कोरोना वायरस से कैसे लड़ें? जानें- वायरस से ठीक हुए शख्स से

कोरोना को मैंने कैसे हराया? सभी लोग जानना चाहते हैं। इसलिए दवाई, उपचार, डर, भय सबपर थोड़े से विस्तार से लिख रहा हूं…. पढ़िए और शेयर कीजिये।

पूरी दुनिया में कोरोना ने जो तबाही मचाई है उसे देखकर सुनकर भारत में भी हर शख्स डरा हुआ है। सावधानी बरत रहा है लेकिन फिर भी सहमा हुआ है। उसे यही डर रहता है कि पता नहीं कब कहां से ये वायरस उड़कर आ जाएगा और गले पड़ जाएगा। उसका डर वाजिब भी है क्योंकि ये खांसने और छींकने से ही फैलता है।

किसी ने अपने हाथ पर खांस लिया है या छींक लिया है और आप उसके हाथ द्वारा छुए हुए सामान के सम्पर्क में आ गए तो ये वायरस आपके गले पड़ जाएगा। सीधे आपके मुंह पर खांस दिया है तब तो ये वायरस आपको छोड़ेगा ही नहीं। आपके शरीर में घुस जाएगा, बिन बुलाए मेहमान की तरह।

बाकी सरकारी अस्पताल, प्राइवेट अस्पताल की स्थिति की बारे में आप टीवी पर देख सुन रहे ही हैं। लगातार बढ़ते संक्रमण और मौत के आंकड़े देख भी डर ही रहे होंगे। बेड नहीं हैं। वेंटिलेटर नहीं हैं। बहुत कुछ नहीं है। ये सब सुनकर डर ही लगता है।

इसलिए इस वायरस को अपने अंदर से खत्म करने की कहानी इसके डर को खत्म करने से ही शुरू होती है। अब ह्यूमन नेचर है। डर के आगे कितनी भी जीत हो डरेगा तो है ही। मैं भी डर गया था। बुरी तरह डर गया था। अपने परिवार और ढाई साल के बेटे की तरफ देखकर घबरा गया था।

लेकिन दोस्तों ने साथियों ने और ‘टीवी9 भारतवर्ष’ के मेरे सीनियर्स ने और मेरे बॉस सन्त सर ने हिम्मत दी, हौसला बढ़ाया, कि बस डरना नहीं है। कोरोना की यही रीत है, डर के आगे जीत है। संस्थान ने खूब साथ दिया। सेहत को लेकर हर रोज अपडेट संस्थान द्वारा लिया गया। हर परेशानी में संस्थान साथ खड़ा है ये अहसास दिलाया। सभी का शुक्रिया।

दरअसल 21 मई को मैं ऑफिस में था। घर से ठीक ठाक गया था। लेकिन ऑफिस में अचानक से मेरे सिर में दर्द शुरू हुआ। मैं काम करता रहा, सिर का दर्द 1-2 घंटे बाद पूरे शरीर के दर्द में बदल गया। पूरे शरीर में दर्द शुरू हो गया। मैंने अपने दोस्त प्रदीप ठाकुर को ये बात बताई की मेरे पूरे शरीर में दर्द हो रहा है।

उसने तत्काल प्रभाव से मुझे दर्द की कोई टेबलेट मंगाकर दी। दवाई खाई तो कुछ मिनट के लिए आराम लग गया। इधर मेरी शिफ्ट भी खत्म हो गई। दर्द के साथ ही घर आ गया। लेकिन मैंने ऑफिस से ही घर फोन कर दिया था कि आज मेरी तबियत ठीक नहीं है, इसलिए सबलोग थोड़ा दूर ही रहना।

खैर, घर आया और पैरासिटामोल की एक टेबलेट लेकर सो गया। रात भर दर्द रहा। सुबह 4 बजे तक बुखार हो गया। बुखार भी 102। अपने दोस्त को फोन किया, वो सुबह 5-6 बजे ‘डोलो’ टेबलेट देकर गया। मुझे कुछ अंदेशा लगने लगा था इसलिए दोस्त को बोल दिया था की टेबलेट बाहर ही रखकर चला जाए। पास ना आए।

‘डोलो’ ली तो कुछ देर में बुखार उतर गया। लेकिन अगले दो दिन यही रूटीन रहा। बुखार आता, मैं दवाई लेता और वो भाग जाता। 24 तारीख तक यही चला। साथ में खांसी भी हो गई। खांसी बलगम वाली। इसलिए जो लोग कहते हैं कि बलगम वाली खांसी कोरोना का लक्षण नहीं है, ये एक मिथ है।

25 मई को ठीक होकर मैं फिर से अपने ऑफिस ‘टीवी9 भारतवर्ष’ पहुंच गया। 2 दिन बुरी तरह थकान रही। लगा बुखार में कई बार प्लेटलेट्स कम हो जाती हैं इसलिए 2 लीटर फ्रूटी पी गया। 28 मई को एक दो बार जबरदस्त खांसी हुई। 25 मई को भी एकबार जबरदस्त खांसी उठी। जैसे ‘खांसी’ का अटैक हो गया हो। क्योंकि 28 तारीख को बार बार खांसी आ रही थी तो मेरे दोस्तों, वरिष्ठों ने सुझाव दिया कि मुझे अपना कोविड टेस्ट कराना चाहिए।

अगले दिन सभी की बात मानकर मैं दिल्ली में अपोलो अस्पताल पहुंच गया। वहां उन्होंने कोविड के लिए अलग से दो तीन रूम बनाए हुए हैं। वहीं डॉ को सिम्पटम्स बताए, बुखार, खांसी और बाकी हिस्ट्री बताई। 4850 रुपये जमा किये। बिल बना। उन्होंने नाक और गले से सेम्पल लिया और मेरा टेस्ट हो गया। अगले दिन 30 मई को रिपोर्ट ईमेल पर आ गई। डिटेक्टेड। मतलब पॉजिटिव।

रिपोर्ट देखते ही लगा भयंकर वाला डर। भूकंप तो रोज आ ही रहे हैं, वो मेरा स्पेशल भूकंप था। जिसमें सिर्फ मैं हिला था। ऑफिस में बताया। बॉस का फोन आया, एचआर से फोन आया। स्थिति पूछी गयी। और पूछा गया कि हॉस्पिटल में रहना चाहोगे या घर। हमारे रिपोर्टर कुमार कुंदन का फोन आया, उन्होंने बहुत समझाया।

बाकी लोग जो पहले से हॉस्पिटल में थे उनका हाल चाल और हॉस्पिटल में इलाज की स्थिति का पता किया। तो आखिर में मेरे द्वारा ही ये तय किया गया कि घर में ही एक कमरे में बंद रहना है। और इलाज करना है।

कहानी लम्बी हो रही है इसलिए अब सीधे 14 दिन के ट्रीटमेंट पर आता हूं। 30 मई से ही मैंने काढ़ा पीना शुरू किया। नमक, हल्दी गर्म पानी में डालकर गरारे करने शुरू किए। दिन में 4-5 लीटर गर्म पानी पीना शुरू किया। और विटामिन की दवाई लेनी शुरू की। सबसे पहले सुबह उठकर कच्चे आंवला और गिलोय का जूस खाली पेट पीता था।

क्योंकि आंवले में विटामिन सी होता है। 3-4 दिन बाद आंवला पीना बन्द कर दिया क्योंकि वो खट्टा होता है और आयुर्वेद में ये कहा जाता है कि खट्टी चीजें खाने पीने से खांसी ठीक नहीं होती है। इसलिए आवंला बन्द कर गिलोय पीता रहा। इसके बाद काढ़ा पीता था। 3-4 दिन बाद ही दूध भी पीना बन्द कर दिया। क्योंकि बलगम वाली खांसी में दूध परेशान ही करता है। ऐसा सब लोग कहते हैं। क्योंकि मेरी पत्नी को भी वही सिम्पटम्स हो गए थे जो मुझे थे इसलिए उसका ट्रीटमेंट भी बिना टेस्ट कराए ही शुरू कर दिया। इसलिए दो लोगों का काढ़ा बनता था।

-काढ़ा बनाने की विधि-
लोंग 7
इलायची हरी 4
काली मिर्च गोल 7-8
दालचीनी 3-4 टुकड़े
सौंठ 1 चम्मच
मुनक्का 4

इनको 2 गिलास पानी में उबालें, जब एक गिलास पानी बच जाए तो दो व्यक्तियों को आधा-आधा पीना है तीन टाइम, सुबह दोपहर शाम, खाना खाने के बाद, सुबह नाश्ते के बाद। और अगर एक ही व्यक्ति के लिए काढ़ा बनाना है तो एक गिलास पानी में बाकी सामान आधा डाल लें। जब वो पानी पक कर आधा गिलास रह जाए तो उसे छानकर पी लें। ऐसा दिन में कम से कम तीन बार करें।

दिन में कम से कम तीन बार ही गरारे करता था। सुबह, दोपहर और शाम। खाना खाने के थोड़ी देर बाद कर सकते हैं। एक गिलास पानी को गर्म करके उसमें थोड़ा सफेद नमक और आधा चम्मच हल्दी डालकर गरारे करता था। ये बेहद जरूरी है। रोज सुबह गर्म पानी से ही नहाता था और नहाने के बाद 15-20 मिनट छत पर जाकर धूप में बैठता था क्योंकि कोरोना से लड़ने के लिए इम्युनिटी का मजबूत होना जरूरी है।

मैंने तुलसी अर्क मंगाया था। एक गिलास गर्म पानी में दिन में 8-10 बूंदे डालकर पीता था, दिन में सिर्फ एक बार। गर्म पानी में हल्दी डालकर भी पी है। हर बार गर्म ही पानी पिया है।

Zincovit की टेबलेट ली थी। एक दिन में सिर्फ एक गोली, दोपहर में खाने के बाद।

Limcee Vitamin C Chewable ली थी। सुबह शाम एक-एक टेबलेट।

कोरोना का संक्रमण नाक में भी होता है इसलिए सुबह शाम पानी में अजवाइन डालकर भाप लेता था। कुछ ड्राई फ्रूट्स भी खाए हैं। जैसे बादाम और किशमिश। फलों में रोज एक सेब खाया है, गर्म पानी में धोकर और थोड़ा बहुत पपीता। अपने बर्तन खुद साफ किये हैं। कपड़े खुद धोए हैं। हर रोज सेनेटाइजर से कमरे की सफाई करता था। जो कुछ भी लिखा है ये सभी कुछ जरूरी और बेहद जरूरी है।

घर में भी मास्क लगाकर रहना जरूरी है। बार बार साबुन से हाथ धोना जरूरी है। इन सब चीजों की वजह से कोरोना से लड़ाई में जीत मिली है। मुझे ही नहीं मेरे कई साथियों को जीत मिली है।

कुछ लोग इस बात को लेकर आशंकित रहते हैं कि अगर उन्हें कोरोना हो जाए तो तुरंत अस्पताल की तरफ भागना चाहिए या नहीं। देखिए मैं कोई डॉक्टर नहीं हूं, कोई स्पष्ट राय आपको नहीं दे सकता। लेकिन अनुभव के आधार पर कह रहा हूं अगर आपको गम्भीर बीमारियां हैं। किडनी की। फेफड़ों की। सांस की। तो आपको अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए, क्योंकि अगर इस वायरस से आपको सांस की ज्यादा दिक्कत हुई तो अस्पताल के चक्कर और बेड तलाशते हुए ही शायद आपका बहुत कुछ पीछे छूट जाएगा, इसलिए एहतियातन आपका शुरू से अस्पताल में रहना जरूरी है।

मुझे ऐसा लगता है। बाकी अगर आप स्वस्थ हैं। कोई परेशानी नहीं है। पुरानी गम्भीर बीमारी नहीं है तो घर में रहकर इस बीमारी का इलाज संभव है।

इस बीमारी ने मुझे काफी परेशान भी किया। 2-3 दिन जबड़े में दर्द रहा। खाना चबाने में परेशानी होती थी। और सबसे बड़ा दुख ये भी था कि मुझे अपने बेटे KT से 14 दिन तक अलग रहना पड़ा। ये बीमारी किसी को बताने वाली भी नहीं है। लोग दहशत मानते हैं। मेरे अडोस पड़ोस में भी लोगों में दहशत थी। मुझको लेकर कई तरह की अफवाहों को बल दिया गया। खैर, लोगों के अपने डर हैं। जिसने डरना है डरे, हमें तो अपना काम करना है।

अपने स्वास्थ्य और परिवार के बारे में सोचना है। कुछ खास दोस्तों को छोड़ दें तो कोई अड़ोसी पड़ोसी रिश्तेदार आपके बारे में सोचने नहीं आएगा। हां अड़ोसी पड़ोसी डर के मारे पुलिस बुला सकते हैं कि भई हमारे यहां ये कोरोना का मरीज है इसे ले जाओ। ये समाज ही ऐसा है। आप किसी को कितना भी समझाने जाएं, बताएं, लोग नहीं समझते। करते सब अपने मन की ही हैं। इस मुश्किल वक्त में मेरे दोस्त सौरभ त्यागी ने बहुत साथ दिया। हर जरूरत का सामान मुझे घर पहुंचाता रहा। रोज मेरा हौसला मेरे दोस्त प्रदीप ठाकुर ने बढ़ाया। हिम्मत दी।

अब इस पोस्ट की सबसे जरूरी और आखिरी बात, ये एक तरह का डिस्क्लेमर ही है।

मैं कोई आयुर्वेदाचार्य या कोई डॉक्टर नहीं हूं। मुझे भी इस तरह के ट्रीटमेंट की जानकारी अपने दोस्तों और वरिष्ठों से मिली थी। मैंने इसे अपने ऊपर आजमाया था। ये मेरा फैसला था।

अगर आप को इस तरह की कोई परेशानी होती है तो एक बार अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें। अपनी हेल्थ स्थिति को मद्देनजर रखकर ही किसी भी चीज का सेवन करें। मैं इस पोस्ट को लिखने से डर रहा था। कहीं किसी का कुछ नुकसान ना हो जाए। इसलिए बिना किसी डॉक्टर की सलाह के कुछ ना करें।

अपनी सेहत के हिसाब से चीजों का इस्तेमाल करें। बाकी महाकाल बाबा सबका भला करेंगे। देश इस वायरस पर जल्द पूरी तरह फतह हासिल करेगा। मास्क लगाकर रखें। दूरी बनाकर रखें। हाथ धोते रहें।

(ये पोस्ट TV9 भारतवर्ष के पत्रकार श्याम त्यागी के वाल से लिया गया है। इस पोस्ट में श्याम जी ने अपना अनुभव साझा किया है)

हथिनी के साथ जो हुआ, वो आपके मनोरंजन की प्रवृत्ति का परिणाम है!

केरल में एक गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरकर अनानास खिला दिया गया। वो हथिनी नदी में खड़ी रही और खड़े-खड़े उसके प्राण चले गए। जिन उपद्रवियों ने ये किया, वो इंसान के तौर पर उसके दर्द को महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि हथिनी हमारी ज़ुबान नहीं बोलती। उसे आंसुओं के ज़रिये अपना दुख बताना नहीं आता। वो नहीं चिल्ला सकी कि उसे तकलीफ़ हो रही है और उसे बचाया जाए।

अब हम सब लोग शर्मिंदा हैं। उस हथिनी के लिए इंसाफ़ चाहते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आज जो घटना उस हथिनी के साथ हुई है। इसके बीज हम बचपन से ही अपने अंदर बो रहे हैं। कभी हंसी-मजाक के लिए तो कभी ग़ुस्सा निकालने के लिए हम सड़क पर सो रहे उस कुत्ते को लात मारने से गुरेज़ नहीं करते।

हम में से कइयों के लिए कुत्तों को, बिल्लियों को लात मारना, उनके कान खींचकर, उनका मुँह दबाकर उन्हें परेशान करना, मस्ती कहलाता है। कई बार हम अपने बच्चों को भी ये सब दिखाते हैं।  जब हम अपने बच्चों को ये दिखा रहे होते हैं, उस समय भले ही वो हंस पड़ते हैं। लेकिन आप ये महसूस नहीं करते कि आप उनके अंदर एक सबक़ डाल रहे हैं। सबक़ कि कुत्तों-बिल्लियों के साथ ऐसा मज़ाक़ किया जा सकता है।

कुत्तों-बिल्लियों या फिर अन्य किसी जानवर को परेशान करना भी एक शग़ल है। ये विद्या हम में से कई लोग बचपन से ही सिखाते आ रहे हैं। 

बेजुबानों को मारना आसान होता है। आसान इसलिए क्योंकि वो आपकी कोर्ट में जाकर गवाही नहीं दे सकते। वो आपकी मार खाकर सड़क से भागकर कहीं और चले जाएंगे। उनकी जितनी आवाज़ है, उसके दम पर रो जाएँगे। लेकिन आपको कुछ नहीं कर पाएंगे। 

हथिनी के साथ हुई घटना एक सबक़ है कि हम अपने बच्चों में जानवरों की इज़्ज़त करने का एक बीज बोएं। किसी कुत्ते को लात मारना शग़ल नहीं है बल्कि आप उसे तकलीफ़ दे रहे हो। किसी बिल्ली की पूँछ खींचकर उसे घुमाना शग़ल नहीं है। आपकी ये हरकत उसे दर्द देती है। 

इंसानों को सिर्फ़ इंसानों के लिए इंसानियत ना सिखाएँ,  बल्कि धरती के हर प्राणी के लिए इंसान के मन में इंसानियत होना ज़रूरी है। वरना इंसानियत और हैवानियत में ज़्यादा फ़र्क़ नज़र नहीं आएगा। 

PM मोदी, रजनीकांत, दुनिया के 5 शक्तिशाली लोग जिनका देवभूमि से खास नाता

दुनिया के 5 शक्तिशाली लोग और उनकी सफलता का एक ही राज- उत्तराखंड! एक वो है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधान है। एक वो है जो देश का सबसे अमीर शख़्स है। एक ने पूरी दुनिया को वर्चुअल वर्ल्ड में मिलाने का इंतजाम किया। एक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक का मालिक है। एक वो है, जिसे लाखों लोग भगवान की तरह पूजते हैं।

एक तरफ जहां रिया मावी जैसे लोग केदारनाथ जैसे धामों को लेकर जो चाहे बोल जाते हैं तो दूसरी तरफ ये धाम दुनिया के शक्तिशाली लोगों की आस्था का अहम बिंदु हैं।

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 में जब फिर प्रधानमंत्री बने तो वह केदारनाथ की शरण में जाना नहीं भूले। ये पहली बार नहीं है कि पीएम मोदी केदार बाबा की दर पर गए हों। उनका केदारबाबा से रिश्ता 1985 से ही है। वह यहां पर तकरीबन 5 साल तक सन्यासी बने रहे। और तब से लेकर अभी तक, जब भी वह जीवन में कुछ बड़ी सफलता हासिल करते हैं तो वह बाबा केदार के दर्शन के लिए जरूर जाते हैं। 

मुकेश अंबानी
पीएम मोदी के अलावा बाबा केदार और बद्रीनाथ के भक्त देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी भी हैं। अंबानी अपने जीवन में कोई भी अहम काम शुरू करने से पहले बाबा केदार के दर्शन करने के लिए जरूर पहुंचते हैं। पिछले साल जब उनके बड़े बेटे की शादी थी तो सबसे पहला कार्ड उन्होंने बाबा केदार को दिया।

मुकेश अंबानी हर साल परिवार के साथ बाबा केदार के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मुकेश भी अपने जीवन के सबसे अहम काम को करने से पहले बाबा केदार के दर्शन के लिए जरूर पहुंचते हैं। मुकेश ने बाबा केदार और बद्रीनाथ के लिए काफी ज्यादा दान दिया है।

स्टीव जॉब्स
आधे खाए सेब के लोगो से लगभग सभी लोग वाकिफ होंगे। ऐसे में स्टीव जॉब्स को भी लोग जानते होंगे। नाम है स्टीव जॉब्स। ऐपल की शुरुआत करने से पहले स्टीव जॉब्स संन्यासी बनने की ख्वाहिश से उत्तराखंड आए थे। यहां वह नीम करोली बाबा की शरण में आए। नीम करोली बाबा ने उन्हें वापस भेजकर वो करने को कहा जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद है। इस तरह स्टीव वापस अमेरिका आए और उन्होंने ऐपल की शुरुआत की। 

 मार्क जुकरबर्ग
दुनिया के अरबों लोग हर दिन फेसबुक पर एक घंटा बिताते हैं। इससे फेसबुक हर दिन अरबों रुपये की कमाई करता है। लेकिन मार्क के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्होंने फेसबुक को बंद करने की ठान ली थी। वो वक्त था 2007-08 का।

इस दौरान स्टीव जॉब्स ने मार्क को नीम करोली बाबा की शरण में जाने को कहा। मार्क कैंची धाम आश्रम आए। उन्होंने यहां ध्यान लगाया। नीम करोली बाबा के प्रवचन सुने। और उसके बाद जब उन्होंने वापसी की तो फेसबुक को उन्होंने नये मुकाम पर पहुंचाया। मार्क इसका श्रेय नीम करोली बाबा को देना नहीं भूलते।

रजनीकांत
रजनीकांत हर साल अल्मोड़ा जाते हैं। वो जीवन का हर जरूरी काम करने से पहले यहां दस्तक देते हैं। वह हर साल महावतार बाबा के दर्शन के लिए यहां आते हैं। महाअवतार बाबा से उनकी पहचान उनके दो कारोबारी दोस्तों ने कराई। रजनीकांत को बाबा के दर्शन के बाद काफी फायदे हुए। तब से रजनीकांत कोशिश करते हैं कि वो हर साल यहां आएं और जीवन के हर जरूरी काम को करने से पहले वह महाअवतार बाबा का आशिर्वाद जरूर लेते हैं। 

तो ये हैं वो 5 शख्स जिन्हें उत्तराखंड की धरती ने न सिर्फ आस्था का केंद्र दिया। बल्कि उन लोगों से भी मिलाया, जिन्होंने इन्हें जिंदगी में सही राह दिखाई। इन लोगों ने सफलता के नये मुकाम छुए।

रिया मावी जैसे लोग चाहे कुछ भी कहें। इनके कहने से हमारे धामों की आभा और उनमें हमारी आस्था कभी कम नहीं हो सकती।

वीडियो देखें

 

रिया मावी जी, सोच समझकर बोलतीं तो ज्यादा अच्छा होता

रिया मावी। आपने इन्हें यूट्यूबर अमित भडाना के वीडियोज में देखा होगा। अब ये खुद का यूट्यूब चैनल चलाती हैं। आजकल इसी की वजह से ये उत्तराखंड में चर्चा में हैं।  चर्चा की जो वजह है वो शायद बाबा केदार के हर भक्त के दिल पर चोट करने वाली है। दरअसल रिया ने केदार धाम में बैठकर ही केदार धाम को लेकर कुछ कमेंट्स किए हैं, जिनके लिए रिया और उनकी दोस्तों को माफी मांगनी चाहिए। हम ऐसा कह रहे हैं क्योंकि इसका एक बहुत बड़ा आधार है। रिया के हर कमेंट का जवाब आगे हम दे रहे हैं।

क्या है माजरा?
करीब दो हफ्ते पहले रिया मावी ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला- ट्रैक टू केदारनाथ। इसमें रिया और उनकी दो सहेलियां केदारनाथ धाम तक ट्रैकिंग करने के अपने सफर पर बात करती हैं। लेकिन इस दौरान रिया और उनकी सहेलियां कुछ ऐसी बातें बोल जाती हैं जो उत्तराखंडियों को ही नहीं, बल्कि बाबा केदार के भक्तों को भी नागवार गुजर रही है।

क्या बोला गया?
ये बात है जब रिया और उनकी सहेलियां बाबा केदार का दर्शन कर एक जगह बैठी हैं। वहां पर अपना-अपना एक्सपीरिएंस शेयर कर रही हैं। इन तीनों का जो सबसे पहला रिएक्शन आता है, वो होता है कि ये लोग बाबा केदार के धाम पहुंचकर डिसप्वाइंट हो गए हैं यानि निराश हो गए हैं।

तो मौतरमा जी…सुन लीजिए
 आपको निराश होना ही था। क्योंकि आपने बिना कुछ जाने और समझे ऐसी बातें बोली हैं, जिनके बारे में आपको कुछ भी पता नहीं।

पहली बात
रिया मावी की पहली सहेली कहती हैं कि इन्हें केदारनाथ धाम आकर इतनी शर्मिंदगी हो रही है कि जितनी उन्हें अभी तक अपनी जिंदगी में नहीं हुई। इसका कारण वो बताती हैं कि पंडित बिना पैसे के टीका भी नहीं लगाते। लेकिन दूसरे ही पल रिया खुद कहती हैं कि मैंने जब पंडित को टीका लगाने के लिए बोल तब उसने टीका लगाया। यहीं पर रिया अपनी सहेली को जवाब दे दिया। लेकिन इनकी निराशा शायद इन्हें जवाब देखने नहीं दे रही थी।

तो सुनिए मौतरमा…
अगर आपको बड़े-बड़े मंदिरों में जाने का अनुभव होगा तो आपको पता होगा कि बड़े मंदिरों में हमेशा भीड़ होती है। वो पंडित भी इंसान है। उसके हाथ भी थकते हैं तो हो सकता है कि आपकी दोस्त को वो टीका लगाना भूल गया होगा। लेकिन आपकी दोस्त का ईगो आड़े आ गया और उन्होंने उसे पूछना भी लाजिमी नहीं समझा। और आरोप लगा दिया कि बिना पैसे लिए वो टीका भी नहीं लगाते। इसका जवाब आपने खुद ही दिया है। जब वो पंडित आपके कहने पर आपको टीका लगा सकता है… वो भी बिना पैसे लिए तो फिर आपकी दोस्त ऐसी जाहिल बात क्यों कर रही हैं? जरा पूछिएगा।

दूसरी बात
रिया आगे कहती हैं कि पंडित जी यूट्यूब पर वीडियोज देख रहे हैं।

तो सुनिए मौतरमा…
पंडित जी यूट्यूब पर वीडियो देख रहे थे क्योंकि वो भी इसी सदी के इंसान हैं। उनके पास भी मोबाइल है, इंटरनेट है। अपने फोन पर उन्हें कुछ भी देखने की वो आजादी है जो आजादी आपको बिना सोच-समझकर बोलने की ताकत देती है। पंडित जी अगर मंदिर भवन में बैठकर यूट्यूब देख भी रहे थे तो क्या उन्होंने कोई पाप कर दिया है? अगर आपके मुताबिक हां है तो फिर मंदिर परिसर में बेफिजूल बातें करना भी पाप ही हुआ ना?

तीसरी बातभगवान का कमर्शिलाइजेशन
रिया जी की दूसरी जो दोस्त हैं। इनका कहना है कि ये बेचारे 16 किलोमीटर ट्रैक कर केदारनाथ धाम पहुंचे। और यहां हर पूजा के लिए पैसे लिए जा रहे हैं।

तो सुनिए मौतरमा…
केदारनाथ धाम आपको पूजा के लिए पैसे देने की खातिर मजबूर नहीं करता। पूजा के जिन रेट्स की आप बात कर रही हैं। वो उत्तराखंड सरकार ने वेबसाइट पर भी लिस्ट किया है। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है कि जो किसी से छुपा है। मावी जी शायद आपको पता न हो लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यहां पूजा करने के लिए 6000 रुपये की रसीद फड़वाई है।

और जानती हैं क्यों प्रधानमंत्री ने रसीद फड़वाई?… क्योंकि यहां पर पूजा-पाठ के काम से जुटे पंडित आपकी तरह दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में नहीं रहते। हर महीने उनके अकाउंट में लाखों रुपये नहीं आते। इन लोगों की आजीविका का एकमात्र साधन है, यहां पूजा-पाठ करवाने वाले श्रद्धालु और उनकी तरफ से दी जाने वाली दक्षिणा। या फिर आपकी भाषा में कहें -चार्ज।

बाबा केदार धाम में जो रखरखाव आपने देखा। उसे भी करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। और वो पैसा पूजा और डोनेशन के जरिये ही आता है। तो रिया जी जब आप शहर के लोग नाइट क्लबों में जाने के लिए हजारों रुपये खर्च करने से नहीं हिचकते तो भगवान के नाम पर कुछ पैसे खर्च करने में आपको इतनी पीड़ा क्यों?

चौथी बात
रिया की दोस्त कहती हैं कि यहां पूजा की एक थाली 500 तो कोई 1100 की है।

तो मौतरमा सुनिए….
पहले तो आपको खुद पता नहीं है कि उन थालियों में क्या-क्या मिलता है? (ये आप खुद कह रही हैं)। चलो मान भी लें कि आपके हिसाब से उन थालियों में वो सब मिलता है, जो आपके मुताबिक 50 रुपये में भी खरीदने के लायक नहीं है।

तो आपको बता दें कि जहां आप सिर्फ 16 किलोमीटर चलने में थक कर चूर हो गईं। वहीं ये लोग कई किलोमीटर पैदल चलकर सामान यहां तक पहुंचाते हैं। ऐसे में उसको यहां तक पहुंचाने का खर्च काफी ज्यादा बढ़ जाता है। सिर्फ यही नहीं, पहाड़ के उन दूर-दराज क्षेत्रों के फूल और धूप थालियों में शामिल किए जाते हैं जिन्हें लाने के लिए आपको कई पहाड़ों की चढ़ाई करनी पड़ती है। और जिन पहाड़ों को सिर्फ देखकर ही आपके पसीने छूट जाएं।

पांचवीं बात
वीडियो के अंत में ये तीनों लड़कियां काफी कुछ बोलती हैं। एक बोलती हैं कि पंडितों राज्यों के हिसाब से बंटे हैं। क्योंकि सबको पैसा चाहिए। भगवान को बेच दिया है। तमाशा हो रहा है।

तो सुनिए मौतरमाओं…
सही कहा आपने पंडित राज्यों के हिसाब से बंटे हैं क्योंकि सबको पैसा चाहिए। जैसे आपको चाहिए। वैसे उनको भी चाहिए जीवनयापन के लिए। एक पंडित पूजा के माध्यम से ही पैसा कमाता है। अलग-अलग राज्य तय करने से हितों का टकराव नहीं होता… ये थोड़ा आप समझ लेतीं तो बेहतर होता।

और अगर केदारनाथ के पंडितों ने भगवान को बेच दिया है तो जिस पंडित से आप अपने घर में पूजा करवाती हैं और फिर उसे बदले में पैसे देती हैं तो क्या उसने भगवान को नहीं बेचा। जब आप अपने घर में भगवान को पैसा चढ़ाती हैं तो क्या तब आप भगवान को नहीं खरीदतीं? रिया जी… पंडित भी इंसान हैं। उन्हें भी अपना घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है। शायद ये चीज आपको पता नहीं रही होगी।

और तमाशा केदारनाथ धाम नहीं कर रहा। तमाशा आपने किया है। ऐसी पवित्र जगह जाकर बेफिजूली की। आपने जो कुछ भी कहा। अगर उस पर आपको विश्वास है कि वो सब गलत हो रहा है तो मंदिर प्रशासन से इसकी शिकायत करतीं। ना कि यूट्यूब पर व्यूज कमाने के लिए ऐसे वीडियो बनाकर तमाशा करतीं।

और आखिर में सही कहा मावी जी आपने।
जो जैसा करेगा, उसके साथ वैसा ही होगा। तो चिंता मत करिए। ईश्वर सब देख रहा है। लेकिन अंत में ये कहना चाहेंगे कि शिकायत करना बुरी बात नहीं है। लेकिन आप उसके लिए किस तरह के शब्द चुनते हैं और वो शिकायत कहां करते हैं, वो मायने रखता है।

मावी जी। थोड़ा बड़ा बनिए और बड़ापन दिखाइए। अपने शब्दों को साफ कीजिए।

बॉलीवुड फिल्मों का वो ‘अंग्रेज अफसर’, उत्तराखंड जिसकी मातृभूमि थी!

बॉलीवुड फिल्मों का वो अंग्रेज अफसर जो असल में अंग्रेज था ही नहीं। उसकी अंग्रेजियत सिर्फ इतनी थी कि वो मूलत: अमेरिका का था। करीब 100 साल पहले उसके पुरखे भारत आए थे और तब से उसका रिश्ता भारत से जुड़ गया था। हम बात कर रहे हैं टॉम एल्टर की।

मसूरी में पले-बढ़े टॉम एल्टर दिल से पहले भारतीय, फिर उत्तराखंडी थे। उनका बचपन मसूरी में गुजरा। रानीखेत से उन्हें प्यार था। उत्तराखंडी भाषाओं को बोलने में वो पारंगत थे। सिर्फ वो भाषाएं बोला नहीं करते थे, बल्कि उन्हें बढ़ावा भी देना चाहते थे।

जब DD नेशनल पर टॉम बोले गढ़वाली
टॉम एल्टर गढ़वाली और कुमाऊंनी बोलने में पारंगत थे। वो जितनी साफगोई से उर्दू और हिंदी बोला करते थे, उसी तरह गढ़वाली और कुमाऊंनी पर उनकी पकड़ मजबूत थी। टॉम ने डीडी नेशनल की एक डॉक्यूमेंट्री में गढ़वाली भाषा बोली थी। बहुत कोशिश के बावजूद हमें वो डॉक्यूमेंट्री तो नहीं मिल पाई। इतना जरूर है कि उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री और सीरियल की शूटिंग रानीखेत समेत उत्तराखंड के कई भागों में की थी।

कुमाऊंनी फिल्म में किया काम
भले ही उत्तराखंडी सिनेमा आजतक अपनी एक पहचान न बना पाया हो लेकिन टॉम उत्तराखंड के उन कुछ अभिनेताओं में से एक हैं. जिन्होंने इसे बढ़ाने की कोशिश की है। टॉम ने न सिर्फ असमी, बंगाली, कन्नड फिल्मों में काम किया है, बल्कि उन्होंने कुमाउंनी फिल्म में भी काम किया है। कुमाऊंनी फिल्म में उनके काम करने की जानकारी आपको लगभग सब जगह मिल जाती है। हालांकि उन्होंने किस कुमाउंनी फिल्म में काम किया, इसका हम पता नहीं कर पाए। इसकी वजह ये है कि कहीं पर भी फिल्म का नाम नहीं दिया गया है।

गढ़वाली फिल्म में करना चाहते थे काम
टॉम एल्टर हमेशा एक अदद गढ़वाली फिल्म में काम करना चाहते थे। अमर उजाला की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये टॉम की दिले-ख्वाहिश थी कि वो किसी गढ़वाली फिल्म में काम करें। हालांकि इसके लिए किसी भी निर्माता ने उन्हें एप्रोच नहीं किया। और 2017 में उनके निधन के साथ ही ये संभावना भी खत्म हो गई।

टॉम एल्टर बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेता होने के साथ ही बेहतरीन इंसान भी थे। मसूरी के लंडौर में आज भी उनका घर है। मसूरी के लोगों के लिए टॉम एक परिवार का ही हिस्सा थे।

जीवन का आखिरी वक्त टॉम मसूरी में बिताना चाहते थे लेकिन बीमारी के चलते ऐसा हो नहीं पाया। टॉम एल्टर ने जो जिया, खूब जिया। हमें गर्व है कि वो उत्तराखंड से हैं और उत्तराखंडी सिनेमा में उन्होंने योगदान देने की कोशिश की।

रामायण, महाभारत और 90 के दशक का उत्तराखंड

बिछना के पति की दिल्ली से अंतरदेशी आई है। पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले भगतु को चिट्टी पढ़ने के लिए बुलाया गया है। और भगतु पढ़ने में पारंगत ना होने के बावजूद जैसे-तैसे चिट्टी पढ़ लेता है। इस तरह बिछना को और परिवार को परदेश गए अपने की खुशखबर मिल जाती है। ये था 90 के दशक का उत्तराखंड। जब हालचाल अंतरदेशी के सहारे मिला करता था और घरबार मनी ऑर्डर के सहारे चला करते थे। लेकिन 90 के दशक में पहाड़ सी मुसीबतों और अंतरदेशी की खुशियों के अलावा एक और चीज आई थी। और वो थी रामायण, श्री कृष्ण और महाभारत जैसे सीरियल।

पूरे भारत की तरह ही पहाड़ में भी इन सीरियल ने अपना जादू बिखेरा था। लेकिन संसाधनों की कमी के चलते इन सीरियलों को देखने के लिए यहां जो इंतजाम और जुगाड़ किए जाते थे, वो भगतु जैसे सैकड़ों उत्तराखंडियों के दिल में गहरे उतरे हैं। आज की पीढ़ी उस सुख को कभी महसूस नहीं कर पाएगी।

जब टीवी वाले से दोस्ती की बहुत कीमत थी
90 के दशक के उत्तराखंड के ज्यादातर गांवों में न सड़क पहुंची थी और ना ही बिजली। ऐसे वक्त में गांव के कुछ चुनिंदा परिवारों के पास ही टीवी होता था। वो भी ब्लैक एन व्हाइट। जिस पर सिर्फ दूरदर्शन चैनल आता था। कुछ गांवों में बिजली थी भी तो वो सिर्फ 2 से 3 घंटों के लिए रहती थी। ऐसे में बच्चों की कोशिश रहती थी कि जिसके घर में टीवी है, उससे दोस्ती की जाए। क्योंकि उससे दोस्ती होने का मतलब है कि रविवार को रामायण, महाभारत देखने उसके घर जा सकते थे।

बहुत कम ही सौभाग्यशाली बच्चे होते थे, जिन्हें टीवी वाले घर में बैठकर रामायण, श्रीकृष्ण या अन्य कोई सीरियल देखने का मौका मिलता था। कुछ बच्चे बाहर से सिर्फ टीवी की आवाज सुनकर और झांककर काम चला लेते थे। ऐसे में अक्सर टीवी  के मालिक की नजर बाहर खड़े बच्चों पर पड़ती तो टीवी बंद कर देता। लेकिन बच्चे फिर भी नहीं जाते… क्योंकि उन्हें पता था कि टीवी अभी नहीं तो थोड़ी देर में फिर शुरू होगा। 

जब खल्याण (आंगन) में टीवी पर दिखाया गया श्रीकृष्ण
कुछ वक्त बीता और धीरे-धीरे कुछ लोगों ने कलर टीवी और VCR ले लिया। एक नये तरह का बिजनेस शुरू हो गया था। हर गांव में एक तय दिन पर कलर टीवी, जनरेटर और श्रीकृष्ण या रामायण सीरियल का VCR कैसेट मंगाया जाता था। सीरियल देखने के इच्छुक लोग 25 पैसे, आठन्नी या फिर एक रुपये तक सीरियल को देखने के लिए किराया देते थे। फिर तय दिन को सब लोग दिन में अपना कामकाज निपटाते और रात में पंचायत वाले मैदान में कलर टीवी लगाया जाता और उस पर चलता सीरियल।

पूरी रातभर सीरियल चलता और हर आदमी मैदान में बैठकर एकटक देखता। गांव वालों के लिए और खासकर बच्चों के लिए सीरियल में दिखने वाले ये कलाकार ही भगवान बन चुके थे।

श्रीकृष्ण, राम के पोस्टर से भर दी दीवारें
श्रीकृष्ण, रामायण जैसे सीरियलों का ऐसा जादु हुआ था कि हम इन कलाकारों को ही भगवान समझते थे। गांव के बच्चे जंगलों से बीज जमा किया करते थे और बीज के बदले उन्हें पैसे मिला करते थे। इन पैसों से दो ही चीजें आती थीं… कंचे या तो भगवान के पोस्टर। टीवी पर दिखने वाले इन भगवानों के पोस्टर कमरे में हर तरफ चस्पा कर दिए जाते थे। और फिर होती थी इनकी पूजा।

पहाड़ में जीवन ना सिर्फ पहले कठिन था बल्कि अब भी काफी हद तक है। लेकिन पहाड़ सी कठिनाइयों के बीच हम मनोरंजन का साधन खोज ही लेते थे। आज भले ही मोबाइल और इंटरनेट से हम काफी नजदीक हैं, लेकिन जो नजदीकी इनके बिना थी वो शायद अब कभी नहीं होगी।

वीडियो देखें

गढ़वई भाषा मां देश-विदेशु का समाचार पढ़ा-सुणा

 

नमस्कार बैजीभुलोंगढ़वई समाचार मा तुम खुणी हम बतौला हर हफ्ता की 10 बड़ी खबर। 5 देशविदेशु बटी और 5 अफड़ा पहाड़ की।

1.
पिछला कुछ समय सी देश मां CAA और NRC का खिलाफ विरोध प्रदर्शन व्हणू चा। ये हफ्ता मां ये विरोध का बीच दिल्ली का जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय यानि JNU मां कुछ नकाबपोशोंन् भीतर घुसिक छात्रों पर हमला करी। चेरा पर नकाब पैरी क् हमला कन वावू का नकाब अब पुलिसन् उतारील्यन।पुलिस का मुताबिक हमलावर कन वावू मां खुद JNU छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष समेत 9 लोगों की पछाण कर्याली। आइशी घोष वी , जु हमला का बाद धरना पर बैठीं च। अब बल देखण होलु कि चोर की दाड़ी मां तिनका जु दिखेगे, सु कति सई च। बते द्यों कि पिछला रविवार यानि 5 जनवरी कु JNU में नकाबपोशोंन हमला करी और छात्रों दगड़ी मारपीट करी। और हां, जरूरी बात। यूं विरोध प्रदर्शनु का बीच नगारिकता संशोधन बिल आज यानि 11 जनवरी से लागू व्हैगी।

2.
दूसरी खबर सीधा अमेरिका बटी। अमेरिकान ईरान कु टॉप कमांडर ड्रोन हमला करी उड़े दिनी। हां भई, सीधा ईरान मां घुसिक। अमेरिका का हमला का बाद ईरान भी बौत तच्युं और वैन भी अमेरिका सी बदला लेण का खातिर ईराक मां अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल छोड़ी। पर ईरानै किस्मत रै खराब और मिसाइल यूक्रेन का एक यात्री विमान पर लगी गे।मिसाइल हमला की वजह सी विमान मा सवार सभी 176 लोग मोरी गेनी। अब बल प्वथलु चुगीगे ढ्वखरु, अब पछतै व्हण क्या। ईरान कु राष्ट्रपति च् वु हसन रुहानी। वुन अफड़ी गलती स्वीकार कैली और बोली कि मानवीय गलती का वजह से यु हादसा वै। पर बैजी, क्वी युं राजनेताओं वुणी समझावा कि लड़ैझगड़ा करिक कैकु भलू नी वै और ना ही वंदू। यकीन नी ओंदू पुछाग्वाणु दिदा सी। जुन ब्याई घुटकी लगैक बैसाखु बैजी दड़ी लड़ै करी और आज कपाअ पर पट्टी बांधिक घोर मां बैठ्यां छां

3.
तुम
ट्विटर पर छां कि नी। नी जल्दी जावा किलै कि ट्विटर पर एक खास आदमी उणी फॉलो कन सी तुम जिती सकदां 60 करोड़। जी हां, मी मजाक नी छों कनु। छन युसाकु मइजावा। जापान कु एक बौत अमीर कारोबारी ची। येन घोषणा करीं कि अफड़ा 1000 ट्विटर फॉलोअर उणी ये 60 करोड़ रुप्या द्याणन। शर्त सिर्फ यथगी चीकि पैसा तौं ही मिलण जोन भाईसाब की 1 जनवरी की पोस्ट रिट्वीट करी वली। अब तुम सोचला कि ये उणी बौअ नी लैगी कखी। भई जवाब यु ची कि हां थोड़ा बौत जरूर बौएगी यू। भाईसाब कु बौलणु कि यूं पैसा बांटीक वु देखण चांदू कि क्या लोगों का जीवन मां ये सी खुशी आंदी की नी।त् ब्वाला बलनेकी और पूछपूछ. तदी मात पैसा देखिक कुछ दिन खुशी आली ही।

4.
त्
बैजी अब बात आपकी थाली की। बल उनी त् प्याज खरीदणु अब मुश्किल वैग्याई। और वक्त यनी एग्याई कि जु आज प्याज खरदणु , तै उणी बिना मांगिक अमीर आदमी कु दर्जा मिलणु च। पर अब तुम्हारी थाई सी मटर भी गायब व्है सकदु। जी हां. हमारी सराकर् दिसंबर मां मटर कु आयात कम कर्याली। कम कन की वजह सी अब आशंका कि मटर कु दाम 100 फीसदी तक बढ़ी सकदु। यानि प्याज का बाद कभी कभार जु तुम मटर खांदा छई, सु कभीकभार भी नी वई पौण्या। चल ब्वन भी क्या। तुम CAA और NRC का विरोध और समर्थन मां बिजी छां और सरकार ग्विंडा पिछाड़ी बटी तुम्हारी थाई उणी हल्की कनी चा।

5.
अब
बात जम्मूकश्मीर की। 370 हटणा का बाद घाटी मां जु हालात बण्या छिन। तौं पर सुप्रीम कोर्ट्न फैसला सुण्याली। 370 हटणा का बाद सी ही घाटी मां इंटरनेट सेवा और अन्य कई सेवा बंद छाई। ये पर सुप्रीम कोर्ट्न बोली कि इंटरनेट इस्तेमाल कनु हर नागरिक कु मौलिक अधिकार च। कोर्टन् सरकार उणी घाटी मां लगीं पाबंद्यों की समीक्षा कनुकु आदेश दियाली भाई। ल्यावा त् देखा बल जरा। यख तुम डेटा पैक खत्म व्हण की चिंता मां डुब्यां छनऔर वख लोग इंटरनेट भी इस्तेमाल नी करी सकणा छिन। क्या ब्वन तब। 

अब बात उत्तराखंड की।

6.
भई
पिछला हफ्ता की सबसी बड़ी खबर याच कि पूरा उत्तराखंड मां द्याण खूब पड़ी। द्याण खूब पड़ी लोगुन व्हाट्सऐप पर भी खूब स्टेटस डायन। द्याणन् ये बार सालों कु रिकॉर्ड तौड्याली। जौनसार में जथा द्याण ये बार पड़ी, तथगा 40 साल पैली पड़ी छाई। गौं मां रण वावा द्याण कु आनंद छई ल्याणा और परदेशु मां रैण वावा गौं वावु कु व्हाट्सऐप स्टेटस देखिक रैन जी मसोसणा। त् बैजी बोलियाली छई पलायन करा दों। पलायन नी व्हंदू मोबाइल पर द्याण देखणा कि नौबत ही किलै आण छै।

7.
उत्तराखंड मां उनी घुमणाक कई जगह छिन। पर अब सरकार जु 13 और टूरिस्ट डेस्टिनेश बणाणी छ। ये खातिर शंघाई कु न्यू डिवेलपमेंट बैंक 1200 करोड़ रुप्या देणु छ। 13 डिस्ट्रिक्ट– 13 डेस्टिनेशन योजना का तहत यु काम व्हण। अब देखण पड़लु कि उत्तराखंड्यों का खातिर या योजना कति फायदेमंद होंदी और क्या या योजना पलायन कुछ कम कन मां मदद करी सकदी कि न।

8.
द्याण पैण सी भला ही हम खुश छां होंणा पर ये सी एक खतरा भी पैदा व्हैगी। दरअसल उत्तराखंड का पाड़ी क्षेत्र में लगातार द्याण पैण सी रीख उणी खाणु नी मिलणु। रीख मतलब भालु, अगर तुम नी जाणदा व्हला जु। खाणा की तलाश मां भालु घाटी वाई जगों पर आणु। मुनस्यारी और धारचुला मां रीख दिखे गैनी। रीख दिख्याण की सबसी बड़ी चिंता या कि ये सी इंसानु दगड़ी रीख कु संघर्ष वै सकदू। जैमा ज्यादातर मनखी कु ही नुकसान व्हंदू।

9.
टिहरी का चंबा का रैण वावा बैज्यों खुशखबरी च। स्वच्छ भारत मिशन का तहत टिहरी गढ़वाल कु चंबा ओडीएफ प्लस प्लस शहर घोषित व्हैगे। चंबा सैर पैली निकाय जु खुला मां शौच मां डबल प्लस हासिल करी। ब्वान कु मतलब यू कि चंबा मां अब क्वी ड्वाखरा फंडु और गदरा दारा नी जांदु लुठ्या लीक. वनी लुठ्या की जरूरत भी क्या बै, गदरा मां पाणी रई ही जांदू। ओडीएफ प्लस प्लस घोषित व्हण कु मतलब कि चंबा मां अब हर घर पर शौचालय च। शौचालय का साथ ही सीवरेज सेफ्टी टैंक सिस्टम भी लग्यूं च। भईउत्तराखंड का और गौं तुम भी सिखा और स्वच्छता की मिसाल बणा भै।

10.
और आखिर मां एक गर्व वाई खबर। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो न् एक रिपोर्ट पब्लिश करी। रिपोर्ट का मुताबिक उत्तराखंड बूढ बुढ्यों का खातिर सबसी सुरक्षित राज्य च। यानि हम अफड़ा बुजर्गों की इज्जत करण जाणदा छां. सिर्फ यू नी, डकैती, लूट और चोरी का मामला सामान वापस बरामद कन का मामला मां भी उत्तराखंड नंबर वन स्थान पर ची भै। त् भायों गर्भ करा और मस्त रा। और उत्तराखंड तैं बढ़ोंदी रा।

गढ़वई समाचार मां आज इथगा ही। तुम उणी हमारी या समूण कन लगी। जरूर बतायां और अफड़ु सुझाव भी जरूर दियां। पसंद आली शेयर भी जरूर कर्यां. हम उणी भी हौसला मिललु।

समाचार पढियाली… अब सुणा भी दौं

यहां दुल्हन लेकर आती है बारात, दहेज लड़की नहीं, देता है लड़का

आपने दुनिया की अजीबोगरीब शादियों और चीजों के बारे में सुना होगा लेकिन हम आपको शादी की एक ऐसी परंपरा के बारे में बता रहे हैं जो अपने आप में अनोखी है। ये शादी पूरी दुनिया को बताती है कि आखिर विवाह होने कैसे चाहिए। इस शादी में दुल्हा नहीं दुल्हन बारात लेकर आती है। उसके बाद जो मंजर तैयार होता है, उसके बारे में सुनकर आपको भी अच्छा लगेगा।

जौनसार बावर की परंपरा
उत्तराखंड में आज भी अगर कहीं सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह जीवित है तो वो जौनसार बावर में है। देहरादून से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर बसा जौनसार बावर सिर्फ अपनी संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि अपनी अलग परंपराओं के लिए भी फेमस है। इन्हीं परंपराओं में से एक हैजाजड़ परंपरा।

हिमाचल के सिरमौर और उत्तराखंड के जौनसार बावर में यह परंपरा काफी आम है। जहां आम शादियों में दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है। वहीं,  सिरमौर और जौनसार में दुल्हन बारात लेकर आती है। जी हां. दुल्हन। सिर्फ यही नहीं, कबायली संस्कृति की इन शादियों में महिलाओं की काफी ज्यादा अहमियत होती है। यही वजह है कि यहां पूरे गांव की महिलाओं को अलग से भोज करवाया जाता है। इस परंपरा को रहिंन जिमाना कहा जाता है।

दिखावा किया तो होगा विरोध
दुल्हन जब दूल्हे के घर बारात लेकर आती है तो बारात मेहमानों को लेकर दूसरे दिन लौट जाती है। लेकिन दुल्हन दूल्हे के घऱ पर 5 दिन तक रहती है। आजकल जहां लोग शादियों पर करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, वहीं जौनसार बावर में शादी में दिखावा करना काफी ज्यादा खराब माना जाता है। शादी परंपराओं के हिसाब से करना बेहद जरूरी है। अगर किसी ने शादी में अमीरी दिखाने की कोशिश की और बेजा खर्च किया तो पूरा गांव उसका विरोध करता है। सदियों से चली रही ये परंपरा आज भी यहां कायम है।

क्या इतना दहेज लेंगे आप?
अब बात करते हैं दहेज की। जहां पढे़लिखे लोग लाखों का दहेज और घोड़ागाड़ी लड़कियों से लेते हैं। वहीं, जौनसार और सिरमौर में बिलकुल उल्टा है। यहां कई इलाकों में दूल्हे की तरफ से दुल्हन के परिवार को दहेज देने की प्रथा है। हालांकि ये दहेज पैसों और घोड़ागाड़ी का नहीं होता, बल्कि ये कोई सामान्य चीज जैसे बर्तन और कपड़े हो सकते हैं। और ये दहेज देने का मतलब ये है कि दूल्हे के मांबाप दुल्हन के मांबाप का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने अपनी बेटी का हाथ उनके लड़के के लिए दिया। कुछ शादियों में दुल्हन दहेज देती है, लेकिन ये सिर्फ 5-7 बर्तन ही होते हैं।

अनोखी विदाई, सिर्फ दुल्हन की नहीं, पूरी बारात की
हर शादी की तरह जौनसार की शादियों में भी नाचगाना होता है। लेकिन इन शादियों में परंपरागत नृत्यों को तवज्जो दी जाती है। हारुल, तांदी, झुमैलो जैसे नृत्य रातभर चलते हैं। जाजड़ परंपरा की शादी की एक और खास बात है, वो है विदाई। यहां जब विदाई का वक्त आता है तो दुल्हादुल्हन के परिवार वाले छत पर खड़े हो जाते हैं और गाना गाने लगते हैं। गाने के जरिये लड़के वाले लड़की पक्ष से कहते हैं कि सेवा में कुछ भूलचूक हुई हो तो हमें माफ कर देना। वहीं, लड़की के पक्ष वाले कहते हैंआपने हमारी काफी सेवा की। हमारी लड़की जब आपके घऱ में रहना शुरू करेगी तो आप उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें।

बता दें कि जौनसार बावर कभी हिमाचल की सिरमौर रियासत का ही हिस्सा था और जब अंग्रेजों ने जौनसार बावर को उत्तराखंड में शामिल किया तो लोग जरूर बंटे लेकिन यहां की संस्कृति नहीं। आज भी सिरमौर और जौनसार बावर के बीच रिश्ते लगते हैं।

WhatsApp का ये इस्तेमाल नहीं किया तो क्या किया?

आज लगभग सभी लोगों के पास स्मार्टफोन है। स्मार्टफोन है तो उसमें व्हाट्सऐप भी है ही। लेकिन अक्सर आपने व्हाट्सऐप का इस्तेमाल सिर्फ मैसेज, फोटो और वीडियो भेजने के लिए किया होगा लेकिन इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल जो आप कर सकते हैं। वो आपने अभी तक नहीं किया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में बताया है। दूसरी बात जो हम आपको बताने वाले हैं, वो ये है कि अगर आप उत्तराखंड घूमने की योजना बना रहे हैं और गांवों की सैर करना चाहते हैं तो मोबाइल आपकी काफी मदद कर सकता है। आप अगर उत्तराखंड से हैं और अपने घरगांव से दूर रहते हैं तो मोबाइल आपको आपके बचपन से मिलाएगा।

पीएम मोदी से जानिए WhatsApp का सही इस्तेमाल

 नरेंद्र मोदी ने नवंबर के आखिर रविवार को जब मन की बात की, तो इसमें उन्होंने धारचुला का एक उदाहरण पेश किया। इस उदाहरण में उन्होंने बताया कि किस तरह उत्तराखंड में रहने वाला एक समुदाय, जिसकी जनसंख्या अब 10 हजार से भी कम है। वो व्हाट्सऐप के जरिये अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने में जुटा हुआ है। रंग समुदाय की भाषा रंगलो कहलाती है। इस भाषा की कोई लिपि नहीं है। अपनी भाषा को खत्म होने से बचाने के लिए दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानि जेएनयू की प्रोफेसर संदेशा रायाप गर्ब्याल ने एक अनोखी पहल की। संदेशा ने अपने समुदाय के दूसरे लोगों से जुड़ने की अपील की और व्हाट्सऐप ग्रुप की शुरुआत हुई।

व्हाट्सऐप ग्रुप पर इस समुदाय के लोग सिर्फ अपनी मातृभाषा में ऑडियो मैसेज भेजते हैंबल्कि लिखते भी अपनी ही रंगलो भाषा में हैं। व्हाट्सऐप ग्रुप से शुरू हुई ये कहानी अब सोशल मीडिया पर बढ़ चुकी है। और कई लोग व्हाट्सऐप के साथ ही फेसबुक, ट्विटर पर भी रंगलो भाषा में लिख और बोल रहे हैं।

लुप्त होने की कगार पर खड़ी विरासत
ऐसा नहीं है कि सिर्फ रंगलो भाषा ही लुप्त होने की कगार पर है। उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं कह लीजिए या बोलियां, कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भी लुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। क्योंकि हम अब मिलते हैं तो इन भाषाओं में बात करने के से कतराते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं को बचाने के लिए व्हाट्सऐप का इस्तेमाल रंग समुदाय की तरह हम भी कर सकते हैं। कम से कम व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अपनी भाषा में बात कर सकते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन भाषाओं में बात कर सके।

मोबाइल लौटाएगा बचपन!

अब बात करते हैं उन उत्तराखंडियों की जो अपने घर से दूर शहरों में रह रहे हैं और अपना बचपन मिस कर रहे हैं। आपका मोबाइल आपका बचपन लौटा सकता है। दरअसल आकाश शर्मा नाम के युवक हैं। देहरादून में रहते हैं और सॉफ्टवेयर ऐप डेवलपिंग से जुड़े हुए हैं। आकाश ने उत्तराखंडियों का बचपन उनके मोबाइल पर लाने की कोशिश की है।

गूगल प्ले स्टोर पर आपको दो ऐप मिल जाएंगे। एकबाघबकरी और दूसरी, बट्टी। आम तौर पर उत्तराखंड में ये खेल काफी ज्यादा खेले जाते थे। लेकिन जब से मोबाइल आया है, तब से ये खेल नदारद से हो गए हैं। बाघबकरी और बट्टी, दो ऐसे खेल हैं, जिन्हें अब आप अपने मोबाइल पर खेल सकते हैं। और अपने बचपन की यादों को फिर से ताजा कर सकते हैं।  

घूमने जा रहे हैं उत्तराखंड तो मोबाइल करेगा मदद

अब जो बात हम करने वाले हैं ये सिर्फ उत्तराखंडियों के लिए नहीं, बल्कि देश और विदेश से आने वाले सभी लोगों के लिए है। आप उत्तराखंड घूमने जाना चाहते हैं। उत्तराखंड के गांवों की सैर करना चाहते हैं और यहां के पुराने लोगों से यहां की बातें जानना चाहते हैं तो आपका मोबाइल यहां भी आपकी मदद करेगा।

आप चाहे अंग्रेजी बोलते हों या फिर फ्रेंच भाषा आपको आती है। और चाहे फिर हिंदी ही आपकी प्रमुख भाषा क्यों हो। लेकिन आपको गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषा नहीं आती है। ऐसे में आप अगर उत्तराखंड की इन भाषाओं के शब्दों का अर्थ समझना चाहते हैं या फिर इन भाषाओं को सीखना चाहते हैं तो बहुत आसानी से आप ये काम कर सकेंगे।

गूगल प्लेस्टोर पर जाइए। हैलो उत्तराखंड ऐप डाउनलोड कीजिए। और फिर आप जिस भी भाषा के हैं और उस भाषा में बात कर और लिख कर उनका अर्थ उत्तराखंडी भाषाओं में समझ सकते हैं। आकाश शर्मा और उनकी टीम ने करीब 2 साल तक इन भाषाओं के शब्द जुटाए और फिर ये ऐप तैयार किया।

ये ऐप सिर्फ गैरउत्तराखंडियों के लिए नहीं है। अगर आप उत्तराखंड के हैं और अपनी तीनों भाषाओं पर पकड़ बनाना चाहते हैं तो ये ऐप आपकी मदद कर सकता है। और अपनी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए इन ऐप्स को जरूर डाउनलोड करें। और देखें कि कैसे आप इनके जरिये अपनी भाषाओं को जीवित रख सकते हैं और दूसरों तक पहुंचा सकते हैं।

पलायन रोकना अगर आपके हाथ में नहीं तो कम से कम अपनी भाषाओं और संस्कृति को बचाना तो हमारे हाथ में है। सोचिए, समझिए और करिये।

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क्या ऐसे ‘पढ़ेगा इंडिया-बढ़ेगा इंडिया?’

पूरे देश में पढ़ेगा इंडिया बढ़ेगा इंडिया का नारा लगाया जाता है, लेकिन ये सिर्फ नारा ही साबित हो रहा है। पहले पिथौरागढ़ में छात्र पुस्तकों की खातिर सड़कों पर उतरे थे। अब टिहरी गढ़वाल जिले की घनसाली तहसील के भिलंगना ब्लॉक में बच्चे सड़क पर उतर आए हैं। वजह है- शिक्षा और शिक्षा के ठेकेदारों की अनदेखी

उत्तराखंड के टिहरी जिले की भिलंगना ब्लॉक में हलचल मची हुई है। ये हलचल मचाई है कुछ बच्चों ने, जो शिक्षा के अपने अधिकार की खातिर लड़ रहे हैं। घनसाली तहसील के भिलंगना ब्लॉक के धोपड़धार में स्थित राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज के बच्चे सड़क पर उतर आए हैं। 26 नवंबर से कॉलेज के बच्चे कॉलेज अटेंड करने के बाद मुख्य बाजार में शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

दरअसल धोपड़धार स्थित राजकीय इंटरमीडिएट कॉलेज में 8 विषयों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है। कुछ विषयों के लिए शिक्षकों का पद 2009 से 2017 के बीच खाली हो गया था। लेकिन अब तक इन पर कोई भर्ती नहीं हुई है। शिक्षकों की कमी का ये सिलसिला खत्म होने की बजाय बढ़ा ही है। सन 2009 में जहां सिर्फ एक शिक्षक पद खाली था। आज 2019 में इनकी संख्या 8 हो गई है।

आंदोलन की एक तस्वीर

आंदोलन की एक तस्वीर

कॉलेज में प्रिंसिपल ही नहीं

सिर्फ शिक्षक ही नहीं, बल्कि स्कूल में प्रिंसिपल भी नहीं हैं। आंदोलन से जुड़े संजय बडोनी ने बताया कि 29 जुलाई, 2019 को इस संबंध में शिक्षा निदेशालय को ज्ञापन सौंपा गया था। लेकिन इस मामले में कोई भी एक्शन नहीं लिया गया। काफी इंतजार करने के बाद छात्रों ने 25 नवंबर को खंड शिक्षा अधिकारी तक बात पहुंचाई। जिलाधिकारी तक भी बात पहुंचा दी गई है।जिलाधिकारी ने आश्वासन तो दिया है लेकिन इस बार बच्चे रुकना नहीं चाहते।

आंदोलन में उतरे लोग

आंदोलन में उतरे लोग

बच्चे सड़क पर उतरते हैं। हाथ में तख्ती लेकर सरकार और प्रशासन से शिक्षकों की नियुक्ति की गुहार लगा रहे हैं। ‘हे सरकार बजट न व्यर्थ करो, शिक्षा पर भी कुछ खर्च करो’, पढ़ लिखकर आगे बढ़ेंगे, बिना शिक्षक कैसे पढ़ेंगे? … जैसे नारों से छात्र अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं.

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे समाजसेवी नित्यनंद कोठियाल ने बताया कि धोपड़धार स्थित इस कॉलेज में वर्तमान में 6 से 12वीं की कक्षाएं चलती हैं। इस कॉलेज में क्षेत्र के 10 से भी ज्यादा गांवों के बच्चे पढ़ते हैं। सिर्फ यही नहीं, इन गांवों के छात्रों के लिए 12वीं की पढ़ाई के लिए यहां ये एकमात्र कॉलेज है। कॉलेज में मौजूदा समय में करीब 520 छात्र पढ़ते हैं। लेकिन शिक्षकों की लगातार घटती संख्या से छात्र रोष में हैं।

पोस्टरों के जरिये विरोध

पोस्टरों के जरिये विरोध

आंदोलन से जुड़े बच्चों का कहना है कि जब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो जाती। तब तक हम रुकेंगे नहीं। छात्रों का कहना है कि इस बार आंदोलन रुका तो शायद फिर से शिक्षकों की नियुक्ति की बात ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी। बच्चे 26 नवंबर से हर दिन धोपड़धार बाजार में जमा होते हैं और पोस्टर, नारों और कविताओं के जरिये अपनी बात रखते हैं।

बच्चों के इस आंदोलन को अब अभिभावकों का भी साथ मिलने लगा है। बड़ी संख्या में अभिभावक भी बच्चों के इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं।