WhatsApp का ये इस्तेमाल नहीं किया तो क्या किया?

आज लगभग सभी लोगों के पास स्मार्टफोन है। स्मार्टफोन है तो उसमें व्हाट्सऐप भी है ही। लेकिन अक्सर आपने व्हाट्सऐप का इस्तेमाल सिर्फ मैसेज, फोटो और वीडियो भेजने के लिए किया होगा लेकिन इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल जो आप कर सकते हैं। वो आपने अभी तक नहीं किया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में बताया है। दूसरी बात जो हम आपको बताने वाले हैं, वो ये है कि अगर आप उत्तराखंड घूमने की योजना बना रहे हैं और गांवों की सैर करना चाहते हैं तो मोबाइल आपकी काफी मदद कर सकता है। आप अगर उत्तराखंड से हैं और अपने घरगांव से दूर रहते हैं तो मोबाइल आपको आपके बचपन से मिलाएगा।

पीएम मोदी से जानिए WhatsApp का सही इस्तेमाल

 नरेंद्र मोदी ने नवंबर के आखिर रविवार को जब मन की बात की, तो इसमें उन्होंने धारचुला का एक उदाहरण पेश किया। इस उदाहरण में उन्होंने बताया कि किस तरह उत्तराखंड में रहने वाला एक समुदाय, जिसकी जनसंख्या अब 10 हजार से भी कम है। वो व्हाट्सऐप के जरिये अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने में जुटा हुआ है। रंग समुदाय की भाषा रंगलो कहलाती है। इस भाषा की कोई लिपि नहीं है। अपनी भाषा को खत्म होने से बचाने के लिए दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानि जेएनयू की प्रोफेसर संदेशा रायाप गर्ब्याल ने एक अनोखी पहल की। संदेशा ने अपने समुदाय के दूसरे लोगों से जुड़ने की अपील की और व्हाट्सऐप ग्रुप की शुरुआत हुई।

व्हाट्सऐप ग्रुप पर इस समुदाय के लोग सिर्फ अपनी मातृभाषा में ऑडियो मैसेज भेजते हैंबल्कि लिखते भी अपनी ही रंगलो भाषा में हैं। व्हाट्सऐप ग्रुप से शुरू हुई ये कहानी अब सोशल मीडिया पर बढ़ चुकी है। और कई लोग व्हाट्सऐप के साथ ही फेसबुक, ट्विटर पर भी रंगलो भाषा में लिख और बोल रहे हैं।

लुप्त होने की कगार पर खड़ी विरासत
ऐसा नहीं है कि सिर्फ रंगलो भाषा ही लुप्त होने की कगार पर है। उत्तराखंड की प्रमुख भाषाएं कह लीजिए या बोलियां, कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी भी लुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं। क्योंकि हम अब मिलते हैं तो इन भाषाओं में बात करने के से कतराते हैं। ऐसे में अपनी भाषाओं को बचाने के लिए व्हाट्सऐप का इस्तेमाल रंग समुदाय की तरह हम भी कर सकते हैं। कम से कम व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अपनी भाषा में बात कर सकते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन भाषाओं में बात कर सके।

मोबाइल लौटाएगा बचपन!

अब बात करते हैं उन उत्तराखंडियों की जो अपने घर से दूर शहरों में रह रहे हैं और अपना बचपन मिस कर रहे हैं। आपका मोबाइल आपका बचपन लौटा सकता है। दरअसल आकाश शर्मा नाम के युवक हैं। देहरादून में रहते हैं और सॉफ्टवेयर ऐप डेवलपिंग से जुड़े हुए हैं। आकाश ने उत्तराखंडियों का बचपन उनके मोबाइल पर लाने की कोशिश की है।

गूगल प्ले स्टोर पर आपको दो ऐप मिल जाएंगे। एकबाघबकरी और दूसरी, बट्टी। आम तौर पर उत्तराखंड में ये खेल काफी ज्यादा खेले जाते थे। लेकिन जब से मोबाइल आया है, तब से ये खेल नदारद से हो गए हैं। बाघबकरी और बट्टी, दो ऐसे खेल हैं, जिन्हें अब आप अपने मोबाइल पर खेल सकते हैं। और अपने बचपन की यादों को फिर से ताजा कर सकते हैं।  

घूमने जा रहे हैं उत्तराखंड तो मोबाइल करेगा मदद

अब जो बात हम करने वाले हैं ये सिर्फ उत्तराखंडियों के लिए नहीं, बल्कि देश और विदेश से आने वाले सभी लोगों के लिए है। आप उत्तराखंड घूमने जाना चाहते हैं। उत्तराखंड के गांवों की सैर करना चाहते हैं और यहां के पुराने लोगों से यहां की बातें जानना चाहते हैं तो आपका मोबाइल यहां भी आपकी मदद करेगा।

आप चाहे अंग्रेजी बोलते हों या फिर फ्रेंच भाषा आपको आती है। और चाहे फिर हिंदी ही आपकी प्रमुख भाषा क्यों हो। लेकिन आपको गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषा नहीं आती है। ऐसे में आप अगर उत्तराखंड की इन भाषाओं के शब्दों का अर्थ समझना चाहते हैं या फिर इन भाषाओं को सीखना चाहते हैं तो बहुत आसानी से आप ये काम कर सकेंगे।

गूगल प्लेस्टोर पर जाइए। हैलो उत्तराखंड ऐप डाउनलोड कीजिए। और फिर आप जिस भी भाषा के हैं और उस भाषा में बात कर और लिख कर उनका अर्थ उत्तराखंडी भाषाओं में समझ सकते हैं। आकाश शर्मा और उनकी टीम ने करीब 2 साल तक इन भाषाओं के शब्द जुटाए और फिर ये ऐप तैयार किया।

ये ऐप सिर्फ गैरउत्तराखंडियों के लिए नहीं है। अगर आप उत्तराखंड के हैं और अपनी तीनों भाषाओं पर पकड़ बनाना चाहते हैं तो ये ऐप आपकी मदद कर सकता है। और अपनी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए इन ऐप्स को जरूर डाउनलोड करें। और देखें कि कैसे आप इनके जरिये अपनी भाषाओं को जीवित रख सकते हैं और दूसरों तक पहुंचा सकते हैं।

पलायन रोकना अगर आपके हाथ में नहीं तो कम से कम अपनी भाषाओं और संस्कृति को बचाना तो हमारे हाथ में है। सोचिए, समझिए और करिये।

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