आप उत्तराखंड के हैं, क्या ये 5 चीजें पता हैं आपको?

गुजरते वक्त के साथ पुरानी चीजें छूटती चली जाती हैं और नई चीजें अपनी जगह बना लेती हैं। आज हम आपको 5 ऐसी चीजों के बारे में बताने वाले हैं जो न सिर्फ पहाड़ की परंपराओं का अभिन्ना हिस्सा रही हैं बल्कि इन चीजों की बदौलत पहाड़ की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा का जीवन चलता था। ये 5 चीजें जो अब पहाड़ में बहुत ही कम सुनाई या दिखाई पड़ती हैं। और नई पीढ़ी को शायद इनके बारे में पता भी नहीं है।

1. ढाकर

ढाकर पैटी रे माडू थैर्वाअ
अस्सी बरस कु बुढया रे माडू थैर्वाअ

पहाड़ का जीवन हमेशा से संघर्षों से भरा रहा है। उसी की बानगी है ढाकर। पुराने वक्त में लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर ढाकर जाते थे और जरूरत की चीजें लाया करते थे। इस दौरान कोटद्वार समेत कई जगहों पर ढाकर मंडिया लगा करती थीं। जहां लोग अपने खेतों और सग्वाड़ों पर उगी मिर्च या दूसरे धान लाया करते थे। मंडियों में इन चीजों के बदले नमक, सब्जियां और जरूरत की दूसरी चीजें ले जाया करते थे।

ढाकर यानि ढोकर ले जाना। जो ढाकर आते थे, उन्हें ढाकरी कहा जाता था। आज लुप्त हो चुकी इस परंपरा से सैकड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी हुई थी। जब लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर ढाकर जाते थे तो रास्ते में कई ढाकरी पड़ाव होते थे। बांघाट और दुग्गड्डा भी कभी ढाकरी पड़ाव थे।

जहां-जहां ढाकरी रुकते तो वहां मनोरंजन का पूरा साधन होता। नाच-गाना करने वाले, जादू खेल दिखाने वाले, मैणा यानि कहावतें, लोकगीतों को गाना जैसे कई तरीके वक्त काटने के लिए अपनाए जाते थे। बदले में मनोरंजन करने वालों को दिया जाता था- इनामी राशि। और इसी से होता था इनका जीवनयापन। ढाकर की परंपरा पर आधे पहाड़ की आजीविका जुड़ी हुई थी।

2. डड्वार
ये एक ऐसी चीज है जो थोड़ी बहुत आज भी बची हुई है। डड्वार पहाड़ में दिया जाने वाला एक प्रकार का पारितोषिक है। ये फसल का एक हिस्सा होता है। बदलते वक्त के साथ फसल के बदले कई जगहों पर पैसे भी दिए जाते हैं। इसे ब्राह्मण, लोहार और औजी को दिया जाता था। सालभर में होने वाली दो फसलों गेंहू-जौ और दूसरी धान के वक्त डड्वार दिया जाता था।

फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को चढ़ाया जाता है, इसे पूज या न्यूज कहा जाता है। दूसरा हिस्सा पंडित को दिया जाता था। सालभर पंडित ने घर में जो पूजा-पाठ किए और उसमें कभी कम दक्षिणा गई हो तो ये डड्वार एक तरह से उस कमी को पूरा करने के लिए दिया जाता था।

तीसरा हिस्सा लोहार का था। फसल काटने से पहले दाथुड़ी और अन्य हथियारों को पैना करने के बदले डड्वार दिया जाता था। वहीं, संग्राद- मक्रैणी और अन्य अहम त्योहारों पर घर आकर ढोल-दमो बजाने वाले औजियों को भी डड्वार दिया जाता था। औजियों को ही डड्वार देने की परंपरा कई जगहों पर आज भी है।

3. बोरू
बोरू डड्वार की तरह ही श्रम के बदले पारितोषिक देने की परंपरा है। जहां पंडित, औजी, लोहार को डड्वार दिया जाता है। वहीं, खेतों में काम करने और किसी अन्य के काम में हाथ बटाने आए ग्रामीणों को बोरु दिया जाता था। यह एक तरह की दैनिक मजदूरी होती थी जो काम करने वाले व्यक्ति को दी जाती थी। हालांकि बदलते वक्त के साथ बौरु की जगह दिहाड़ी ने ले ली है।

4. धिनाली
आज भले ही हालात बदल रहे है। पहाड़ के लोग भैंस, गाय रखने से परहेज कर रहे हैं। लेकिन एक वक्त था, जब ये सब शान माने जाते थे। जब किसी दुधारु पशु का दूध निकालकर लाया जाता है तो उसे हमेशा छुपाकर लाया जाता है. स्थानीय भाषा में दूध, दही, घी आदि को धिनाली कहा जाता है. धिनाली को छुपाने की एक वजह ये भी थी कि किसी की नजर ना लगे और गाय या भैंस कम दूध ना देने लगे। एक वक्त ऐसा भी था, जब धिनाली को परिवार की संपन्नता का प्रतीक माना जाता था। बिना दूध की चाय पीना, एक गाली मानी जाती थी।

5. कोटी बनाल
कोटी बनाल कोई परंपरा तो नहीं है लेकिन यह वो शैली है, जिससे उत्तराखंड के घर हजारों सालों तक सीना तने खड़े रहते हैं। सीमेंट और शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी बनाल वास्तुकला खत्म सी हो गई है। लेकिन इसके अवशेष आज भी उत्तरकाशी, जौनसार और हिमाचल में देखने को मिलती है। कोटी बनाल से बनाए गए मकान भूकंप रोधी होते थे। और इसमें कई मंजिलों के घर बनाए जाते थे। शहरीकरण की हवा लगने के बाद कोटी-बनाल वास्तुकला खोती जा रही है और हम कॉन्क्रीट जंगल अपने पहाड़ में खड़ा करने लग गए हैं।

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