमर्रा के काम निपटाने में मदद कर रहे हैं। 

विद्यादत्त कहते हैं…

ये नेपालियों की मेहरबानी है कि वो हमें खिला रहे हैं। अगर वो नहीं होते तो उत्तराखंड मुर्दाघर बन जाता।

क्यों कहा विद्यादत्त जी ने ऐसा?

पिछले साल ही पलायन आयोग ने पलायन पर अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से पता चला कि उत्तराखंड के 900 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां अब एक भी इंसान नहीं रहता। रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि उत्तराखंड में जहां उत्तराखंडियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, वहीं नेपालियों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है।… और ये सच भी है। जिन मकानों को आपने खंडहर बना कर छोड़ा है, ये उन्हें घर बना रहे हैं। जिन खेतों को आपने बंजर किया है, ये उन खेतों में सब्जी उगा रहे हैं।… उत्तराखंड में जो थोड़े बहुत लोग रह भी रहे हैं, अब वो अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए नेपाली मजदूरों पर आश्रित हैं।… तो बताइए कि अगर कल नेपालियों को भगा दिया जाता है… या फिर वे यहां से चले जाते हैं। तो कौन आपके खंडहरों को घर बनाएगा… कौन बंजर हो चुके खेतों को हरा भरा रखेगा… और किसकी बदौलत आप अपने हर छोटे-बड़े काम को कर पाएंगे।

नेपाली मजदूरों की भी सुन लें

मोती बाघ को हरा रखने में न सिर्फ विद्यादत्त के बेटे लगे हुए हैं, बल्कि उनके साथ एक नेपाली मजदूर भी हैं। ट्रेलर में आप मजदूर को कहते हुए सुन सकते हैं कि ऐसी नौबत भी आ सकती है, जब उन्हें यहां से भगाया जा सकता है। लेकिन हमें नेपालियों से नफरत नहीं, बल्कि उनका धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने हमारे उत्तराखंड को जितना संभव है, उतना जिंदा रखा है।… और अगली बार किसी नेपाली मजदूर को गाली देने से पहले ये जरूर सोचिएगा कि पलायन नेपालियों की वजह से नहीं, आपकी वजह से है। पलायन रोकना है तो पहले आपको लौटना होगा… और जब आप लौटेंगे तो न सिर्फ आपके लिए बल्कि उन नेपाली मजदूरों के लिए भी जगह हो जाएगी… याद रखिये हम देवताओं की भूमि में रहते हैं…वहां सबके लिए जगह है।… और हां… पहाड़ की तस्वीर बदलना अब आपके हाथ में है। 

10वीं पास एक पहाड़ी जो आज चीन का राजा है

चीन में एक देव फु हैं। देव फु यानि टिहरी गढ़वाल के केमरिया सौड़ गांव के मूल निवासी देव रतुड़ी. देव रतुड़ी को भारत में भले ही ज्यादा लोग न जानते हों, लेकिन वह चीन के प्रतिष्ठित लोगों में से एक हैं। देव चीनी बोलते हैं. चीन की फिल्मों में एक्टिंग करते हैं. चीन में 7 से ज्यादा रेस्टोरंट के मालिक हैं.  अब अपनी जन्मभूमि उत्तराखंड को संवारना चाहते हैं।लेकिन क्या आपको पता है कि आज ये शख्स जो सफलता के हिमालय पर खड़ा दिख रहा है, उसने कितना संघर्ष किया है? क्या आप जानते हैं कि चमियाला इंटर कॉलेज से 10वीं पास करने वाला एक वेटर आज 7 रेस्तरां का मालिक है? देव रतुड़ी चीन के प्रतिष्ठित लोगों की कतार में सबसे आगे खड़ा होता है।

यहां से शुरू हुई कहानी
देव रतुड़ी यानि द्वारिका प्रसाद रतुड़ी। केमरिया सौड़ गांव में जन्म हुआ। घनसाली से सटे चमियाला में स्थित इंटर कॉलेज से 10वीं पास की। साल था 1995। बड़े भाई की तरह अब देव रतुड़ी को भी नौकरी करने परदेश जाना था। देव सिर्फ नौकरी नहीं करना चाहते थे. उनके सपने काफी बड़े थे.

देव रतुड़ी उत्तराखंड में निवेश करना चाहते हैं

देव रतुड़ी उत्तराखंड में निवेश करना चाहते हैं

घर-घर दूध बेचा
1995 में देव दिल्ली आए। यहां एक डेयरी में घर-घर दूध पहुंचाने का काम किया. तनख्वाह थी- 400 रुपये. कुछ वक्त बाद मुंबई चले गए. देव के भाई एक्टर पुनीत इस्सर के ड्राइवर थे. देव खुद एक्टर बनना चाहते थे. उन्हें मौका भी मिला लेकिन कैमरे के सामने खड़े होते ही मुंह से एक भी डायलॉन नहीं निकला. इस तरह फिर देव होटलों में छोटे-मोटे काम करने लगे.

2005 में आया टर्निंग प्वाइंट
देव की जिंदगी में टर्निंग प्वाइंट 2005 में आया. देव 2005 में चीन में वेटर की नौकरी करने के लिए चले गए. 400 रुपये तनख्वाह से शुरुआत करने वाले देव की साल 2009 आते-आते लाखों में कमाई हो गई. साल 2010 में उन्होंने अपना खुद का रेस्तरां खोलने के लिए काम शुरू किया। जेब में पैसे नहीं थे तो अपने पुराने मालिक से पैसे मांगे और 2013 आते-आते देव का पहला रेस्तरां- रेड फोर्ट शुरू हो गया. चीन के शांग्जी प्रांत के शियान शहर में उन्होंने अपना रेस्तरां खोला. इसके बाद देव ने मुड़कर नहीं देखा।

चीन के प्रतिष्ठित लोगों में आता है देव का नाम

देव की सफलता की कहानी
देव ने एक के बाद एक चीन में 7 से ज्यादा रिस्तरां खोल लिए हैं. सिर्फ रेस्तरां नहीं बल्कि उन्होंने यहां योगा सेंटर भी खोला है. जहां न सिर्फ योग सिखाया जाता है, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार भी होता है. चीन के कई अखबार, वेबसाइट और न्यूज चैनल देव का इंटरव्यू ले चुके हैं. देव कई प्रतिष्ठित सांस्कृतिक प्रोग्राम में प्रमुख अतिथि की भूमिका निभा रहे हैं.  हाल ही में वह उत्तराखंड आए थे, 500 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव लेकर।

चीनी फिल्मों में पहाड़ी
देव हमेशा से एक्टिंग करना चाहते थे और इनका ये सपना चीन जाकर पूरा हुआ. देव ने यहां बहुत ही कम समय में चीनी भाषा सीख ली. सबसे पहले उन्हें एक छोटे बजट की फिल्म का ऑफर आया. जिसमें उन्हें विलेन का किरदार अदा करना था. देव ने बखूबी वो किरदार निभाया  और आज उन्होंने स्ट्रीट रीबर्थ समेत दर्जन भर फिल्मों में अभिनय किया है। वे फिल्मों में अक्सर विलेन का रोल करते हैं। आने वाले समय में उनकी दो से तीन फिल्में आ रही हैं. यही नहीं, देव फिटनेस फ्रीक भी हैं. कुंग फु भी सीख रहे हैं.देव रतुड़ी

देव का परिवार
देव रतुड़ी का परिवार उनके साथ ही सियान में रहता है। देव की शादी यहीं भारत में ही हुई। उनकी पत्नी का नाम अंजलि रतुड़ी है. अंजलि ऋषिकेश की रहने वाली हैं। देव के दो प्यारे से बच्चे हैं,  आरव और अर्णब, जिन्हें देव एक्टर बनाने का मन बना चुके हैं।

देव रतुड़ी का परिवार

देव रतुड़ी का परिवार

ये है फर्श से अर्श पर पहुंचने की कहानी, लेकिन ये कहना गलत होगा कि ये इसलिए हुआ क्योंकि देव का नसीब अच्छा था. देव ने हर चीज को हासिल करने के लिए संघर्ष किया…मेहनत की। और आज वह चीन में सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि भारत का भी झंडा लहरा रहे हैं।    

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उत्तराखंड की बेटी कैसे बनी ‘मदर ऑफ पाकिस्तान’?

बेगम लियाकत अली खान को मदर ऑफ पाकिस्तान भी कहा जाता है। वह पाकिस्तान की पहली महिला थीं, जिन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने और सत्ता में पुरुषों के मुकाबले खड़े होने के लिए तैयार किया। अपने पति पाक के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान यानी  के साथ मिलकर उन्होेंने एक नया पाकिस्तान तैयार करने में मदद की। वह पाकिस्तान के लिए कई देशों में राजदूत रहने वाली पहली महिला थीं.

वह पहली महिला गर्वनर और कराची यूनिवर्सिटी की पहली महिला चांसलर थीं। उन्हें संयुक्त राष्ट्र ने ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड से सम्मानित किया और ये अवॉर्ड हासिल करने वाली भी वह पहली महिला थीं। उन्होंने अपने पूरे जीवन भर पाकिस्तान और यहां की महिलाओं की खातिर काम किया। जीवन के आखिरी क्षण तक वह पाकिस्तान की राजनीति में एक्टिव रहीं और सरकार में कई अहम पदों पर काबिज रहीं। पाकिस्तान को इसकी उंचाइयों पर पहुंचाने वाली ये महिला उत्तराखंड की थी. जी हां… उत्तराखंड की।

शीला पंत था नाम
बेगम लियाकत अली खान का जन्म १३ फरवरी, १९०५ को अल्मोड़ा में हुआ। उनका नाम शीला अाइरिन पंत था। उनके पिता हेक्टर पंत ब्रिटिश सेना में मेजर जनरल थे। वैसे तो हेक्टर पंत कुमाऊंनी ब्राह्मण थे, लेकिन १८८७ में उनका परिवार धर्म परिवर्तन कर इसाई बन गया।

शीला ने कुबूला इस्लाम

शीला आइरीन पंत ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। वह दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर बनीं। इसी दौरान १९३१ में उनकी मुलाकात लियाकत अली खान से हुई। १९३२ में आइरीन ने लियाकत अली खान से शादी की। विवाह के साथ ही उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया। और अपना नाम बदलकर राणा लियाकत अली खान कर दिया।

अलग पाकिस्तान कि हिमायती
इसी दौरान वह मुस्लिम लीग का हिस्सा बनीं और उन्होंने भी अलग पाकिस्तान के लिए संघर्ष शुरू किया।  १९४७ में जब पाकिस्तान बना, तब उन्होंने अपने पति देश के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ पाकिस्तान को बदलने में अहम भूमिका निभाई।

आइरीन पंत यानी बेगम लियाकत अली खान ने १३ जून, १९९० को इस दुनिया को अलविदा कहा। दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ।

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उत्तराखंड का वो ‘अंग्रेज’, जिसने जीता दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नोबेल पुरस्कार

दुनिया का सबसे सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार है नोबेल प्राइज।… भारत में यह रविंद्रनाथ टैगोर और कैलाश सत्यार्थी समेत कुछ ही लोगों को हासिल हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड के एक शख्स को भी नोबेल पुरस्कार मिल चुका है? वो भले ही अंग्रेज था, पर उसका उत्तराखंड से अटूट रिश्ता था और जन्म से आखिरी तक ये नाता बना रहा।… उनका नाम था, रोनल्ड रॉस और जब आप उनका काम जानेंगे तो आपको और भी गर्व होगा।

बात १८५७ की है. ये वो वक्त था, जब भारत में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बज चुका था।… देशभर में अंग्रेंजों के खिलाफ आक्रोश फैल चुका था।…इसी बीच, उत्तराखंड के अल्मोडा में एक अंग्रेजी सेना के मेजर के घर पर १३ मई को एक बच्चे का जन्म हुआ।… इसका नाम रोनल्ड रॉस रखा गया।… और बाद में रॉस को १९०२ में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार नोबेल मिला।….

उत्तराखंड में जन्म लेने के बाद पिता ने पढाई के लिए उन्हें ब्रिटेन भेज दिया।… यहां से जब वापस भारत लौटे, तो वह एक कवि बन चुके थे. बाद में उन्होंने पिता के कहने पर मेडिकल क्षेत्र में काम करना शुरू किया।… और उन्होंने अपने ग्यान व मेहनत के बूते मलेरिया की दवाई तैयार की….

जी हां… आज अगर मलेरिया का इलाज संभव हो पाया है, तो वो सिर्फ रॉस की वजह से है. उनकी रिसर्च ने ही मलेरिया का इलाज ढूंढना संभव हुआ. बाद में १९०२ में उन्हें अपनी इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।….

रोनल्ड रॉस अथवा मॉस्किट्यो रॉस का देहांत १९३२ में हुआ. अपनी आखिरी सांस तक उन्हें अपनी जन्मभूमि अथवा उत्तराखंड से लगाव रहा। … सभी पहाडि़यों की तरह वह भी पलायन कर दिल्ली मुंबई में अपनी रिसर्च का काम कर रहे थे।

हमें गर्व है कि मलेरिया जैसी बीमारी का इलाज ढूंढने वाले शख्स हमारे पहाड़ में जन्मे थे और हमेशा अपनी जन्मभूमि से उनका लगाव रहा.

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