उत्तराखंड की बरसों पुरानी समस्या जो कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनी

आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। सिर्फ घोषणा ही नहीं, पार्टी ने 2022 में होने वाले चुनावों की जोरदार तैयारी भी शुरू कर दी है। केजरीवाल की इस घोषणा के बाद उत्तराखंड एकबार फिर चर्चा में है।

केजरीवाल ने फ्री बिजली-पानी के साथ ही पलायन पर रोक लगाने का वादा अभी से कर दिया है लेकिन पहाड़ की एक बरसों पुरानी परेशानी है जो कभी चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा नहीं होती।

उत्तराखंड को बने हुए 20 साल हो चुके हैं लेकिन आजतक किसी भी पार्टी ने इस मुद्दे को चुनावी घोषणापत्र में जगह नहीं दी है। यहां तक कि आम आदमी पार्टी ने भी नहीं। लेकिन उत्तराखंड का जनमानस इस दिक्कत से हर दिन रूबरू होता रहता है। और ये दिक्कत है वन्यजीव संघर्ष की।

वन्यजीवों से रोज संघर्ष
उत्तराखंड के स्थानीय अखबारों में आए दिन किसी गुलदार के इंसान पर हमला करने की खबरें छपती रहती हैं। वन्यजीवों का इंसानों पर हमला करने की घटनाएं इतनी आम हो गई हैं कि अखबार भी इन्हें एक छोटे से कॉलम में छापकर खानापूर्ति कर लेते हैं। 70 फीसदी से ज्यादा वन क्षेत्र वाले प्रदेश में ये समस्या किसी को बड़ी नहीं लगती। शायद इसीलिए ये चुनावी मुद्दा भी नहीं बनता। लेकिन उत्तराखंड के जनमानस को इसका समाधान मिलना जरूरी है।

आपदा बनता जा रहा संघर्ष
उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक प्राकृतिक आपदा का रूप लेता जा रहा है। साल 2019 की ही बात करें तो यहां पर जंगली जानवरों के हमले में 58 लोगों ने अपनी जान गंवाई और करीब 259 लोग घायल हुए। सबसे ज्यादा पिथौरागढ़ में 8 लोगों की जान गई। राजाजी टाइगर रिजर्व में 6, पश्चिमी सर्कल के पूर्वी हिस्से में 6, गढ़वाल वन क्षेत्र में 6 और हरिद्वार में 6 लोगों की जान जंगली जानवरों ने ली है।

वहीं, कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ रेंज में 3, रामनगर में 1, नंदादेवी में 2 ने अपनी जान गंवाई है। इसके अलावा भी कई क्षेत्र हैं, जहां जंगली जानवरों ने मासूमों की जान ली है।

गुलदार और सांप ने ली सबसे ज्यादा जान
उत्तराखंड में गुलदार सबसे बड़ी चुनौती है। बीते साल इसके हमले में 18 लोगों की मौत हुई है। वहीं, सांप के डंसने से 19 लोगों की मौत हुई।

ये समस्या बड़ी क्यों है?
जिसका भी जीवन उत्तराखंड के गांवों में गुजरा होगा, उसने गुलदार, भालू और अन्य वन्यजीव के खतरे को महसूस किया होगा। कई लोगों ने गुलदार को गांवों में देखा भी होगा। आए दिन हमारी बेटियां और बहुएं जो जंगल में घास और चारा लाने जाती हैं, वो गुलदार, भालू जैसे जीवों का शिकार बन जाती हैं। सिर्फ यही नहीं, कई बार गुलदार गांवों में आकर बच्चों को उठाकर ले जाते हैं।

क्या कर रही हैं सरकारें?
सैकडों सालों से चली आ रही इस समस्या का कोई परमानेंट सॉल्यूशन अभी तक नहीं आया है। शायद इसका परमानेंट सॉल्यूशन संभव भी नहीं है लेकिन जानवरों और इंसानों के बीच फासला रखने के लिए वन विभाग तैनात रहता है। और हमारा वन विभाग स्टाफ की कमी से जूझ रहा है। हर साल बजट आता है लेकिन वन्य जीवों से संघर्ष को कम करने के लिए कोई अहम घोषणा नहीं होती। एक आम सरकारी विभाग की तरह वन विभाग को तयशुदा बजट बांट दिया जाता है और खानापूर्ती कर दी जाती है।

अभी तक क्या किया गया?
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक संघर्ष को कम करने के लिए इंडो-जर्मन अंतर्राष्ट्रीय कोऑपरेशन के साथ कोशिश की जा रही है। हाथियों और गुलदारों के लिए रेडियो कॉलर, अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं। रैपिड रिस्पॉन्स टीम बनाई जा रही है। लेकिन ये सब नाकाफी साबित हो रहा है। इस संघर्ष को रोकने के लिए राज्य में एक फॉर्मूला नहीं लागू हो सकता। जोकि अब तक की सरकारें करती आई हैं।

पूरे राज्य में एक फॉर्मूला नहीं चल सकता!
डाउन टू अर्थ पत्रिका अपनी रिपोर्ट में लिखती है कि पिथौरागढ़ गुलदार को लेकर संवेदनशील है तो वहां अलग तरह के उपाय करने होंगे। रामनगर-मुहान, हल्द्वानी के तराई सेंट्रल डिवीजन, कोटद्वार, दुगड्डा, पाथरो हाथी के लिहाज से संवेदनशील हॉटस्पॉट हैं। यहां अलग रणनीति अपनानी होगी। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की तरह उत्तराखंड में भी अति संवेदनशील जगहों पर सोलर फेन्सिंग भी लगाई जा सकती है।

खैर, इस समस्या का असली समाधान तब ही निकलेगा, जब सरकारें इस तरफ गंभीरता से देखेंगी। जब सरकारों के बजट में इस समस्या से निजात पाने के लिए और वन विभाग को मजबूत करने के लिए ज्यादा जगह मिलेगी।

अब आम आदमी पार्टी भी उत्तराखंड के चुनावी रण में उतर रही है। क्या वो इस मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल करेगी या नहीं, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन उम्मीद कम ही है।

चलिए 2022 का इंतजार करते हैं। लेकिन इस बार वोट सोच समझकर दीजिएगा। 20 साल से जो नहीं बदला है, उसे बदलने का वक्त है ये। आपकी सुरक्षा, आपका राज्य आपके हाथ में है, उसके लिए सही कदम उठाएं।

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