कमली 2 हो रही तैयार, जानें-क्या दिखेगा इस बार?

‘कमली’ को उत्तराखंड की सबसे कामयाब फिल्मों में गिना जाता है। यही वजह है कि लोग लंबे समय से इसके दूसरे पार्ट की मांग कर रहे थे। आखिरकार हिमालयन फिल्म्स ने इसकी औपचारिक घोषणा कर दी है।

हिमालयन फिल्म्स ने यूट्यूब पर एक कम्युनिटी पोस्ट डालकर फिल्म को लेकर कुछ जानकारी दी है। यहां हम आपको न सिर्फ वो जानकारी देंगे बल्कि बताएंगे अंदर की कुछ बातें। जैसे इस बार फिल्म की स्टोरी क्या होगी? और कौन-से वो कलाकार हैं जो शायद आपको कमली पार्ट 2 में नजर नहीं आएंगे।

कमली पार्ट 2 का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। हमारे चैनल पर भी हमने दो वीडियोज इस फिल्म को लेकर बनाए और कमेंट्स में अधिकतर लोगों ने कमली पार्ट टू के बारे में ही पूछा है। तो अच्छी खबर ये है कि कमली पार्ट 2 जल्द ही सिनेमाघरों में रिलीज होगी।

हिमालयन फिल्म्स ने एक कम्युनिटी पोस्ट डालकर बताया कि कमली फिल्म की शूटिंग शुरू है। पोस्ट में देरी का कारण भी बताया गया। पोस्ट के मुताबिक कमली की 10वीं, 12वीं और मेडिकल की पढ़ाई को दिखाने की वजह से शूटिंग में काफी टाइम लग गया। खैर आप उम्मीद कर सकते हैं कि अगले साल मार्च या अप्रैल से पहले ये फिल्म सिनेमाघरों में हो सकती है। क्योंकि फिल्म की शूटिंग काफी वक्त से चल रही है।

इस बार क्या है स्टोरी?
पहले पार्ट में आपने देखा कि कमली डॉक्टर बनने का सपना पाले आगे बढ़ रही है। पार्ट 2 में आपको कमली का ये सपना पूरा होता दिखेगा। फिल्म का प्लॉट इसी के आसपास घूमता है। पार्ट 2 में आप कमली की 10वीं, 12वीं और मेडिकल पढ़ाई देखेंगे। और इस पढ़ाई को करने के लिए उसे किन आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, वो इस फिल्म का अहम हिस्सा होगा।

कौन-कौन कलाकार दिखेंगे?
पार्ट 2 में आपको कमली की भूमिका में प्राची पंवार नजर आएंगी। जिन्होंने पहले भाग में भी कमली का किरदार निभाया था। प्राची के साथ ही सवाली मैडम भी आपको नजर आएंगी। सवाली मैडम का किरदार इस बार भी तुलिका चौहान ही निभाती नजर आएंगी। फिल्म का निर्देशन अनुज जोशी और गीत प्राची पंवार के पिता जितेंद्र पंवार के ही लिखे होंगे।

अब बात करते हैं उन दो कलाकारों की जो शायद आपको इस बार फिल्म में नजर नहीं आएंगे। हम बात कर रहे हैं जीतू और शिब्बू की। जीतू यानि अभिषेक जग्गी अभी पढ़ाई कर रहे हैं। वहीं, शिब्बू यानि सचिन पंवार थाइलैंड में होटल में नौकरी कर रहे हैं। ऐसे में पूरी संभावना है कि पार्ट 2 में आपको जीतू और शिब्बू की जोड़ी नजर नहीं आए।

हालांकि संभावना ये भी है कि जीतू और शिब्बू का रोल इसबार कोई और कलाकार निभाएं। क्योंकि फिल्म निर्माता नहीं चाहेंगे कि इतने फेमस कैरेक्टर्स को खत्म किया जाए।

तो दोस्तों ये थी कुछ जानकारी और कयास। फिलहाल हम फिल्म का इंतजार करते हैं और उम्मीद करते हैं कि जैसे पार्ट वन ने सबके दिल में जगह बनाई, वैसे ही पार्ट 2 भी सबसे दिल में जगह बनाए।

आप उत्तराखंड के हैं, क्या ये 5 चीजें पता हैं आपको?

गुजरते वक्त के साथ पुरानी चीजें छूटती चली जाती हैं और नई चीजें अपनी जगह बना लेती हैं। आज हम आपको 5 ऐसी चीजों के बारे में बताने वाले हैं जो न सिर्फ पहाड़ की परंपराओं का अभिन्ना हिस्सा रही हैं बल्कि इन चीजों की बदौलत पहाड़ की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा का जीवन चलता था। ये 5 चीजें जो अब पहाड़ में बहुत ही कम सुनाई या दिखाई पड़ती हैं। और नई पीढ़ी को शायद इनके बारे में पता भी नहीं है।

1. ढाकर

ढाकर पैटी रे माडू थैर्वाअ
अस्सी बरस कु बुढया रे माडू थैर्वाअ

पहाड़ का जीवन हमेशा से संघर्षों से भरा रहा है। उसी की बानगी है ढाकर। पुराने वक्त में लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर ढाकर जाते थे और जरूरत की चीजें लाया करते थे। इस दौरान कोटद्वार समेत कई जगहों पर ढाकर मंडिया लगा करती थीं। जहां लोग अपने खेतों और सग्वाड़ों पर उगी मिर्च या दूसरे धान लाया करते थे। मंडियों में इन चीजों के बदले नमक, सब्जियां और जरूरत की दूसरी चीजें ले जाया करते थे।

ढाकर यानि ढोकर ले जाना। जो ढाकर आते थे, उन्हें ढाकरी कहा जाता था। आज लुप्त हो चुकी इस परंपरा से सैकड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई थी। जब लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर ढाकर जाते थे तो रास्ते में कई ढाकरी पड़ाव होते थे। बांघाट और दुग्गड्डा भी कभी ढाकरी पड़ाव थे।

जहां-जहां ढाकरी रुकते तो वहां मनोरंजन का पूरा साधन होता। नाच-गाना करने वाले, जादू खेल दिखाने वाले, मैणा यानि कहावतें, लोकगीतों को गाना जैसे कई तरीके वक्त काटने के लिए अपनाए जाते थे। बदले में मनोरंजन करने वालों को दिया जाता था- इनामी राशि। और इसी से होता था इनका जीवनयापन। ढाकर की परंपरा पर आधे पहाड़ की आजीविका जुड़ी हुई थी।

2. डड्वार
ये एक ऐसी चीज है जो थोड़ी बहुत आज भी बची हुई है। डड्वार पहाड़ में दिया जाने वाला एक प्रकार का पारितोषिक है। ये फसल का एक हिस्सा होता है। बदलते वक्त के साथ फसल के बदले कई जगहों पर पैसे भी दिए जाते हैं। इसे ब्राह्मण, लोहार और औजी को दिया जाता था। सालभर में होने वाली दो फसलों गेंहू-जौ और दूसरी धान के वक्त डड्वार दिया जाता था।

फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को चढ़ाया जाता है, इसे पूज या न्यूज कहा जाता है। दूसरा हिस्सा पंडित को दिया जाता था। सालभर पंडित ने घर में जो पूजा-पाठ किए और उसमें कभी कम दक्षिणा गई हो तो ये डड्वार एक तरह से उस कमी को पूरा करने के लिए दिया जाता था।

तीसरा हिस्सा लोहार का था। फसल काटने से पहले दाथुड़ी और अन्य हथियारों को पैना करने के बदले डड्वार दिया जाता था। वहीं, संग्राद- मक्रैणी और अन्य अहम त्योहारों पर घर आकर ढोल-दमो बजाने वाले औजियों को भी डड्वार दिया जाता था। औजियों को ही डड्वार देने की परंपरा कई जगहों पर आज भी है।

3. बोरू
बोरू डड्वार की तरह ही श्रम के बदले पारितोषिक देने की परंपरा है। जहां पंडित, औजी, लोहार को डड्वार दिया जाता है। वहीं, खेतों में काम करने और किसी अन्य के काम में हाथ बटाने आए ग्रामीणों को बोरु दिया जाता था। यह एक तरह की दैनिक मजदूरी होती थी जो काम करने वाले व्यक्ति को दी जाती थी। हालांकि बदलते वक्त के साथ बौरु की जगह दिहाड़ी ने ले ली है।

4. धिनाली
आज भले ही हालात बदल रहे है। पहाड़ के लोग भैंस, गाय रखने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन एक वक्त था, जब ये सब शान माने जाते थे। जब किसी दुधारु पशु का दूध निकालकर लाया जाता है तो उसे हमेशा छुपाकर लाया जाता है. स्थानीय भाषा में दूध, दही, घी आदि को धिनाली कहा जाता है. धिनाली को छुपाने की एक वजह ये भी थी कि किसी की नजर ना लगे और गाय या भैंस कम दूध ना देने लगे। एक वक्त ऐसा भी था, जब धिनाली को परिवार की संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। बिना दूध की चाय पीना, एक गाली मानी जाती थी।

5. कोटी बनाल
कोटी बनाल कोई परंपरा तो नहीं है लेकिन यह वो शैली है, जिससे उत्तराखंड के घर हजारों सालों तक सीना तने खड़े रहते हैं। सीमेंट और शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी बनाल वास्तुकला खत्म सी हो गई है। लेकिन इसके अवशेष आज भी उत्तरकाशी, जौनसार और हिमाचल में देखने को मिलती है। कोटी बनाल से बनाए गए मकान भूकंप रोधी होते थे। और इसमें कई मंजिलों के घर बनाए जाते थे। शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी-बनाल वास्तुकला खोती जा रही है और हम कॉन्क्रीट जंगल अपने पहाड़ में खड़ा करने लग गए हैं।

IPL 2020: फील्ड पर पहाड़ का ‘नौना’, स्टू़डियो में पहाड़ की नौनी का धमाल

रुद्रप्रयाग की गलियों से निकलकर, बॉलीवुड का सफर करते हुए, एक चेहरा IPL 2020 तक पहुंच गया है। नाम है तान्या पुरोहित। IPL 2020 का आगाज हो चुका है। हमेशा की तरह इस बार भी IPL में उत्तराखंड के कई खिलाड़ी अपना जलवा बिखेर रहे हैं। इसमें धोनी, रिषभ पंत और पवन नेगी जैसे प्लेयर शामिल हैं।

ये तो हो गई ऑन फील्ड की बात लेकिन अब जरा ऑफ फील्ड भी नजर दौड़ाइए। हर मैच के दिन स्टार स्पोर्ट्स पर आइए क्योंकि यहां पर मैच की अपडेट्स और इंटरव्यूज लेकर आपको नजर आती हैं तान्या पुरोहित।

तान्या पुरोहित IPL 2020 में स्टार स्पोर्ट्स की एंकर हैं और कोरोना काल में मुंबई से आपतक IPL की अपेडट्स पहुंचाने में जुटी हुई हैं। लेकिन तान्या का परिचय सिर्फ इतना भर नहीं है।

 

कौन हैं तान्या पुरोहित?
तान्या का नाता उत्तराखंड के उस परिवार से है, जिसने यहां की विरासत को संभालने में अहम भूमिका निभाई है। तान्या रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के क्वीली गांव की हैं। वर्तमान में वह अपने पति के साथ मुंबई में रहती हैं।

तान्या के पिता डॉ. डीआर पुरोहित गढ़वाल विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं। हालांकि उनकी पहचान सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। दाता राम  पुरोहित ने उत्तराखंड की संस्कृति और रंगमंच को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई है। डी आर पुरोहित ही वो शख्स हैं, जिन्होंने जोशीमठ की उर्गम घाटी के मुखौटा नृत्य ‘रम्माण’ को यूनेस्को की नजर में लाया है।

तान्या के पति दीपक डोभाल भी एक न्यूज एंकर हैं। श्रीनगर से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले दीपक राज्यसभा टीवी में बतौर एंकर दिख चुके हैं। फिलहाल वह ज़ी बिज़नेस में एंकर के तौर पर शामिल हैं। तान्या की तरह ही दीपक भी रंगमंच से जुड़े रहे हैं।

बॉलीवुड में तान्या
तान्या वैसे तो बचपन से ही थियेटर करती आ रही हैं लेकिन बॉलीवुड में उनकी मजबूत शुरुआत NH-10 फिल्म से हुई है। फिल्म में तान्या ने अहम भूमिका निभाई है। इस फिल्म में उन्हें एक और उत्तराखंडी अभिनेत्री अनुष्का के साथ काम करने का मौका मिला। NH-10 के अलावा तान्या ने टेरर स्ट्राइक और कमांडो जैसी फिल्मों में काम किया है। सिर्फ यही नही, तान्या ने फ्लिपकार्ट और विजय सेल्स के लिए एडवरटाइजिंग में भी काम किया है।

एंकरिंग से तान्या का पुराना नाता
तान्या  कैरेबियन प्रीमियर लीग में भी एंकरिंग कर चुकी हैं। इसके अलावा द ड्रामा कंपनी यूट्यूब चैनल के लिए भी कुछ वीडियोज उन्होंने किए हैं। यानि कि तान्या रंगमंच से लेकर एंकरिंग के स्टेज तक, हर जगह छाई हुई हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि आगे भी तान्या ऐसे ही तरक्की करती रहें और उत्तराखंड का नाम रोशन होता रहे। क्योंकि जब भी उत्तराखंडी चमकता है तो उत्तराखंड बढ़ता है।

‘आप’ की उम्मीदों का पहाड़ चढ़ेगा पहाड़ी?

भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ की अब उत्तराखंड पर नजर है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में घोषणा की कि उनकी पार्टी 2022 में उत्तराखंड की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनका दावा है कि उन्होंने उत्तराखंड में सर्वे करवाया। सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि ‘आप’ को उत्तराखंड में चुनाव लड़ना चाहिए। 

कई मोर्चों पर दिल्ली की सूरत बदल कर रख देने वाले केजरीवाल के सामने पहाड़ की कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे अभी तक उनका सामना नहीं हुआ है। और जो चुनौतियां 20 सालों से कमोबेश जस की तस हैं।

उम्मीद की किरण ‘आप’
9 नवंबर, 2000 वो तारीख है, जिस दिन उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। अलग राज्य से उम्मीदें थीं कि सालों से चली आ रही दिक्कतों से निजात मिलेगा। पहाड़ में रोजगार पैदा किए जाएंगे तो पलायन रुकेगा। पहाड़ों में अस्पताल बनेंगे तो जानें बचेंगी। अच्छे स्कूल होंगे तो पहाड़ से ही डॉक्टर-इंजीनियर निकलेंगे। उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, पहाड़ में ही (गैरसैण) राजधानी बनेगी। 

20 साल में क्या बदला?
उत्तराखंड 20 साल का हो चुका है लेकिन जो मांगें 20 साल पहले थीं वो आज भी जस की तस हैं। इन 20 सालों में उत्तराखंड पर सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही कुर्सी बदलती रही है। उत्तराखंड आंदोलन से निकली पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल यानि उक्रांद आपसी झगड़ों और फूट के चलते कहीं नजर भी नहीं आई। लेकिन अब ‘आप’ से उम्मीद कर सकते हैं। 

उत्तराखंड ने बीजेपी और कांग्रेस को आजमाकर देख लिया है। यूकेडी अपना कोई मजबूत आधार यहां खड़ा करने में अभी तक विफल ही रही है। उक्रांद ना मजबूत विपक्ष साबित हो पाई है, ना ही वो कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प बन पाई है। लेकिन ‘आप’ इन दोनों मजबूत पार्टियों का विकल्प बनने की ताकत रखती है। 

दिल्ली का सुधार उत्तराखंड में होगा?
दिल्ली में केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी अचीवमेंट शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए बदलाव माने जाते हैं। उत्तराखंड के परिपेक्ष में देखें तो यहां की भी सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव की है। ‘आप’ के उत्तराखंड में आने से इस उम्मीद को पंख जरूर लगेंगे। और कई ऐसे लोग होंगे जो इस बिना पर ‘आप’ को वोट दे सकते हैं।

गैरसैंण स्थायी राजधानी?
दूसरी मांग, जिसके आधार पर केजरीवाल उत्तराखंड में वोट मांग सकते हैं, वो है- गैरसैंण। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भले ही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया हो लेकिन आम पहाड़ी अभी भी इससे ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। केजरीवाल आम जन की नब्ज पकड़ना काफी अच्छी तरह से जानते हैं। और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा उनके घोषणापत्र में सबसे ऊपर हो सकता है।

फ़्री बिजली ने कांग्रेस के इरादों पर फेरा पानी!
मार्च 2020 में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि 2022 में सत्ता में आने पर फ्री बिजली और पानी देंगे। जब उन्होंने यह घोषणा की थी, तब ‘आप’ के मैदान में आने की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। हरीश ने जिस केजरीवाल मॉडल पर चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई थी, वो कांग्रेस के लिए ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि केजरीवाल फ्री बिजली और पानी के वादे के साथ मैदान में उतरेंगे।

कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी दिल्ली की तरह लोकल मुद्दों पर लड़ती दिखेगी। लोकल मुद्दे यानि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और राजधानी। दिल्ली का रिपोर्ट कार्ड और प्रवासी उत्तराखंडियों के बूते उत्तराखंड में ‘आप’ मजबूत जनमत हासिल करती दिखेगी। 

20 साल से पहाड़ का जनमानस कांग्रेस और बीजेपी का जो विकल्प ढूंढ़ता दिख रहा था,  वो आखिर उसे मिलता दिख रहा है। कांग्रेस और न बीजेपी के लिए एक पहाड़ सी चुनौती बनती दिख रहे हैं- केजरीवाल।

उत्तराखंड पर बनी 6 फ़िल्में, जिन्होंने देश और दुनिया में तारीफ कमाई

आपने बॉलीवुड फिल्म केदारनाथ देखी होगी। कांछी, मीटर चालू बत्ती गुल, स्टूडेंट ऑफ द इयर टू, ट्यूबलाइट समेत कई बॉलीवुड फ़िल्में हैं, जो उत्तराखंड में बनी हैं या फिर इसके परिवेश की कहानी को लेकर चलती हैं। कमर्शियल सिनेमा की इन फ़िल्मों की चमक के बीच वो फ़िल्में हमें कम ही पता चलती हैं जो पहाड़ को उसके असली स्वरूप में दुनिया के सामने पेश करते हैं।  हम आपको 6 ऐसी ही फ़िल्मों के बारे में बता रहे हैं, जिनमें आपको पहाड़ बिना किसी फ़िल्टर के दिखता है। शायद इसीलिए इसमें वो फ़िल्में भी शामिल हैं जिन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और ऑस्कर तक नॉमिनेशन हासिल किया है।

दाएं या बाएं

दाएं या बाएं

 दाएं या बाएं
दाएं या बाएं फिल्म में बॉलीवुड एक्टर दीपक डोबरियाल, मानव कौल समेत कई बॉलीवुड एक्टर्स ने अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरा।
कहानी रमेश मजीला  यानि दीपक डोबरियाल के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में एक जिंगल लिखने पर रमेश को कार इनाम में मिलती है। इसी के आसपास पूरी कहानी घूमती है। इस फिल्म में आपको न सिर्फ शुद्ध पहाड़ी परिवेश नज़र आता है बल्कि इस फ़िल्म का निर्देशन भी उत्तराखंड की बेला नेगी ने किया है। फ़िल्म में आपको पहाड़ के कवि गिरीश तिवारी गिरदा भी नज़र आते हैं।

यह फ़िल्म 2010 में रिलीज़ हुई थी। एक शुद्ध पहाड़ी फ़िल्म को अगर बॉलीवुड के कैमरे से देखना है तो ‘दाएं या बाएं’ एक बेहतरीन विकल्प है।

हंसाहंसा
हंसा वो फिल्म है जो महज 17 दिन में बनकर तैयार हुई। इसे सिर्फ 5 लाख रुपये के बजट में बनाया गया। इस फिल्म का निर्देशन करने वाले मानव कौल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ये फिल्म हमने सिर्फ़ डीवीडी पर देखने के लिए बनाई थी। लेकिन बाद में फ़िल्म को आसियान फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड मिला। PVR की तरफ से इसे बाकायदा सिनेमाघरों में रिलीज किया गया।  क्रिटिक्स ने इस फ़िल्म को खूब सराहा।

हंसा पहाड़ के उस बच्चे की कहानी है, जिसके पिता सालों से शहर से नहीं लौटे हैं। हंसा और उसकी दीदी अपने पिता को खोजने की कोशिश करती हैं। बीमार मां और लापता पिता को सँभालने की कहानी है हंसा। इस फ़िल्म के ज़रिये आप पहाड़ में अकेला और कठिन जीवन जीने वाले बच्चों का दर्द समझ सकते हैं। 


कुमाउंनी फिल्म- आस

कुमाउंनी फिल्म- आस

आस
आस उत्तराखंड की पहली रीजनल लैंग्वेज फ़िल्म है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। कुमाऊँनी भाषा में बनी फ़िल्म आस, बलि प्रथा पर चोट करती है। फ़िल्म में कुछ बच्चे बली चढ़ाने के लिए लाई गई बकरी की जान बचाने के लिए जतन करते हैं। 

इस फ़िल्म को दिल्ली इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ऑडियंस च्वॉइस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा प्रतिरोध का सिनेमा, कोलकाता चिल्ड्रन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी इसका सेलेक्शन हुआ। वहीं, उत्तराखंड के स्तर पर बात करें तो फ़िल्म ने यहां भी बेस्ट डायरेक्टर, सिनेमैटोग्राफर और बेस्ट फ़िल्म का ख़िताब जीता।  

इस फ़िल्म में आपको पहाड़ के बच्चों की मासूमियत और कुरीतियों पर चोट करती उनकी कोशिश नज़र आती है। 


काफल

काफल


काफल

उत्तराखंड के फेमस फल काफल के नाम पर बनी ये बाल फ़िल्म राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है। फ़िल्म बचपन की उस कहानी से जुड़ती है, जिसमें हर मां-बाप बच्चों को ये कहकर डराते हैं कि सो जा वरना काली माई आ जाएगी।

फ़िल्म में ऐसा ही एक किरदार है- पगली माई का। जिससे बच्चे डरते हैं। पगली माई का किरदार बॉलीवुड एक्ट्रेस और हल्द्वानी से वास्ता रखने वाली सुनिता रजवार ने निभाया है। फ़िल्म की कहानी पगली माई का डर ख़त्म करने और नफ़रत को प्यार में बदलने की बात करती है।

देवभूमि: द लैंड ऑफ गॉड्स

देवभूमि: द लैंड ऑफ गॉड्स

देवभूमि लैंड ऑफ गॉड्स
ये फिल्म कई मायनों में खास है। ये पहली ऐसी इंटरनेशनल फिल्म है जो शत-प्रतिशत उत्तराखंड पर बनी हुई है। इस फिल्म को ख्याति प्राप्त और सर्बिया मूल के डायरेक्टर गोरान पास्कलजेविक ने बनाया है। इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में काफी सराहा गया और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। 

फिल्म विदेश से सालों बाद गांव लौटे राहुल यानि विक्टर बनर्जी के बारे में है,  जो जीवन के आखिरी पड़ाव में गांव लौटा है। इस फिल्म को आप अमेजन प्राइम पर देख सकते हैं। यूट्यूब पर भी उपलब्ध है।

 

मोती बाग

मोती बाग

मोतीबाग
अब बात करते हैं उस फ़िल्म की जिसने न सिर्फ़ उत्तराखंड का बल्कि देश का नाम भी रोशन किया है। मोतीबाग। उत्तराखंड के किसान पर बनी डॉक्युमेंट्री मोतीबाग को भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया। मोतीबाग पौड़ी गढ़वाल के 83 साल के किसान की कहानी है। जिसने 32 साल पहले सरकारी नौकरी छोड़कर अपने गांव बसने का फैसला किया।

वो भी ऐसे वक्त में जब सब शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। विद्यादत्त शर्मा ने खंडहर होते मकानों और बंजर होते खेतों के बीच एक मोती बाग बनाया है, जिसे वह हमेशा हराभरा रखते हैं। इस डॉक्युमेंट्री में विद्यादत्त के संघर्ष और सफलता की कहानी है। 

ये हैं कुछ उम्दा फ़िल्में जिनमें आपको उत्तराखंड बिना किसी फ़िल्टर के नज़र आता है। साफ-सुतरा पहाड़ीपन।

वीडियो देखें

वायरल हो रहे #BINOD का उत्तराखंड कनेक्शन जानिए

इंटरनेट पर एक शब्द काफ़ी वायरल हो रहा है। शब्द है- बिनोद। आप यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, गूगल जहां पर भी जाएं, सिर्फ़ बिनोद की बात हो रही है। बात दुख की हो या फिर सुख की, हर जगह बिनोद ही कमेंट में नज़र आ रहा है। खैर, इस शब्द के वायरल होने की जो वजह है, उसे हम आपको बताएँगे। इसके साथ ही आपको उत्तराखंड से इसका जो कनेक्शन है, उसके बारे में भी बताएँगे। बिनोद के बहाने हम आपको उन लोगों के बारे में भी बताना चाहते हैं जिनके बारे में आप शायद कम ही जानते हैं। 

क्यों वायरल हो रहा हैबिनोद’?
एक यूट्यूब चैनल है-स्ले प्वाइंट। ये चैनल रोस्ट वीडियोज बनाता है यानि दूसरों के कमेंट्स और हरकतों पर कमेंट करते हैं। क़रीब 3 हफ़्ते पहले इन्होंने एक वीडियो बनाया। जिसमें इन्होंने दूसरों के कमेंट्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी। इसी वीडियो में मिला ‘बिनोद’। 

एक शख़्स हैं बिनोद थारू नाम के। बिनोद थारू ने कमेंट सेक्शन में सिर्फ़ ‘बिनोद’ लिखकर छोड़ दिया। और इस वीडियो के बाद ट्रोलर्स ने ‘बिनोद’ को हर चीज का पर्याय बना दिया। ये शब्द हर जगह वायरल हो गया। 

कौन हैं बिनोद थारू?
जब शब्द वायरल हुआ तो कई यूट्यूब चैनल इस नाम से बन गए। इस बीच एक शख़्स सामने आए। जिनका नाम है-प्रीत कुमार। इनका दावा है कि ये ही बिनोद थारु हैं। इन्होंने तर्क दिया कि इनका घर का नाम बिनोद है। और इन्होंने सिर्फ़ फनी दिखने के लिए अपने नाम के आगे ‘थारू’ शब्द का इस्तेमाल किया। लेकिन इनकी बात में पूरा सच नहीं है। और जो सच है, वही हमें उत्तराखंड लेकर आता है। 

बिनोद का उत्तराखंड कनेक्शन
इस बारे में बताने से पहले हम आपसे कह दें कि हम ये कहीं भी नहीं कह रहे कि कमेंट करने वाले जो बिनोद है, वो शख़्स उत्तराखंड के होंगे। हम सिर्फ़ बिनोद के बहाने आपको उत्तराखंड के कुछ खूबसूरत लोगों से मिलवाना चाहते हैं। 

तो जिस कमेंट के बाद ‘बिनोद’ शब्द वायरल हुआ है। उसे कमेंट करने वाले हैं बिनोद थारु। अगर आप पहाड़ी भाषाएँ बोलते होंगे तो आपको पता होगा कि पहाड़ी भाषाओं में विनोद को बिनोद ही कहा जाता है। ये तो हुई एक बात। लेकिन बिनोद का जो सरनेम है, वो है थारु। 

थारु उत्तराखंड की सबसे बड़ी जनसंख्या वाली जनजाति है। उत्तराखंड में थारु भाषा बोली जाती है। हालांकि अब इस भाषा में बात करने वालों की संख्या बहुत ही कम है। नेपाल और उत्तराखंड की सीमावर्ती इलाक़ों में इस जनजाति के लोगों का बसेरा मिलता है। 

2019 में सरकार की तरफ़ से की गई एक रिसर्च के मुताबिक़ थारू जनजाति उत्तराखंड की मूल जाति बोक्सा के ही वंशज हैं। हालाँकि कुछ इतिहासकारों की मानें तो ये महाराणा प्रताप के वंशज के लोग हैं जो आक्रांताओं से बचने के लिए पहाड़ की तरफ़ आ गए थे। और ये राजस्थान के थार के रहने वाले थे, इसलिए इनका सरनेम थारु पड़ गया। 

अलग हैं रीतिरिवाज
थारु जनजाति वैसे तो उत्तराखंड के अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल में भी बड़ी संख्या में होती है। नेपाल में इन्हें आधिकारिक नागरिकता भी हासिल है। थारु जनजाति के रीति-रिवाज भी काफ़ी अलग होते हैं। ये दीपावली को शोक पर्व के तौर पर मनाते हैं और होली पर क़रीब 8 दिन का कार्यक्रम होता है। और इस दौरान खिचड़ी नृत्य किया जाता है।

 उत्तराखंड में 5 प्रमुख जनजाति समूह हैं। इसमें थारू, जौनसारी, भोटिया, बोक्सा और राज़ी शामिल हैं। वायरल हो रहे ये बिनोद थारु चाहे जो हों, लेकिन बिनोद के बहाने थोड़ा सा जनरल नॉलेज लेने में क्या बुराई है।

सोनू निगम की ये बात हर प्रवासी मान जाए तो बदल जाएगी उत्तराखंड की सूरत!

कोरोना की महामारी ने पूरी दुनिया को जैसे रोक सा दिया है। अपने घरदेश छोड़ कर परदेश आए प्रवासी अब अपने घरों को लौट रहे हैं। इस मामले में उत्तराखंड भी अछूता नहीं है। घर लौटे इन प्रवासियों के लिए बॉलीवुड सिंगर सोनू निगम ने एक बहुत ही अहम संदेश भेजा है। 

सोनू निगम ने एक वीडियो जारी कर उत्तराखंड को लेकर बात की है। उन्होंने इस वीडियो में उत्तराखंड की सबसे गंभीर समस्या पलायन पर शोक जताया। लेकिन इससे भी ज़रूरी वो बात है जो उन्होंने घर लौटे प्रवासियों के लिए कही है। 

सोनू निगम ने अपने इस वीडियो संदेश में कहा है कि कई प्रवासी अपने घऱदेश वापस लौट चुके हैं। कई और लौट भी रहे हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड ने पलायन की मार झेली है। ऐसे में अब जो लोग वापस आए हैं, उन्हें स्वरोज़गार शुरू करने पर फ़ोकस करना चाहिए।

सोनू निगम ने सुझाव दिया कि प्रवासी स्वरोज़गार करें। अपने गाँव और अपने परिवार के पास रहें। स्वरोज़गार कर अपने उत्तराखंड का विकास करें

सोनू ने पहाड़ों में काम करने वाली संस्था हंस फ़ाउंडेशन का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि हंस फ़ाउंडेशन और संजय दरमोड़ा जी लगातार यहाँ काम कर रहे हैं। और ये लोग आपके लिए खड़े हैं। उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करता हूँ कि आप इनकी मदद पा सकें। सोनू ने सबकी खुशामदी की दुवाएं कर वीडियो ख़त्म किया। 

उत्तराखंड से सोनू का गहरा नाता
ऐसा पहली बार नहीं है जब सोनू निगम का उत्तराखंड के प्रति प्रेम उमड़ा हो। बता दें कि सोनू निगम का उत्तराखंड से गहरा कनेक्शन है। उनकी माँ का मायका रुद्रप्रयाग में धारी देवी के नज़दीक स्थित ठामक गाँव है। सोनू ने कई गढ़वाली फ़िल्मों में भी अपनी आवाज़ दी है। 

सिर्फ़ यही नहीं, नंदा गीतांजली एल्बम में उन्होंने माँ नंदा को समर्पित एक गीत भी गाया था। सोनू ने एक बार कहा था कि जितना प्यार वह अपनी माँ से करते हैं, उतना ही प्यार उन्हें उत्तराखंड से है। सोनू निगम को अपने ननिहाल के अलावा ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा आरती देखना काफी पसंद है। 

सुनिए सोनू का वीडियो मैसेज

 

 

बॉलीवुड गाने का आ रहा पहाड़ी वर्जन, रैपर बादशाह मचाएंगे धमाल

आजतक आपने बॉलीवुड फ़िल्मों में पहाड़ी गाने बजे हैं, ये सुना होगा और देखा भी होगा। बेडु पाको बारामासा, कैले बाज़ी मुरुली और ताछुमा-ताछुमा समेत कई ऐसे गीत हैं जो बॉलीवुड फ़िल्मों में या फिर एलबमों में इस्तेमाल किए गए हैं। लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है जब बॉलीवुड किसी फ़ेमस हिंदी गाने का पहाड़ी वर्जन लेकर आ रहा है। और इस पहाड़ी वर्जन में आपको दिखेंगे रैपर बादशाह और उत्तराखंड के भी कुछ कलाकार। कौन-सा है ये गाना? क्या ख़ास होगा इस गाने में? और कब आप सुन पाएँगे इसे? सब जानकारी मिलेगी आपको आगे. 

रैपर बादशाह का नाम तो आपने सुना ही होगा। अगर आप बादशाह को सुनना पसंद करते हैं तो आपने उनका गाना ‘गेंदा फूल’ भी सुना होगा। कुछ दिन पहले ही आए इस गाने का पहाड़ी वर्जन बनकर तैयार है। इस पहाड़ी वर्जन को सोनी म्यूज़िक लॉन्च कर रहा है। गेंदा फूल के पहाड़ी वर्जन में उत्तराखंड की प्रियंका मेहर और उनके ही साथी रैपर रोंगपा यानि मयंक रावत भी शामिल होंगे। 

इस बार आपको गेंदा फूल में गढ़वाली भाषा के लिरिक्स सुनाई देंगे। गाने के बोल तो जो ओरिजनल गाने के हैं, वही रहेंगे। म्यूज़िक भी ओरिजनल है। लेकिन भाषा गढ़वाली होगी। सिर्फ़ यही नहीं, गाने में आपको बादशाह का रैप भी सुनाई देगा।

कब आएगा गाना?
गाने की शूटिंग पूरी हो चुकी है। शूटिंग भी देहरादून में ही हुई है। 13 जुलाई 2020 यानि कल ये गाना रिलीज़ होगा। ऑरिजिनल गाने में आपने जैकलीन फ़र्नांडीज़ का डांस देखा लेकिन इस गाने में आपको बादशाह के साथ प्रियंका और मयंक रावत नज़र आएंगे। 

पहले भी पहाड़ी गाने में रैप कर चुके हैं बादशाह
ये पहली बार नहीं है जब बादशाह किसी पहाड़ी गाने में रैप करेंगे। इससे पहले उन्होंने जुबिन नौटियाल का पहाड़ी गाने में साथ दिया था। जुबिन ने कोक स्टूडियो में जौनसारी गीत- ‘ओ साथी-ओ साथी’ गाया था तो उसमें भी बादशाह ने रैप किया था।

सिर्फ़ यही नहीं, बादशाह को पहाड़ी गानों से बहुत लगाव है। उत्तराखंड के ही RJ राज जोन्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने पहले ही जानकारी दे दी थी कि वह एक पहाड़ी गाने में काम करने वाले हैं। 

बॉलीवुड के ऐसे ही लोगों की वजह से हमारी उत्तराखंड की पहचान बनेगी। शायद ऐसे ही लोगों की बदौलत हमारा उत्तराखंडी सिनेमा भी दूसरे सिनेमाओं की तरह बेहतर कर पाएगा। बॉलीवुड में जमे हमारे उत्तराखंडी कलाकारों को भी शायद एक रास्ता दिखाएगा कि जब बादशाह कर सकते हैं तो आप लोग क्याों नहीं? 

अशोक मल्ल: वो एक्टर जो पहले किसान फिर सबकुछ था

1987 में जब पहली कुमाऊँनी फ़िल्म मेघा आ रिलीज़ हुई तो एक डायलॉग सबकी जुबां पर था। ‘गंगुवा की खुकुरी दुधारी भै, दुधारी’। जिन्होंने इस डायलॉग को फ़िल्म के विलन के मुँह से सुना, उन्हें आज भी ये डायलॉग याद है। इसे अमर करने वाले थे- अभिनेता अशोक मल्ल।

अशोक मल्ल एक अभिनेता से पहले किसान थे और वो ख़ुद ये ज़ाहिर किया करते थे। वो अपनी जड़ों की खोज में भी जुटे थे लेकिन उससे पहले  वो  हो गया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

अशोक मल्ल का निधन
8 जुलाई, 2020। सुबह के 5 बजकर 57 मिनट हो रहे थे। नवी मुंबई के साई स्नेहदीप हॉस्पिटल में उत्तराखंड का एक और चमकता सितारा बुझ गया। उत्तराखंड की दर्जनों फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाले अशोक मल्ल हमेशा के लिए चले गए।अशोक लंबे समय से बीमार थे। वह कैंसर की बीमारी सी पीड़ित थे।

पहले किसान फिर एक्टर थे अशोक
अशोक मल्ल ने मेघा आ, चक्रचाल, मेरी गंगा होली त् मैमु आली, कौथिग, बंटवारु समेत कई फ़िल्मों में अभिनय किया। अशोक जी ने गोपी भिना फ़िल्म का निर्देशन भी किया था। एक अभिनेता होने से पहले अशोक प्रकृति प्रेमी थे। मुंबई के कोलाबा में उनका अपना बोटैनिकल गार्डन है। सिर्फ़ यही नहीं अशोक को ख़ुद को किसान कहने में फक्र महसूस होता था। यही वजह है कि सोशल मीडिया में अपने परिचय में सबसे पहले वह किसान लिखते थे और फिर बाक़ी चीजें। 

अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे अशोक दा
अशोक दा वैसे तो पिथौरागढ़ के मूल निवासी थे। वह धपड़पट्टा, पुलिस लाइन के रहने वाले थे। पिथौरागढ़ के मिशन इंटर कॉलेज से 1978 में उन्होंने ग्रैजुएशन पूरा किया। लंबे समय से वह अपने परिवार के साथ मुंबई में ही रहते थे।

वो अपनी जड़ों की खोज में जुटे थे। पिछले साल से वो अपने वंशजों के मूल ठिकाने का पता लगाने में जुटे हुए थे। अपनी इस खोज में उन्हें पता चला कि वे नेपाल से उत्तराखंड आए थे। उनकी बड़बूबू ब्रिटिश आर्मी में थे। उनके बुबु का जन्म अल्मोड़ा के वार कैंप में हुआ था। उसके बाद उनकी परवरिश देवलथल के मल जमतड़ निवासी उनके रिश्तेदारों ने की थी। अशोक जमतड़ जाने की तैयारी में थे लेकिन तभी बीमारी ने उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया और वो अपनी जड़ तक पहुँचने से पहले ही चले गए। 

रहते मुंबई में थे, दिल उत्तराखंड में था
अशोक दा वैसे तो मुंबई में रहते थे लेकिन उनका दिल हमेशा उत्तराखंड में बसता था। गोपी बिना के प्रीमियर पर सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने उत्तराखंड को याद किया था। इस दौरान उन्होंने लोगों से अपनी बोली-भाषा याद रखने को कहा। उन्होंने कहा कि आप दुनिया के जिस भी कोने में रहें। जहां भी रहें। जो भी करें। आप चाहें दुनिया की कोई भी भाषा सीख लें लेकिन अपनी मातृ भाषा कभी न भूलें। क्योंकि वही हमारा मूल है।

उत्तराखंडी फ़िल्मों का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है। लेकिन जितना भी है, उसमें अशोक मल्ल जी की बहुत ही अहम भूमिका है। आज उत्तराखंडी फ़िल्मों की कल्पना उनके अभिनय के बिना करना संभव नहीं।

उम्मीद करते हैं कि भविष्य में हमारा सिनेमा भी भोजपुरी और दूसरे क्षेत्रीय सिनेमा की तरह आगे बढ़ेगा। अशोक मल्ल जैसे अभिनेताओं का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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