‘आप’ की उम्मीदों का पहाड़ चढ़ेगा पहाड़ी?

भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिखने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ की अब उत्तराखंड पर नजर है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में घोषणा की कि उनकी पार्टी 2022 में उत्तराखंड की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनका दावा है कि उन्होंने उत्तराखंड में सर्वे करवाया। सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि ‘आप’ को उत्तराखंड में चुनाव लड़ना चाहिए। 

कई मोर्चों पर दिल्ली की सूरत बदल कर रख देने वाले केजरीवाल के सामने पहाड़ की कई ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे अभी तक उनका सामना नहीं हुआ है। और जो चुनौतियां 20 सालों से कमोबेश जस की तस हैं।

उम्मीद की किरण ‘आप’
9 नवंबर, 2000 वो तारीख है, जिस दिन उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। अलग राज्य से उम्मीदें थीं कि सालों से चली आ रही दिक्कतों से निजात मिलेगा। पहाड़ में रोजगार पैदा किए जाएंगे तो पलायन रुकेगा। पहाड़ों में अस्पताल बनेंगे तो जानें बचेंगी। अच्छे स्कूल होंगे तो पहाड़ से ही डॉक्टर-इंजीनियर निकलेंगे। उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल, पहाड़ में ही (गैरसैण) राजधानी बनेगी। 

20 साल में क्या बदला?
उत्तराखंड 20 साल का हो चुका है लेकिन जो मांगें 20 साल पहले थीं वो आज भी जस की तस हैं। इन 20 सालों में उत्तराखंड पर सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही कुर्सी बदलती रही है। उत्तराखंड आंदोलन से निकली पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल यानि उक्रांद आपसी झगड़ों और फूट के चलते कहीं नजर भी नहीं आई। लेकिन अब ‘आप’ से उम्मीद कर सकते हैं। 

उत्तराखंड ने बीजेपी और कांग्रेस को आजमाकर देख लिया है। यूकेडी अपना कोई मजबूत आधार यहां खड़ा करने में अभी तक विफल ही रही है। उक्रांद ना मजबूत विपक्ष साबित हो पाई है, ना ही वो कांग्रेस और बीजेपी का विकल्प बन पाई है। लेकिन ‘आप’ इन दोनों मजबूत पार्टियों का विकल्प बनने की ताकत रखती है। 

दिल्ली का सुधार उत्तराखंड में होगा?
दिल्ली में केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी अचीवमेंट शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए बदलाव माने जाते हैं। उत्तराखंड के परिपेक्ष में देखें तो यहां की भी सबसे बड़ी जरूरत शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव की है। ‘आप’ के उत्तराखंड में आने से इस उम्मीद को पंख जरूर लगेंगे। और कई ऐसे लोग होंगे जो इस बिना पर ‘आप’ को वोट दे सकते हैं।

गैरसैंण स्थायी राजधानी?
दूसरी मांग, जिसके आधार पर केजरीवाल उत्तराखंड में वोट मांग सकते हैं, वो है- गैरसैंण। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भले ही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया हो लेकिन आम पहाड़ी अभी भी इससे ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। केजरीवाल आम जन की नब्ज पकड़ना काफी अच्छी तरह से जानते हैं। और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का वादा उनके घोषणापत्र में सबसे ऊपर हो सकता है।

फ़्री बिजली ने कांग्रेस के इरादों पर फेरा पानी!
मार्च 2020 में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने एक अहम घोषणा की। उन्होंने कहा कि 2022 में सत्ता में आने पर फ्री बिजली और पानी देंगे। जब उन्होंने यह घोषणा की थी, तब ‘आप’ के मैदान में आने की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। हरीश ने जिस केजरीवाल मॉडल पर चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई थी, वो कांग्रेस के लिए ध्वस्त हो चुका है। क्योंकि केजरीवाल फ्री बिजली और पानी के वादे के साथ मैदान में उतरेंगे।

कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी दिल्ली की तरह लोकल मुद्दों पर लड़ती दिखेगी। लोकल मुद्दे यानि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और राजधानी। दिल्ली का रिपोर्ट कार्ड और प्रवासी उत्तराखंडियों के बूते उत्तराखंड में ‘आप’ मजबूत जनमत हासिल करती दिखेगी। 

20 साल से पहाड़ का जनमानस कांग्रेस और बीजेपी का जो विकल्प ढूंढ़ता दिख रहा था,  वो आखिर उसे मिलता दिख रहा है। कांग्रेस और न बीजेपी के लिए एक पहाड़ सी चुनौती बनती दिख रहे हैं- केजरीवाल।

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