उत्तराखंड पर बनी 6 फ़िल्में, जिन्होंने देश और दुनिया में तारीफ कमाई

आपने बॉलीवुड फिल्म केदारनाथ देखी होगी। कांछी, मीटर चालू बत्ती गुल, स्टूडेंट ऑफ द इयर टू, ट्यूबलाइट समेत कई बॉलीवुड फ़िल्में हैं, जो उत्तराखंड में बनी हैं या फिर इसके परिवेश की कहानी को लेकर चलती हैं। कमर्शियल सिनेमा की इन फ़िल्मों की चमक के बीच वो फ़िल्में हमें कम ही पता चलती हैं जो पहाड़ को उसके असली स्वरूप में दुनिया के सामने पेश करते हैं।  हम आपको 6 ऐसी ही फ़िल्मों के बारे में बता रहे हैं, जिनमें आपको पहाड़ बिना किसी फ़िल्टर के दिखता है। शायद इसीलिए इसमें वो फ़िल्में भी शामिल हैं जिन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और ऑस्कर तक नॉमिनेशन हासिल किया है।

दाएं या बाएं

दाएं या बाएं

 दाएं या बाएं
दाएं या बाएं फिल्म में बॉलीवुड एक्टर दीपक डोबरियाल, मानव कौल समेत कई बॉलीवुड एक्टर्स ने अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरा।
कहानी रमेश मजीला  यानि दीपक डोबरियाल के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में एक जिंगल लिखने पर रमेश को कार इनाम में मिलती है। इसी के आसपास पूरी कहानी घूमती है। इस फिल्म में आपको न सिर्फ शुद्ध पहाड़ी परिवेश नज़र आता है बल्कि इस फ़िल्म का निर्देशन भी उत्तराखंड की बेला नेगी ने किया है। फ़िल्म में आपको पहाड़ के कवि गिरीश तिवारी गिरदा भी नज़र आते हैं।

यह फ़िल्म 2010 में रिलीज़ हुई थी। एक शुद्ध पहाड़ी फ़िल्म को अगर बॉलीवुड के कैमरे से देखना है तो ‘दाएं या बाएं’ एक बेहतरीन विकल्प है।

हंसाहंसा
हंसा वो फिल्म है जो महज 17 दिन में बनकर तैयार हुई। इसे सिर्फ 5 लाख रुपये के बजट में बनाया गया। इस फिल्म का निर्देशन करने वाले मानव कौल ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ये फिल्म हमने सिर्फ़ डीवीडी पर देखने के लिए बनाई थी। लेकिन बाद में फ़िल्म को आसियान फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड मिला। PVR की तरफ से इसे बाकायदा सिनेमाघरों में रिलीज किया गया।  क्रिटिक्स ने इस फ़िल्म को खूब सराहा।

हंसा पहाड़ के उस बच्चे की कहानी है, जिसके पिता सालों से शहर से नहीं लौटे हैं। हंसा और उसकी दीदी अपने पिता को खोजने की कोशिश करती हैं। बीमार मां और लापता पिता को सँभालने की कहानी है हंसा। इस फ़िल्म के ज़रिये आप पहाड़ में अकेला और कठिन जीवन जीने वाले बच्चों का दर्द समझ सकते हैं। 


कुमाउंनी फिल्म- आस

कुमाउंनी फिल्म- आस

आस
आस उत्तराखंड की पहली रीजनल लैंग्वेज फ़िल्म है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। कुमाऊँनी भाषा में बनी फ़िल्म आस, बलि प्रथा पर चोट करती है। फ़िल्म में कुछ बच्चे बली चढ़ाने के लिए लाई गई बकरी की जान बचाने के लिए जतन करते हैं। 

इस फ़िल्म को दिल्ली इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में ऑडियंस च्वॉइस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा प्रतिरोध का सिनेमा, कोलकाता चिल्ड्रन इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी इसका सेलेक्शन हुआ। वहीं, उत्तराखंड के स्तर पर बात करें तो फ़िल्म ने यहां भी बेस्ट डायरेक्टर, सिनेमैटोग्राफर और बेस्ट फ़िल्म का ख़िताब जीता।  

इस फ़िल्म में आपको पहाड़ के बच्चों की मासूमियत और कुरीतियों पर चोट करती उनकी कोशिश नज़र आती है। 


काफल

काफल


काफल

उत्तराखंड के फेमस फल काफल के नाम पर बनी ये बाल फ़िल्म राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है। फ़िल्म बचपन की उस कहानी से जुड़ती है, जिसमें हर मां-बाप बच्चों को ये कहकर डराते हैं कि सो जा वरना काली माई आ जाएगी।

फ़िल्म में ऐसा ही एक किरदार है- पगली माई का। जिससे बच्चे डरते हैं। पगली माई का किरदार बॉलीवुड एक्ट्रेस और हल्द्वानी से वास्ता रखने वाली सुनिता रजवार ने निभाया है। फ़िल्म की कहानी पगली माई का डर ख़त्म करने और नफ़रत को प्यार में बदलने की बात करती है।

देवभूमि: द लैंड ऑफ गॉड्स

देवभूमि: द लैंड ऑफ गॉड्स

देवभूमि लैंड ऑफ गॉड्स
ये फिल्म कई मायनों में खास है। ये पहली ऐसी इंटरनेशनल फिल्म है जो शत-प्रतिशत उत्तराखंड पर बनी हुई है। इस फिल्म को ख्याति प्राप्त और सर्बिया मूल के डायरेक्टर गोरान पास्कलजेविक ने बनाया है। इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में काफी सराहा गया और पुरस्कारों से नवाज़ा गया। 

फिल्म विदेश से सालों बाद गांव लौटे राहुल यानि विक्टर बनर्जी के बारे में है,  जो जीवन के आखिरी पड़ाव में गांव लौटा है। इस फिल्म को आप अमेजन प्राइम पर देख सकते हैं। यूट्यूब पर भी उपलब्ध है।

 

मोती बाग

मोती बाग

मोतीबाग
अब बात करते हैं उस फ़िल्म की जिसने न सिर्फ़ उत्तराखंड का बल्कि देश का नाम भी रोशन किया है। मोतीबाग। उत्तराखंड के किसान पर बनी डॉक्युमेंट्री मोतीबाग को भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया। मोतीबाग पौड़ी गढ़वाल के 83 साल के किसान की कहानी है। जिसने 32 साल पहले सरकारी नौकरी छोड़कर अपने गांव बसने का फैसला किया।

वो भी ऐसे वक्त में जब सब शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। विद्यादत्त शर्मा ने खंडहर होते मकानों और बंजर होते खेतों के बीच एक मोती बाग बनाया है, जिसे वह हमेशा हराभरा रखते हैं। इस डॉक्युमेंट्री में विद्यादत्त के संघर्ष और सफलता की कहानी है। 

ये हैं कुछ उम्दा फ़िल्में जिनमें आपको उत्तराखंड बिना किसी फ़िल्टर के नज़र आता है। साफ-सुतरा पहाड़ीपन।

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